शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

हद़ की लक़ीर !!!!!!
















कुछ शब्‍द चोटिल हैं,
कुछ के मन में दर्द है अभिव्‍यक्ति का,
हाथ में कलम हो तो
सबसे पहले खींच लो एक हद़ की लक़ीर
जिसे ना लांघा जा सके यूँ सरेआम
बना लो ऐसा कोई नियम
कि फिर पश्‍चाताप की अग्नि में ना जलना पड़े
मन की खिन्‍नता ज़बान का कड़वापन
जिन्‍हें शब्‍दों में उतारकर
तुमने उन्‍हें अमर्यादित करने के साथ् ही
कर दिया ज़ख्‍मी भी !
.....
उठती टीसों के बीच
सिसकियाँ लेते हुए शब्‍द सारे
अपनी व्‍यथा कहते रहे
पर सुनने वाला कोई ना था
सबके मन में अपना-अपना रोष था
अम़न का प़ैगाम बाँटने निकले थे
ज़ोश में खो बैठे होश
अर्थ का अनर्थ कर दिया  !!!
....
मन के आँगन में जहाँ
शब्‍द-शब्‍द करता था परिक्रमा  भावनाओं की
जाने कब वर्जनाओं के घेरे पार कर
बनाने के बदले बिगाड़ने में लग गया
रचनाकार उसके स्‍वरूप को
वक्‍़त औ' हालात की ज़रूरत एकजुटता है
क़लम ताक़त है न कि कोई क़टार
जिसे जब चाहा उतार दिया
शब्‍दों के सीने में और कर दिया उन्‍हें बेजुबान
अगर कहीं जरूरी है कुछ तो वो है
हद़ की लक़ीर !!!
जिसे खींचने के लिए फिर चाहे
क़लम आगे आए अथवा व्‍यक्तित्‍व !
....

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

पुराने नियम बदल डालो !!!!!!

शब्‍द आहत हो गये हैं
चीखते-चीखते
मर्यादायें सारी
बेपर्दा हुई हैं जबसे  !
माँ मुझे तुमने
खेलने के लिये गुडि़या नहीं
बल्कि हथियार दिये होते
तो हर बुरी नज़र के उठने से पहले ही
मैने जाने उन पर कितने ही
वार किये होते !!
....
नज़र बदली है इनकी तो,
तुम भी हौसले से
अपनी सारी नसीहते बदल डालो,
बेटी को या तो जन्‍म मत दो
देती हो जन्‍म तो
इनको नज़ाकत से पालने के सारे
पुराने नियम बदल डालो !!!
...
तुम्‍हारे अंश पर बुरी नज़र,
बुरी नियत की शंका
कैसे करता है कोई
उसके लिये तिरस्‍कार की सीख
अपनी परवरिश में डालो
मुझको सुरक्षित रखने की नहीं
बल्कि सुरक्षित होने की
आदत जन्‍म से डालो !!!!!!
....
भरोसे की चादर
ओढ़कर घर से नहीं निकलना है मुझे अब,
जाने कब हवायें
वहशत की चलने लगें !!!
...
परी कथा या लोरी सुनाने के बजाये,
तुम सुनाना उनको अब
दामिनी औ' गुडि़या के साथ
क्‍या हुआ था
सच माँ देती हो जन्‍म तो
इनको नज़ाकत से पालने के सारे
पुराने नियम बदल डालो !!!!!!

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

वही ऊँचाइयों की जिद़ !!!!













अतीत के धागों को कितना भी काटूँ
मन के माँझे से
फिर भी यह जिंदगी की पतंग  उड़कर
दूर पहुँच ही जाती बादलों के पार
वही ख्‍वाहिशें मस्‍ती की,
वही ऊँचाइयों की जिद
हथेलियों में डोर रहती किसी और के
फिर भी कहाँ परवाह रहती इसे इन बातों की
यह दिल तो सिर्फ उड़ान भरना जानता है !
...
जिद् की टहनी पकड़कर
जब भी शब्‍दों ने डाले हैं झूले
कभी महकी हैं फिज़ाये
कभी गुनगुनाया है गीत
जोर से चिल्‍लाया है कोई नन्‍हा कोटर से
उसे इंतजार है अभी उड़ने का
पंखों को फैलाने का
एक उड़ान माँ के साये में भरने का
उड़ना उड़ते जाना
फ़कत इतना सा ख्‍वाब था
हवाओं ने जाने कितनी बार गुमान किया था,
पर कहाँ परवाह थी इन्‍हें हवाओं की
उसे तो बादलों के पार जाना था,
अपनी खुशियों के संग
पल-पल मुस्‍कराना था !!!!
...

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

चला फिर साथ कितनी दूर तलक कोई !!!!



















शब्‍दों का मरहम तो लगाया होगा तुमने जाने कितनी बार
कभी रोते हुये को भी हँसाया होगा तुमने जाने कितनी बार  ।

सहमी है जिंदगी कतरा-कतरा हर ख्‍वाब दफन होता हो जहां,
इन हालातों में कहते हो संभल के चलना जाने कितनी बार ।

रिश्‍तों की डोरियाँ बूढ़ी हो चली हैं जाने कब कौन साथ छोड़ दे,
लगाकर गाँठ तुमने इनको चलाया भी होगा जाने कितनी बार ।

चला फिर साथ कितनी दूर तलक कोई ये कहना जरूरी तो नहीं,
थक कर मन को अपने समझाया होगा तुमने जाने कितनी बार ।

मंजिले अपनी जगह ठहरी रही कदम बेतहाशा दौड़ा किये फिर भी,
रूठा मेरा नसीब पहुँचने से पहले उन तक सदा जाने कितनी बार ।


शनिवार, 6 अप्रैल 2013

फिर से पल्लिवत होने को!!!!

मन के आँगन में
स्‍नेह का बीज बचपन से ही
बो दिया गया था जो वक्‍त के साथ
पल्लिवत होता रहा जिस पर
सम्‍मान का जल सिचित करते-करते
स्‍वाभिमान की डालियों ने
अपना लचीलापन नहीं खोया
जब भी आवश्‍यकता हुई
वो झुकती रह‍ीं
फिर चाहे उन्‍हें झुकाने वाला
कोई बड़ा होता या बच्‍चा
वो सहर्ष तैयार रहतीं
तपती दोपहर में वो छाया बन
शीतलता देती
....
जोर की आँधियों में
टूटकर गिरते वक्‍त भी
कोई आहत न हो
किसी को चोट न पहुँचे
खुद के जख्‍मों से बेपरवाह
रहते हुए भी वो जिंदगी को जीते-जीते
सूखकर लकड़ी हो जाती
तो जलाई जाती
सुलगती, जलती फिर कोयला होती
यूँ ही फिर वो राख हो,
इक दिन फिर मिल जाती माटी में
किसी बीज के अंकुरित होने का
करती इंतजार
फिर से पल्लिवत होने को!!!!

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

कुछ टूटने से पहले ....

उसने मुझसे इक दिन
भीगी आँखों से कहा
ये मुहब्‍बत भी
बहुत बुरी शय होती है
किसी और की खबर
रखते-रखते
खुद से बेखबर हो जाती है
...

कुछ टूटने से पहले
आवाज हो
ये जरूरी तो नहीं
तुमने देखा तो होगा
फूलों का खिलना
और बिखर जाना चुपके से!!!
....

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....