शनिवार, 30 जून 2012

पुस्‍तकें मानव की सबसे बड़ी मित्र हैं ...














पुस्‍तकें मानव की सबसे बड़ी मित्र हैं,
कह दो तो ये जीवन का पूरा चरित्र हैं ।

स्‍वस्‍थ्‍य चित्‍त का विकास करके ये, 
भरती  प्रेरणा और विश्‍वास  का इत्र है ।

खुश्‍बू इनकी रच जाती है जीवन में जब भी,
इतिहास रचता विद्वता का सबल चरित्र है ।


ज्ञान का दीपक जलाकर ये फैलाती प्रकाश जब,
कह उठता मन इनसा नहीं कोई दूजा पवित्र है । 

व्‍यक्तित्‍व अधूरा है मन अज्ञानी बिन इनके,
उनका रहता है सदा जिनकी नहीं ये मित्र हैं ।

गुरुवार, 28 जून 2012

रूपया दिनों दिन ....

रूपया दिनों दिन
कमजोर होता जा रहा है,
जरा ग़ौर  करो तो
नब्‍ज़ की गति पर
अर्थव्‍यवस्‍था की तबियत
ठीक नहीं है
इलाज सुझाई नहीं दे रहा
देश गंभीर रूप से
बीमार होता जा रहा है
सब नीम - हकी़म बने बैठे हैं
श्रेष्‍ठ चिकित्‍सक
अपने - अपने नुस्‍खे
आज़मा रहे हैं
लाभ कुछ भी नहीं
अर्थ इतना शिथिल हो चुका है
उसकी कराह किसी के कानों तक
नहीं पहुँच रही
अर्थ तो बस व्‍यर्थ हुआ जा रहा है
रूपया दिनों दिन
कमजोर होता जा रहा है ...

सोमवार, 25 जून 2012

कहाँ हो तुम ???

भोर की पहली किरण के संग
तुम्‍हारा ख्‍याल दबे पांव आकर
जाने कब मेरे सिरहाने
आकर पलकों में समा जाता
मैं उन्‍हें मूंदे - मूंदे ही
तुम्‍हारी सोच के साथ
पलकों को उठाती
हथेलियों से ढांपती चेहरे को
पूछती कहाँ हो तुम ???
...
तुम्‍हारा आना ख्‍यालों के संग,
आज भी वैसा है जैसे
मोबाइल से मैसेज सेंड करना
आम हो गया है
दूरियां मीलों की लाख सही
अहसास उसका हमारी हथेलियों में
सिमटा हुआ है
कभी कोई स्‍माइली जीभ चिढ़ाते हुए
कभी उछलते हुए आता है जब
तुम्‍हारा चेहरा सजीव हो उठता है
...
मन दर्पण की तरह
उदासियों के बीच
तुम्‍हारे हर ख्‍याल में
अपना प्रतिबिम्‍ब देखता
झांकता तुम्‍हारी हँसी को
निहारता पलटकर कभी
फिर अपनी बेबसी को
मुस्‍कराने का वादा तो
मैने भी किया था तुमसे
पर सच कहूँ
बिन तुम्‍हारे जीने का 'जी'
बिल्‍कुल नहीं करता!!!

शनिवार, 23 जून 2012

ये जमा पूँजी ... !!!

मन आज अकेला नहीं
रहना चाहता
वह खोज रहा है अपनी टोली
कुछ शैतानियां कुछ जिज्ञासाओं को
अपने काँधे पे बिठाकर
आ बैठा आंगन में 
यादों की गुल्‍लक को सीने से लगाये
जिसमें डाले थे कभी कुछ पल
हँसी के कुछ अपनेपन के
कुछ कीमती लम्‍हे थे
तुम्‍हारे साथ बिताये हुए
ये जमा पूँजी सम्‍बंधों की स्‍नेहवत
मैने तुम्‍हारे कहने पर ही
सिंचित की थी
...
आओ तुम भी शामिल हो जाओ
मेरी इस टोली में
तुम्‍हारी शैतानियां मेरी शै‍तानियों के
कान खींचती हैं तो
दर्द में भी एक मुस्‍कान होती है
फिर तुम्‍हे तंग करने का
मौका कैसे जाने दूँ
आज मैं टोली के साथ हूँ
बस एक कमी है
वो तुम्‍हारे आने से दूर हो जाएगी
...

गुरुवार, 21 जून 2012

मन का सच्‍चा होना !!!














कुछ शब्‍द बड़े - बड़े अर्थों के साथ
अपनी आकांक्षाओं की सीढिंयां चढ़ते हुए जब
मन के आंगन में एक पंक्ति की रचना करते
मन मंद - मंद मुस्‍कराता
अगली पंक्ति के शब्‍दों को सीढि़यां चढ़ते देखता
तभी जाने कोई एक ख्‍याल तुम्‍हारा
हिला देता सी‍ढ़ी को
सारे के सारे शब्‍द एक दूसरे के ऊपर
भरभराकर गिर पड़ते
पंक्ति अधूरी रह जाती इस अधूरे पन को
समझ पाना सबके लिए संभव नहीं
जब तक सृजन न किया हो उसने
रची न गई हो कोई रचना उसके द्वारा
भला उसका बिखरना कैसे समझ सकता है वो!
....
सृजन में नेह भी है और स्‍नेह भी
त्‍याग के संग समर्पण भी
आकार भी है इक विचार भी
पीड़ा भी है अभिलाषा भी
आस्‍था के धरातल पर
विश्‍वास का अम्‍बर भी
संस्‍कृति के परिधानों में
छिपी हुई मन की परतों को
उकेरता है बिंदु दर बिंदु
सत्‍य कहता कभी झकझोरता
परखता कसौटी पर शब्‍दों को
ह्रदय की कठोरता को आंकता
तोलता वक्‍़त की तुला पर जब !!
....
बड़ी बेबाक़ी से
भाषा समृद्ध होती सगर्व़
मुस्‍कराती स्‍नेह से
तुम ही तो कहते हो
भाषा कोई भी हो शब्‍दों का
अपना एक जा़दुई संसार होता है
जिसे समझने के लिए
मन का सच्‍चा होना बहुत जरूरी होता है !!!

सोमवार, 18 जून 2012

मैं बेनका़ब हो जाऊँ ... !!!

कभी भी टांग देना खुद को
उदासी की खूंटी पर
हँसी का पर्दा लगाकर
कसकती आत्‍मा
पर्दे के भीतर
टोह लेती रही
आते-जाते चेहरों का
सच पढ़ती
और मायूस हो
दुआ करती
बस एक बार
जोर की आंधी आ जाए
और मैं बेनका़ब हो जाऊँ
...

शुक्रवार, 15 जून 2012

कफ़न में लिपटी मुहब्‍बत

कतरा-कतरा मुहब्‍बत ने जब दम तोड़ा
नफ़रत की दहलीज़ पे
मत पूछ मेरे क़ातिल किस तरह
फिर मैं मुहब्‍बत के ज़नाज़े में
शामिल हुई
...

बेवफ़ाई शिक़ायत फ़रेब बेक़सी
चार कांधे उसको मिले
बेगानों से
परायेपन के कफ़न में लिपटी मुहब्‍बत
दुआओं के फ़ूलो को तरसती हुई
दफ़न हो गई
बददुआ की खाक़ पर

बुधवार, 13 जून 2012

रिश्‍ता कोई भी हो !!!


















मस्तिष्‍क कोई उपजाऊ भूमि नहीं
जहां एक शब्‍द के बदले में
तुम पा सकोगे अनेक शब्‍द
प्रत्‍येक शब्‍द की उपज के लिए
मस्तिष्‍क को दिल के रास्‍ते
रूह तक पहुंचना होता है
समेटना होता है
कितने ही अर्थों में हर शब्‍द के भाव को
विचार मन की सम्‍पत्ति है
जो पनपते हैं पोषित होते हैं
और पल्‍लवित होते हैं
हमारे संस्‍कारों से
....
विचार भी बीज की तरह हैं
जो शब्‍दो से पनपते हैं
समेटते हैं भावनाओं को
बनाते हैं एक रिश्‍ता
रूह से रूह का
मन को संयम का
पाठ पढ़ाते हुए  सिखाते हैं
उंगली पकड़कर चलना
....
रिश्‍ता कोई भी हो
वो यूँ ही किसी की परवाह नहीं करता
रिश्‍तों का पालन-पोषण
करने के लिए
दिल के दरवाजे पर
दस्‍तक़ देनी होती है 
क्‍यूँ कि तुम ही तो कहते हो
रिश्‍ते दिमाग का नहीं
दिल का मामला होते हैं !!!

सोमवार, 11 जून 2012

जिसका कवच तुम हो ... !!!












विचारों की भीड़ में गुम
ढूंढती हूँ एक ऐसा विचार
जो तुम्‍हारी तरह
मजबूत हो
जिसका नाम लेते ही
हर कमजोर हौसला जी उठे
एक नई ताकत लेकर
.....
मजबूती ही नहीं है तुम्‍हारे पास
अदम्‍य साहस की भी धनी हो तुम
मैने देखा है जाने कितने ही
कमजोर पलों को
जीवनदान देते हुए तुम्‍हें !!
...
जिन्‍दगी जब भी कभी खुद से हैरान हो
सवाल करती है ढेरो
तब तुम देती हो दिशा एक नई उसे
विचलित होता है मन जब भी
समझाती हो उसे
परिस्थितियां जब भी अनुकूल नहीं होती हैं
तुम दिखलाती हो
नदी के ठहरे हुए पानी को
ठहराव में ही एकत्र होते हैं
झांड़-झंकाड़ और गंदगी
ठहरना क्‍यूँ ??
सतत् बहते रहने में ही जीवन का सार है
आओ आगे बढ़ो मेरे साथ
उंगली पकड़ चल पड़ती हो
मार्गदर्शक की तरह ...
....
तुम रोज सुबह
हम सबके चेहरे पर
एक मुस्‍कान देती हो विश्‍वास की
स्‍नेह की रेखा को  खींचती हो
अपनी मजबूत उंगलियों से
इस छोर से लेकर उस छोर तक
तभी तो हम सब
बंधे हुए हैं इस एक ही सूत्र में
जिसका कवच तुम हो
कहो तो कौन हमें
विलग कर सकता है ... !!!

शुक्रवार, 8 जून 2012

एक विस्‍तृत आकाश है ... !!!














मेरे पास तुम्‍हारी सोच का
एक विस्‍तृत आकाश है
जो मुझे कहीं भी
डगमगाने नहीं देता
मुझे उड़ने का हौसला देकर
मेरे पंखों को सहलाता है जब भी
मुझे ऊंचाईयों से भय नहीं लगता
तुम साथ - साथ उड़ती हो
बन के हवा जब मेरे नन्‍हें पंख
शिथिल होने को होते
तुम मेरे कानों में
आकर चुपके से कहती
देखो तो मंजिल कितनी पास है
क्‍यूँ घबराना
हम पहुँच गए हैं अब तो विजय द्वार पर
...
हारने का तो प्रश्‍न ही नहीं
तुम्‍हें आज मैं एक सच बतलाती हूँ
हार को लोग नहीं देखते
लोग सिर्फ विजय का स्‍वागत करते हैं
पराजय का सामना तो सिर्फ
मन करता है और मस्तिष्‍क लड़ता है
वक्‍़त कभी भी बुरा नहीं होता
वो तो सबके लिए एक समान होता है
बुरे तो हालात होते हैं
....
तुमने देखा है न कच्‍ची मिट्टी को
पानी पड़ते ही कैसे घुल जाती है
पानी के साथ बह जाती है
लेकिन उसी मिट्टी के घड़े में
पानी कितने दिनों तक  सुरक्षित रहता है
क्‍यूँ कि वह आग पर पकाया हुआ होता है
जो जितना तपता है उतना ही कुंदन होता है
हर कसौटी पर  खरा उतरता है
चाहे तुम उसे फिर कितना भी परख़ लो ...  !!!
...

बुधवार, 6 जून 2012

'' तुम मेरी जिन्‍दगी हो ''














तर्जनी और मध्‍यमा के साथ
अंगूठे के पोर में
सिमटी कलम कागज के साथ
खेलना चाहती है
कहना चाहती है कोई नया शब्‍द
जो तुम तक पहुंच कर
हिला दे तुम्‍हारे अन्‍तर्मन को
...
कभी हँसी का प्रतीक बना
तुम्‍हारे चेहरे की कल्‍पना करती
और मुस्‍करा देती मन ही मन
कभी लिखती ... नहीं समझे !
और फिर खुद ही
हँस देती ... जब कहूँगी
तब तो कुछ समझोगे ...
....
विस्मित सा कागज !! सोचता रहा
बड़ी देर तक
क्‍या कहना है
क्‍या समझना है
भला मैं क्‍या जानूँ कुछ लिखो तो
कोई शब्‍द जिसके अर्थ गहरे हों
भले उस पर लाख पहरे हों
तभी उसने देखा
कितनी आत्‍मीयता से उसने
लिखा था ये
'' तुम मेरी जिन्‍दगी हो ''
और मुझे त़ह कर रख दिया
डायरी के बीचो बीच
कलम का ठहरना  कागज का सिमटना
ये त़य कर चुका था
अब शेष नहीं कुछ कहने को .... !!!

सोमवार, 4 जून 2012

ताकि शंखनाद कर सकूँ !!!


















मैने आज कोई फूल
किसी देवता के
श्रीचरणों पर नहीं चढ़ाया
ना ही किया है मंत्रोच्‍चार
ना ही किया किसी देव प्रतिमा के आगे
अगर का धुंआ
बांधे नहीं वंदनवार श्रद्धा के
तेरा तुझको अर्पण की भावना  ने
मन की हर आराधना को जाने क्‍यूँ
विरक्‍त कर दिया है
...
हाँ ये और बात है  कि
तुम्‍हारे चेहरे पर अब भी
मंद मुस्‍कान कायम है
तुम अपना प्रतिबिम्‍ब मेरी
आंखों में बहते अश्‍कों के बीच
अब भी देख पा रहे हो
मेरी जिजीविषा ने
हर कमज़ोर पल में
तुम्‍हारे समक्ष खड़े होकर
विजय यात्रा का आ‍ह्वान किया है
जब भी ..
तुम्‍हारी बंसी की
मधुर ध्‍वनि गूंजी है मेरे कानों में
बस उसी क्षण मैने जाना
केवल तुम ही मेरा संबल हो
लेकिन उससे पहले
तुम चाहते थे यही
मैं अभिषेक कर लूं भावनाओं के
अश्रुजल से तुम्‍हारा
आत्‍मबल का भी ले लूँ सहारा
ताकि शंखनाद कर सकूँ
मन के जीते जीत है मन के हारे हार
विश्‍वास का दीपक प्रज्‍जवलित करने से
पहले तुम्‍हारी मुस्‍कान को
मैं अपना आशीष मान लूँ ... !!!

शुक्रवार, 1 जून 2012

तुम मानो या नहीं ...!!!














तुम मानो या नहीं
पर कोई तो है सर्वशक्तिमान
जो सबल बनाता है निर्बल को
तुम्‍हारी हर आवाज़ को सुनता है
पलटकर जवाब भी देता है
तुम समझ पाओ या नहीं
देख पाओ या नहीं
पर कोई तो है ... 
कभी देखा है तुमने
काई पर चलकर जिसपर चलते हुए
यह जानते हो कि फिसलन है यहां
पर कितनी मजबूती से तुम्‍हारे
कदम पड़ते हैं काई पर
कोई तो है ...
जो देता है मजबूती ...
पराजय को विजय के द्वार पर ले जाने की शक्ति
सर्वशक्तिमान के सिवाय किसी के पास नहीं ये
...
जीवन और मृत्‍यु से परे
अनश्‍वर आत्‍मा ''एकोsहम् द्वितीयोनास्ति''
जगत और जीवात्‍मा के कथन को सिद्ध
करती ... प्रत्‍येक कदम पर
जीवन दर्शन दिखलाती
कभी मन का संताप बनती
कभी ह्रदय का उल्‍लास बनती
कर्तव्‍य का बोध कराती
कभी बांधती मर्यादाओं में
कभी बनती तुम्‍हारी हथेली में
तक़दीर की कोई रेखा
बताओ किसने देखा है तन की
इस सूक्ष्‍मता को
जो हर प्राणी के शरीर में
सर्वशक्तिमान होकर विराज़मान है
अदृश्‍य होकर भी वह
कण-कण में समाहित है
तुम मानो या नहीं पर कोई तो है ...

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....