गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

बुलंद हैं इरादे . . .

हर कदम यूँ उठे की एक कदम
मेरी मंजिल और मेरे पास हो ।

डगमगाए जो कहीं मुश्किलों से कदम,
बुलंद हैं इरादे मन में ये अहसास हो ।

हर काम पहले आसां नहीं हुआ करता,
जीत होती है उसकी जिसे उसकी आस हो ।

सूरज सा जिसमे तेज, चाँद सी शीतलता हो,
साहस की डोर हाँथ में मन मैं विश्वास हो ।

कहते हैं "सदा" कुछ ख़ास करना है,
फिर क्यों डरूं जब विश्वास मेरे पास हो ।



बुधवार, 29 अप्रैल 2009

बंद करके मैंने जुगनुओं को . . .

अपना ही साया जब नजर नही आता आदमी को,
सोचता है वो तन्हाई के साये में कैसे जिया जाए ।

अंधेरे इस कदर मुझे तड़पा गए कि मैंने भी,
एक दिन ये ठाना अपने लिए कुछ किया जाए ।

मुठ्ठी में बंद करके मैंने जुगनुओं को सोचा,
कुछ देर ही सही मेरी तकदीर रौशन हो जाए ।

मेरी मुस्कान पल भर की देख बोले जुगनू भी,
होने वाली है अब तो सहर बोल क्या किया जाए ।

दिल्लगी पल दो पल के लिए "सदा" अच्छी है,
ताउम्र लगा के दिल ना किसी से जिया जाए ।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

देते रहे दस्तक वारिसशाह . . .

तेरी रूह जाने किस तन में जा समाई होगी,
अब भी शायद मन में कविता ही छाई होगी ।

तेरी कलम से निकला हर शब्द अमिट हो गया,
हर शब्द की चाहत में सिर्फ़ तू ही समाई होगी ।

कितनी नज्में लिखी कवियों ने याद में तेरी,
जाने कितनो ने अपनी महफिलें सजाई होगी ।

कोरे कागज पे रंग भरते तेरे अल्फाज़ जिनमें,
डूब के तूने रंगत ये निखरी हुई सी पाई होगी ।

तेरे ख्वाबों में "सदा" देते रहे दस्तक वारिसशाह,
किसी के ख्वाबों में अमृता तू भी तो आई होगी ।


सोमवार, 27 अप्रैल 2009

दुआ बददुआ बन जाती है . . .

ये न सोचना की दुआयें बेअसर होती हैं,

असर होता है इनका तो हर शय बेअसर होती है ।

न आजमाना कभी किसी की दुआ को वरना,

दुआ बद्दुआ बन जाती है तो कहर होती है ।

महफिले सजती रही, रातें जगमगाती रही,

कौन जाने किस पल आज किसकी सहर होती है ।

टूटते सपने जाने कितने, तो भी बनती नई आशाएं,

जाने कौन वो आशाएं, पूरी किस पहर होती हैं ।

मिलना और जुदा होना, सदा खेल है तकदीर का,

जिन्दगी है जो इन सब बातो से बेखबर होती है ।

शनिवार, 25 अप्रैल 2009

चुरा लिये जिन्‍दगी ने . . .

हसरतों के समन्‍दर में जब - तब,
एक नई हसरत जन्‍म लेती रही ।

चुपके से उसको बहला दिया मैने जब,
देख बेबसी मेरी वो भी दफन होती रही ।

घुटन, दर्द, आंसू भी उसके न हुये जब,
पल- पल वो पराई खुद से होती रही ।

लुटा दिया उसने यूं तबस्‍सुम का खजाना,
खोखली हंसी से खुद ही आहत होती रही ।

चुरा लिये जिन्‍दगी ने हर हंसी पल उसके,
फिर भी ‘ सदा' वो उसकी बन्‍दगी करती रही ।

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

एक वृक्ष नया . . .

कहती नही है कभी भी,
टहनी अपने भार को,
इतराती है नजाकत से
पत्तो के संग लहराती,
वो हर पल मुस्काती,
ठंडी बयार से,
कहती नही है .....।
लचक जाती जब वह
फलो के भार से,
थोड़ा सकुचाती झुक जाती,
फिर सब के मनुहार से,
कहती नही है .....।
मन विचलित है,
भीगे नयन हैं,
धरा पर पड़ी
निर्जीव सी हो के

अलग वृक्ष से
कहती नही है .....।
विदाई की बेला
निकट आ गई
आघात तुम पे हो
इससे पहले मैं कुछ
कहने धरा पे आ गई
कहती नही है .....।
मेरा अंत तो ठीक है,
हो सके तो रोक दो
इस अन्याय को
मैंने तुमको इतना कुछ,
है दिया अब तुम लगा के
एक वृक्ष नया
मुझे न्याय दो
कहती नही है .....।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

ऊंचे दरख्‍तों के साये में . . . .

कुछ भलाई के काम कर, औरों के काम आ,
नाम चट्‌टानों पे लिख कोई मशहूर नहीं होता ।

आंखों में बसने के संग सांसों में पला हो जो,
फ़कत कह देने से वह दिल से दूर नहीं होता ।

खुद से खफ़ा है तू औरों से खुश क्‍या होगा,
मायूस दिल हो गर तो चेहरे पे नूर नहीं होता ।

ऊंचे दरख्‍तों के साये में छांव, चाहे न लगे,
लेकिन ठंडी हवाओं से वो दूर नहीं होता ।

ख्‍वाहिशों के समन्‍दर में लगाता है गोता हर कोई,
हकीकत का मोती ‘सदा' हर मुठ्‌ठी में नहीं होता ।

सोमवार, 20 अप्रैल 2009

कोई मरहम नही रखता यहां . . . .

मुझसे पूछ तो मैं सच बतलाऊं तुझको लोगो के पास,
अपने दुख और दूसरों की ख़ुशियों का हिसाब होता है।

घाव पे किसी के कोई मरहम नही रखता यहां पर,
सब के पास बस अपने जख्मों का हिसाब होता है ।

कहने दे जिसे जो कहता है बुरा मत माना कर तू,
ऊपर वाला अच्छे-बुरे सबका हिसाब कर लेता है।

कोई किसी का खुदा नहीं होता मत डरा कर किसी से,
सबका मालिक तो एक है जो खुद हिसाब कर लेता है।

इंसान की फितरत है अच्छे दिन भूल जाता है अक्‍सर वो,
गर्दिश में जो दिन गुजरे ‘सदा' उनका हिसाब रख लेता है।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

हौसले हों गर बुलन्‍द . . .

बातें करता सागर की तो उसका दायरा बड़ा है,
तू नदी की बात कर, उसकी गोद में पला है।

मजबूत इरादों को बना, और खुद फौलाद बन,
तेरे साथ - साथ औरों का भी इसमें भला है।

जज्‍बाती होना अच्‍छी बात है, पर जज्‍बातों के,
साये में तो किसी का, जीवन नहीं चला है।

घबरा जाना, फिर किस्‍मत पे छोड़ देना सब कुछ,
ठीक है, कभी-कभी, पर सदा नहीं, तेरा भला है।

हौसले हो गर बुलन्‍द ‘सीमा' मेरी बात पे यकीं कर,
फिर कौन सा काम, कल पर किसी का टला है।

सोमवार, 13 अप्रैल 2009

बंदिशें लगा के देखा है मैने . . .

दर्द से मेरा रिश्ता बहुत है पुराना,
आंसुओं का भी है यहां आना-जाना ।

कुछ अश्‍क दूर तक आ के, ठहर जाते हैं तो,
कुछ का काम होता है, केवल छलक जाना ।

सुनाता हूं दास्‍तां जब अधूरे प्‍यार की, कहता हूं,
बन्‍द कर दो अब तो यूं अपना आना-जाना ।

तमाम बंदिशें लगा के देखा है मैंने उस पर,
न बंद हुआ उसका, मुझे यूं सरेआम रुलाना ।

तनहाई के साये में ही ‘सदा' गुजरा मेरा हर पल,
शान में था उसकी हर महफ़िल की जान बन जाना ।

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

चांदनी से मुलाकात का . . . . .

शाम ने ढलते - ढलते दिया,
संदेश चुपके से रात का !

सितारो ने राज बतलाया,
चांदनी से मुलाकात का !

सात घोड़ों पे सवार सूरज्,
आया दिन की शुरुआत का !

लम्हा-लम्हा "सीमा" पल बीता,
समझाया मतलब हर बात का !

सब यूँ ही आते जाते रहते है,
रहा नहीं वक्त यूँ जज़्बात का !

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

चाहत नाम है वफ़ा का

नजर से नज़र मिलने का कसूर इतना ही होता है,
दीवारें कितनी भी उठाये कोई एतराज नही होता है !

आ गया जो दिल किसी पे तो क्या करेगे आप्,
इश्क को देखिये हुस्न का मोहताज नही होता है !

जोश, और जुनून का आलम होता है दिल में हरदम,
कदम कितना भी आहिस्ता उठे बेआवाज़ नहीं होता है !

चाहत नाम है वफ़ा का ये जज्बा नेमत है खुदा की,
छुपाये कोई कितना भी, पर ये राज़ नहीं होता है !

राजा रंक ना जाने ये, जात-पात ना माने ये, चाहत मै,
मानो तो कोई किसी का "सीमा" सरताज नहीं होता है !

sada

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

वादा क्योंकर किसी का टूट जाता है ‌. . .

कोशिशे अक्सर कामयाब होती हैं,
वादा क्योंकर किसी का टूट जाता है ‌!

घर याद होता है ना मंज़िल का पता,
जब दिल किसी का टूट जाता है !

दे के आवाज बुलाये चाहे कोई चाहे कितना,
हांथ जब हांथ से किसी का छूट जाता है !

फना हो जाती है यू ही जिंदगी एक दिन्,
रिश्ता साँस का जब साँस के टूट जाता है !

जतन कर जोड़े कोई कितना ही, नहीं जुड़ता,
ये माटी का खिलौना "सीमा" जो टूट जाता है !

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

बेखबर था वो खुदा की खुदाई से . . .

मेरी खामोशी का मतलब ये लगाया उसने,
डर गया हूँ मैं कत्लेआम इसतरह देख के !

बेखबर था वो खुदा की खुदाई से वरना,
मुस्कराता ना वो लोगों को रोते देख के !

गुजर जायेगा बुरा वक्त पोछ्ते हूये अश्क,
हमनशी ने कहा मुझे यूँ गमज़दा देख के !

नापाक उन इरादो को वतन के रखवालो ने,
किया खत्म अपनो को यूँ बंदिश में देख के !

में शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने की कुर्बान जिंदगी,
कई बेगानो को "सीमा" मौत के मुँह में देख के !

बेखौफ ही निकले दम मेरा

बेखौफ जिया था अब तक में इसलिए,
ख्वाहिश थी बेखौफ ही निकले दम मेरा !

निशाने पे में ख़ुद रहूँ या कोई ओर सच है,
ये उनसे लड़ने को सदा करेगा मन मेरा !

भय नही, डर नही, जां अपनी देने का,
कायम रहे ये चमन, यही था यतन मेरा !

आतंक रहेगा ना नामों निशा, रहेगी ये दास्ता,
लड़ने की जिस दिन "सीमा" ठानेगा वतन मेरा !

जो लड़े उनसे वो भी, किसी माँ के लाल थे,
कह गए रखना संभाल के यही है वतन मेरा !

बात जब होगी शहादत की नाम उनका आयेगा,
हर जुबा पे, उन रणबांकुरो को है नमन मेरा !

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....