बुधवार, 27 मई 2009

फिर से जी लूंगी . . .

मन ही मन मैं,

तेरा नाप लेकर,

बनाती रही तेरे,

तन के कपड़े  

नहीं ये छोटा होगा,

नहीं ये होगा बड़ा,

करती खुद से जाने

कितने झगड़े

तन के कपड़े . . . ।

 

तू गोरी होगी,

या सांवरी

मैं भी बावरी बन

सजाती रही गुडि़या पे

तेरे वो कपड़े

तन के कपड़े . . . ।

 

झलक तेरी आंखों में

लेकर सोती तो,

ख्‍वाबों में फिरती

तुझको पकड़े-पकड़े

तन के कपड़े . . . ।

 

मैं अपना बचपन

फिर से जी लूंगी

तू आ जाएगी तो

मिट जाएंगे सारे झगड़े

तन के कपड़े . . . ।

मंगलवार, 26 मई 2009

मन को मार कोई ना पाया . . .

मन की बातों को ना कर के वह खुश हो जाता,

अपने आप में सोचता मैने मन को जीत लिया ।

घड़ी दो घड़ी का भ्रम उसके जीवन में कटुता भरा,

कहता कैसे मन पर अपने ही यूं आघात कर लिया ।

मन की चंचलता का क्‍या है वह हमारी खुशी में खुश,

हमारे गम में दुखी जाने तूने फिर क्‍या जीत लिया ।

 मन को मार कोई ना पाया अरे तू तो उसका साया है,

समझा कर तुझको ये बातें उसने है तुझको जीत लिया ।

मन में है हर बात छुपी, आस, विश्‍वास, नेकी, और बदी,

कैसे सदा उसको ना कर कहता तू तूने उसे जीत लिया ।

सोमवार, 25 मई 2009

संवेदनाओं के शिखर . . .

मन मेरा जो इतना आहत है,

फिर क्‍यों इस दिल में चाहत है ।

अन्‍तर्मन में खोखली हंसी के कहकहे,

कहते हों जैसे, कैसे लबों पे मुस्‍कराहट है ।

संवेदनाओं के शिखर अब ढहने लगे हैं,

नयनों में भी अश्‍को की छटपटाहट है ।

सच्‍चाइयों की बस्तियां वीरान हैं जबसे,

झूठ की ऊंची इमारतों में जगमगाहट है ।

बेनकाब हो के सदा मायूसी ये बोली मुझसे,

किसके लबों पे आज सच्‍ची खिलखिलाहट है

शुक्रवार, 22 मई 2009

लौट आती देह में . . .

जल ही जीवन है,

नहीं इसके बिना कोई जीवन है,

एक बूंद से,

निश्‍वास होती सांस

लौट आती देह में,

जल ही जीवन है . . . ।

समझो तो सार इसका,

मीन से, जब तक,

जल में रही

सब कुछ इसका था जल,

सांस, आस, विश्‍वास,

न होती एक पल स्थिर,

न आती एक पल उदासी,

चंचलता हर पल रहती,

इसके साथ,

जल ही जीवन है . . . ।

हर ओर था जीवन,

सब ओर था उल्‍लास,

लेकिन जल में रहकर भी,

नहीं बुझी थी प्‍यास,

जीवन था उसका जल,

जल ही जीवन है . . . ।

नहीं रह पाता

कोई भी निर्जल

जल ही जीवन है . . . ।

बुधवार, 20 मई 2009

बन्‍द कर के मुठ्ठी . . .

उम्र भर का रिस्‍ता वो तोड़ आया पल में,
जाने क्‍या देखा उसने आने वाले कल में ।

पलकों पे उसकी आंसू लबों पे तबस्सुम,
सारी यादों को जो छोड़ आया पल में ।

बन्‍द कर के मुठ्ठी खुद को ही दोष देता,
कैसे मैं आ गया उस बेवफा के छल में ।

बुराई का बदला बुराई मिला है नहीं समझा,
कोई, कैसे समझ पाता वो नादां इक पल में ।

कैसे मिटाऊं इन फासलों को ‘सदा’ के लिये,
बता दे मुझे तू आने वाले हर एक पल में ।

सोमवार, 18 मई 2009

पाने को उजास . . .






भविष्य की कोख में तेरे लिये क्या पल रहा है,
मत सोच देख सूरज, आज का फिर ढल रहा है ।


जो रह गया है काम बाकी पूरा कर ले वह भी,
तेरा काम आज का फिर, कल पर टल रहा है ।


आ गये आसमां पे सितारे, चांद भी आता होगा,
आज का दिन भी अब तो, कल में बदल रहा है ।


जल गई शमां रौशन करने को महफिल किसी की,
देखो परवाने को कैसे, उसपे हर पल मचल रहा है ।

उसे खबर है कि जल जाएगा, फिर भी पाने को उजास,
बेखबर मौत से अपनी, खुशी-खुशी खुद को छल रहा है ।

शनिवार, 16 मई 2009

जगजाहिर हो जाता झूठ . . .

जिद मत किया कर छोटी-छोटी बातों की,
बन जाता है अफसाना इन छोटी बातों से ।

रूसवाई को जनम देते हैं जाने-अनजाने ये,
छिन जाती है खुशियां ही इन छोटी बातों से ।

दब जाती है उजली सच्‍चाई मन की मन में,
जगजाहिर हो जाता झूठ इन छोटी बातों से ।

जख्‍म गहरे वो जाने कब नासूर हो जाते हैं,
ताउम्र नहीं भरते उपजे जो इन छोटी बातों से ।

मुश्किलों का काम है आना और जाना तुझे तो,
खुद को बचाना है सदा इन छोटी-छोटी बातों से

शुक्रवार, 15 मई 2009

वक्‍त होकर भी नहीं होता जब . . .

मेरे चुप रहने की आदत को उसने जाने क्‍यों,
मान लिया मन ही मन खुद से डरपोक हूं मैं ।

किसी बड़े की बात को सिर माथे लिया जब मैने,
तो भी हां कहने पर मेरे सोचा ये डरपोक हूं मैं ।

ना करने की आदत सीख ली होती अगर मैने,
तो शायद नहीं कहते मुझे वह कि डरपोक हूं मैं ।

वक्‍त होकर भी नहीं होता जब उनके लिये तो कहते,
व्‍यस्‍त होगा, कह नहीं पायेंगे चाहकर भी डरपोक हूं मैं ।

जैसे बेअदब हो गये हैं यह यदि मैं ऐसा न बन पाया,
तो क्‍या मुझे सुनना पड़ेगा ‘सदा’ यही डरपोक हूं मैं ।

मंगलवार, 12 मई 2009

कुछ भरम में रख . . .

मुझसे इस कदर दुश्मनी न कर की ,
दोस्ती से उठ जाए यकीं लोगो का ।

कुछ भरम में रख मुझे औरों को भी रहने दे,
मर न जाए ऐसी बातों से ज़मीर लोगों का ।

मैं कैसे मन लूँ नेक इंसान उस शख्स को,
जो समझता है ख़ुद को खुदा लोगों का ।

ये ठीक है तेरा ओहदा ऊँचा है हम सबसे,
बनाने में तुझे बड़ा, हाँथ है इन्ही लोगों का ।

हालात से इस तरह "सदा" मत कर समझौता
वरना हक़ मांगेगा कौन कमज़ोर लोगों का ।

सोमवार, 4 मई 2009

आंखों में नमी . . .


वफ़ा की चाहत में हम भटके थे बहुत,

मिली जो बन के मुहब्बत तो रास न आई ।


दर्द लिए जुदाई का बहुत दूर चले जाना चाहा,

तमन्ना थी जो मौत की तो पास ना आई ।


रहे तन्हा जिन्दगी का सफर कटा अकेले ही,

जब तक जियेंगे रहेगी साथ मेरी तन्हाई ।


राहे शौक में गर कदम मेरे डगमगाते न,

सच कहें होते ना तेरे हम यूँ तमन्नाई ।


हाले दिल सोचा जब भी "सदा" तुमको बताना,

फकत लबों पे दर्द आँखों में नमी थी उभर आई ।


शनिवार, 2 मई 2009

स्वर लहरी . . .


ऊँचे लंबे पर्वतों,

के बीच वो शांत,

निर्मल नदी जिसकी,

कलकल करती

स्वर लहरी, अक्सर

पर्वतों को विचलित करती,

ऊँचे लंबे . . . !

सोचते जबतब

हम यूँ जाने कब तक,

खड़े रहेंगे एक जगह,

काश, हम भी इस,

श्वेत सरिता से बहते,

बात अपने मन की,

किसी से कहते,

ऊँचे लंबे . . ।

उधर सोचती

धवल नदी,

मुझसे भले यह पर्वत हैं,

एक जगह खड़े तो हैं,

तनिक भी जीवन में

विश्राम नहीं

क्यों कर जीवन में,

पल भर भी

आराम नहीं . . !

ऊँचे लंबे . . . !



शुक्रवार, 1 मई 2009

बदल जाए जो हालातों से . . .

उड़ के छू लूँ मैं गगन - कहता तो है हर एक मन,
हाँथ बढ़ा के छू ले - नहीं आदमी में अभी ये फ़न ।

एक मकाम जो मुझको पाना है,
खुशियों तुम्हे मेरे घर आना है ।

राह में कभी आयेंगी जो मुश्किलें,
ऐसे में बिल्कुल नही घबराना है ।

हौसला हो मन में गर कुछ करने का,
ऐसे में पड़ता तूफान से भी टकराना है ।

बदल जाए जो हालातों से वो क्या शख्स,
बदल दे जो हालातों को हमने उसे माना है ।

झुका है ना सर तेरा कभी ना ही झुकेगा,
इसे तो बस "सदा" रब के आगे ही झुकाना है ।




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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....