मन ही मन मैं,
तेरा नाप लेकर,
बनाती रही तेरे,
तन के कपड़े
नहीं ये छोटा होगा,
नहीं ये होगा बड़ा,
करती खुद से जाने
कितने झगड़े
तन के कपड़े . . . ।
तू गोरी होगी,
या सांवरी
मैं भी बावरी बन
सजाती रही गुडि़या पे
तेरे वो कपड़े
तन के कपड़े . . . ।
झलक तेरी आंखों में
लेकर सोती तो,
ख्वाबों में फिरती
तुझको पकड़े-पकड़े
तन के कपड़े . . . ।
मैं अपना बचपन
फिर से जी लूंगी
तू आ जाएगी तो
मिट जाएंगे सारे झगड़े
तन के कपड़े . . . ।
waah ...ultimate...superb
जवाब देंहटाएंमेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति
सुन्दर कल्पना। वाह। कहते हैं कि-
जवाब देंहटाएंतमाम घर की फिजा को बदलता रहता है।
वो एक खिलौना जो आँगन में चलता रहता है।।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
wah bahut hee sundar rachnaa, saral shabdon mein aapne bahut sundar bhaav utpann kar liye....
जवाब देंहटाएंवाह ये गुडियाँ के कपडे का बयां इतना निराला है........ तो वो आई तो उसका बयां कैसा होगा.....
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर........
बहुत ही प्यारी कविता है। भावनाओं को उड़ेलती हुई। सचमुच बहुत सुंदर रचना। (कृपया वर्ड वेरीफिकेशन हटाएं-धन्यवाद)
जवाब देंहटाएं... bahut khoob !!!
जवाब देंहटाएंमैं अपना बचपन
जवाब देंहटाएंफिर से जी लूंगी
तू आ जाएगी तो
मिट जाएंगे सारे झगड़े
तन के कपड़े . . .
वाह...............गहरी भावनाओं की अभिव्यक्ति है इस रचना में..........छोटे छोटे सपनो में बुनती हुयी तन के कपडे वास्तव में कपडे नहीं पूरी जिंदगी का फलसफा है.......... लाजवाब
sach me co aa jaree hai to maa sab kuchh bhool jati hai hai bhavmay kavita badhai
जवाब देंहटाएंकमाल के कोमल भाव हैं आपके.
जवाब देंहटाएंआपकी इस सर्वाधिक लोकप्रिय
प्रस्तुति को पढकर मन मग्न हो गया है सदा जी.
आभार.
ma ki kalpna ko sajiv karti ek anupam rachna
जवाब देंहटाएंshubhkamnayen
Very nice...sada sis...
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