सोमवार, 31 दिसंबर 2012

जाते हुये पल को ....!!!!

ये सच है आज वर्ष का अंतिम दिन है
नहीं टूट रहा शब्‍दों का मौन
किसी तरह से,
नहीं ठहराव मिला अश्‍कों को बहने से
क्‍या फ़र्क पड़ता है,
सांत्‍वना के दो शब्‍द कहने से
दर्द आंचल में सुबक रहा माँ के
सन्‍नाटा भी चीत्‍कार करता है
हिचकियों का स्‍वर जब
गले में आकर रूँधता है
.... 
सूज गईं हैं पलकें
आंखों की सफेदी पर छा गई है लालिमा
मन की व्‍य‍था लिखती हूँ जब
कागज़ भीग जाता है
क़लम कर देती है चलने से इंकार 
दुआओं की गलियां सूनी हैं
रास्‍ते खामोश हैं सारे
पल-पल गुज़र रहा है एक सिहरन के साथ
कब लौटेगे शुभकामनाओं के शब्‍द
जो एक साथ ही चले गये थे
उसकी मृत्‍यु की खबर पा शोक़ मनाने
.....
मुस्‍कान औंधे मुँह पड़ी है :(  जहां
हँसी ने ओढ़ लिया है लिबा़स मायूसी का
उम्‍मीद घायल हुई है जब से
विश्‍वास छटपटाया है
संकल्‍प की हथेलियाँ भिंच गईं हैं
इन सबको कहना है इतना ही
आज वर्ष के अंतिम दिन
भले ही मत देना शुभकामनाएँ
जाते हुये पल को,
पर ....
आने वाले हर लम्‍हे से कहना ही होगा 
हर पल को शुभ कर देना तुम इतना
जिससे मजबूत हों इमारे इरादे
साहस देना हर एक मन को जिससे
प्रखर हो सके टूटा हुआ विश्‍वास
ओज देना इतना वाणी को  सुनाई दे जाये
वो श्रवण बाधित को
दिखाई दे जाये साहस तुम्‍हारा
दृष्टिहीनों को  !!!!!!

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

मौन ही होता जहाँ अभिषेक !!!

मेरी खामोशियों को देख
शब्‍द आपस में कानाफूसी करते हैं इन दिनो
अपने-अपने क़यास लगाते
जुबां कुछ कहने को तैयार नहीं
मन अपनी धुन में
हर वक्‍़त शून्‍य में विचरता
आखिर वज़ह क्‍या है ??
...
बहुत सोचने पर
एक जवाब आता कहीं भीतर से
हो रहा है कुछ ऐसा
जो नहीं होना चाहिए था
घट रहा है कुछ ऐसा जिसे नहीं घटना था
बस ये चुप्‍पी उस घटित के होने की है
जैसे कोई शांत जल में मारता कंकड
मच जाती एक उथल-पुथल चारों ओर
भंग हो जाती जैसे कोई समाधि
क्षण भर ... मात्र क्षण भर को ही होता ऐसा
फिर झांकती खामोशी मेरी आँखों में
....
कुछ टूटा दिखाई नहीं देता फिर भी
टूटने का स्‍वर कहीं है अन्‍तर्मन में ही
इस खामोशी में !!!!!
तुम्‍हें पता है खामोशियां बहुत कुछ बांटती हैं
सांझा करने में जाने इन्‍हें कैसा सुकून मिलता है
जब कभी जलते हैं सपने
ये चुपके से ले आती खारा पानी आँखों में
मौन ही होता जहाँ अभिषेक !!!

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

न्‍याय की माँग में !!!

आँख नम है
न्‍याय की माँग में
जुल्‍म देख
...
पीड़ा के क्षण
मन का संताप ये
किससे कहें
...
दर्द की चीख
निकलती है जब
घुटती साँसे
...
दमन यूँ ह‍ी
कब तक होगा ये
कहे दामिनी
...
जन आक्रोश
अंज़ाम है चाहता
हक़ के साथ
....

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

कुछ रिश्‍ते ... (8)













कुछ रिश्‍ते
सिर्फ सम्‍मान के होते हैं
सम्‍बोधन उनका कुछ भी हो
बस उन्‍हें
सज़दा करने का जी चाहता है !
.....
कुछ रिश्‍ते
जो अभिमानी होते हैं
उन्‍हें सिर्फ विनम्रता से ही
एक नई राह पर
लाया जा सकता है !
.....
कुछ रिश्‍ते
गुल्‍लक होते हैं
जिनमें हर रोज़ डालना होता है
कुछ अंश स्‍नेह का !
....
कुछ रिश्‍ते
पूँजी होते हैं जीवन की
जिनके संचय में
हर पल सावधानी
रखना आवश्‍यक होता है !
....
कुछ रिश्‍ते
सिर्फ आखेट हो जाते हैं
रिश्‍तों के नाम पर
और अपना मान खो देते हैं !

...

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

समझौतों की कोई जु़बान नहीं होती !!!


















तल्‍लीन चेहरों का सच
कभी पढ़कर देखना
कितने ही घुमावदार रास्‍तों पर
होता हुआ यह
सरपट दौड़ता है मन
हैरान रह जाती हूँ कई बार
इस रफ्त़ार से
....
अच्‍छा लगता है शांत दिखना
पर कितना मुश्किल होता है
भीतर से शांत होना
उतनी ही उथल-पुथल
उतनी ही भागमभाग
जितनी हम
किसी व्‍यस्‍त ट्रैफि़क के
बीच खुद को खड़ा पाते हैं
...
समझौतों की कोई
जु़बान नहीं होती फिर भी
वे हल कर लेते हर मुश्किल को !!!

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

'मैं तो तुम्हारे पास हूँ ...'


















माँ कैसे तुम्‍हें
एक शब्‍द मान लूँ
दुनिया हो मेरी
पूरी तुम
ऑंखे खुलने से लेकर
पलकों के मुंदने तक
तुम सोचती हो
मेरे ही बारे में
हर छोटी से छोटी खुशी
समेट लेती हो
अपने ऑंचल में यूँ
जैसे खज़ाना पा लिया हो कोई
सोचती हूँ ...
यह शब्‍द दुनिया कैसे हो गया मेरी
पकड़ी थी उंगली जब
पहला कदम
उठाया था चलने को
तब भी ...
और अब भी ...मुझसे पहले
मेरी हर मुश्किल में
तुम खड़ी हो जाती हो
और मैं बेपरवाह हो
सोचती हूँ
माँ हैं न सब संभाल लेंगी .....
माँ की कलम मेरे लिए ...!!!
लगता है 
किसी मासूम बच्चे ने
मेरा आँचल पकड़ लिया हो 
जब जब मुड़के देखती हूँ
उसकी मुस्कान में 
बस एक बात होती है
'मैं भी साथ ...'
और मैं उसकी मासूमियत पर 
न्योछावर हो जाती हूँ
आशीषों से भर देती हूँ
कहती हूँ 
'मैं तो तुम्हारे पास हूँ ...'

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

चाह नहीं कुछ पाने की !!!















दर्द को कहना
उसके साथ - साथ बहना होता है
नदी की तरह
कभी शब्‍दों को शब्‍द दर शब्‍द
विष का पान कराना
जैसे अमृत हो जाना हो
फिर मुहब्‍बत का ...
...
जाने कितनी किस्‍मों में
तकसीम़ हुई वह
कभी दरिया कभी नदिया
कभी धारा कभी लहर
कभी बूंद
जब वह तेरे नयनों से बही  थी
अंतिम बार
....
यह कैसा द्वंद है
भावनाओं का  भावनाओं से
जहां अभिलाषा है
बस मिट जाने की
चाह नहीं कुछ पाने की !!!

...

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

मेरी माँ.. हर विधा में प्रवीण ... स्‍नेह !!!

शब्‍दों के चौक पर ..
भावनाओं का कलश विराजित कर
माँ... की तर्जनी ने पहला पन्‍ना खोला
अनामिका  ने झट ऊँ लिखा
शब्‍दों ने मिलकर पंक्ति की रचना की
सबने मिल-जुल कर स्‍नेह की एक भूमिका बांधी
अपना नाम सुनते ही स्‍नेह ने झट से
माँ की विशेषता बताई
कैसे करनी है उसे सबकी अगुआई
...
मेरी माँ.. हर विधा में प्रवीण
माँ वीणापाणि की सेवा में निस्‍वार्थ भाव से रत रहती
स्‍नेह को जब भूख लगती माँ
झट-पट पकाती लज़ीज खाना हँसते-मुस्‍कराते
स्‍नेह के मुँह में कौर रखती औ सिर पे ममता का हाथ
पता नहीं उस ममतामयी का क्‍या जादू होता
स्‍नेह की आंखे बोझिल होने लगती
माँ गुनगुनाती लोरी मीठे शब्‍दों की
स्‍नेह सपनों की दुनिया में परियों के संग खेलती खेल,
तब तक का सारा वक्‍त माँ लेखन को समर्पित करती
...
एक दिन स्‍नेह ने मासूम सवाल किया ?
तुम जब देखो काम करती रहती हो
कभी हम बच्‍चों का ध्‍यान तो कभी लिखती दिखती हो
बस आराम नहीं करती, माँ सहज भाव से मुस्‍कराते हुये ...
लेखन मेरा 'प्रेम' है  इसके बिना मेरी हर सांस अधूरी है
स्‍नेह की नन्‍हीं पलकें हैरानी से फैल गईं
वो धीमे स्‍वर में बोली 'प्रेम' लेकिन माँ !
किसी को पता चल गया तो आपको प्रेम है तब
माँ उसके सवाल पर हँसी ये प्रेम तो मुझे विरासत में मिला है !
माँ सरस्‍वती की आराधना में निस्‍वार्थ भाव से किया गया कार्य
उनकी श्रेष्‍ठ उपासना है, जिसे माँ सहर्ष स्‍वीकार कर बदले में
यश, ख्‍याति और आत्‍मसंतुष्टि दे हर क्षेत्र में अपराजित रखती है !
...
स्‍नेह ने माँ के गले में नन्‍हीं बांहे डाली और बोली तभी तो
सब आपको प्‍यार और सम्‍मान देते हैं
माँ ने समझाया ..
इसके पहले मैं सबकी भावनाओं का मान करती हूँ
हर नये व्‍यक्ति के आने पर बिना किसी परिचय के उसकी चौखट पर
दस्‍तक़ देती हूँ .. उसे सबसे मिलाती हूँ
फिर यूँ ही खोजते-खोजते अपनी इस अमूल्‍य निधि में
जाने कितने रत्‍नों का संग्रह करते हुए नित सूरज के उगते ही
हर दिशा में एक नई तलाश के साथ
मैं अभिषेक करती हूँ आपनी भावनाओं का तभी पाती हूँ
यह प्‍यार और सम्‍मान याद रखो जो हम पाना चाहते हैं पहले
हमें वही औरों को देना होता है..
स्‍नेह ने समझदारी दिखाई तो मैं आपकी हेल्‍प कैसे कर सकती हूँ
मुझे तो बस आपका ही प्‍यार चाहिये
माँ ने उसकी इस शैतानी पर भी मुस्‍कराते हुये कहा
हर आने वाले का स्‍वागत ! जाने वाले को शुभकामनायें !! देते हुये चुप बैठो !!!
(आदरणीय रश्मि प्रभा जी , जो मेरे ही नहीं कितनों के अन्दर माँ सी छवि लिए रहती हैं -
उनसे जब भी कुछ सुना,पढ़ा,सीखा तो लगा कुछ कहूँ ')

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

मैं हँसता था जब वो कहकहों का दौर कोई और था ...!!!















यह सच है जब कोई रूठा हो तो फिर हँसकर बात नहीं करता,
आहत हो जाता मन कितना जब कोई अपना बात नहीं करता  ।

अपनों की  भीड़ में सिकुड़ा सिमटा रहता हूँ जैसे कैदी हो कोई,
डालकर नज़र बढ़ जाते हैं आगे पर कोई भी बात नहीं करता ।

मैं हँसता था जब वो कहकहों का दौर कोई और था अब देखो,
होठों पर मुस्‍कान लिए बैठा हूँ फिर भी कोई बात नहीं करता ।

मैं वही हूँ वही है वजूद मेरा फिर भी अनमना सा क्‍यूँ है कोई,
कहता हूँ जब भी कुछ सुन लेते हैं पर कोई भी बात नहीं करता ।

दौर कितना भी मुश्किल आए इतना भी मुश्किल न हो जाए
अपनों की महफिल़ में कोई अपनों से ही जब बात नहीं करता ।

सोमवार, 26 नवंबर 2012

रूह से रूह का रिश्‍ता ...!!!

















प्रेम की महिमा में
आख्‍यानों का आयोजन कर
विषय विशेष पर टीका-टिप्‍पणी करते  गुणीजन
बस इसे ढूँढते ही रहे कस्‍तूरी की भांति,
ये तो ठहरा रूह से रूह का रिश्‍ता
जो अंजाने ही बांध लेता जन्‍मों-जनम के लिए
कुछ समय के लिए जो होता है
वो प्रेम कहां महज़ आकर्षण
प्रेम तो हर हाल में
संकल्‍प के मंत्रों से गुंजायमान रहता है
मन का हर कोना अभिमंत्रित हो अगर के धुएं सा
मोहक और सुगंधित हो जैसे !
....
हर परिभाषा से मुक्‍त
नेह के सोपानो पे दौड़ता
कभी छू लेता तारो-सितारों को
कभी दीदारे यार कर बैठता चांद में
प्रेम का होना
फिज़ाओं में खुश्‍बू सा घुलना चाहत का
मूक रहकर भी कह जाना दिल की हर बात
सिर्फ संभव है प्रेम में !!
...

गुरुवार, 22 नवंबर 2012

कुछ रिश्‍ते ... (7)

कुछ रिश्‍ते
धोखा होते हैं
जो छल करते हुए
जिन्‍दा रहते हैं !
.....
कुछ रिश्‍ते
अंबर होते हैं
कहीं भी रहो
वो अपना साया कर देते हैं !
.....
कुछ रिश्‍ते
बन जाते हैं स्‍वयं ही
कुछ बनाये जाते हैं
कुछ टूट जाते हैं
फिर भी निभाये जाते हैं !
...
कुछ रिश्‍ते
हमेशा साथ होते हैं
चाहे वक्‍त उनमें कितनी भी
दूरियां ले आये !
...
कुछ रिश्‍ते सूख जाते हैं
वक्‍़त की धूप में जब भी
एक प्‍यास जागती है मन में
इन्‍हें नम रखने के लिए !!!
....

सोमवार, 19 नवंबर 2012

ख्‍यालों की भीड़ में !!!










कभी खोये से ख्‍याल,
मिल जाते हैं जब
एक जगह तो सवाल करते हैं
अपने आप से ?
ऐसा क्‍यूँ है कोई आवाज उठाता
हक़ की कोई कहता
मेरी कद्र क्‍यूँ नहीं की ?
मैं हालातों का जिक्र करती
समझौते की जिन्‍दगी
कैसे जीनी होती है बतलाती
पर कहाँ सुनते वे मेरी !
....
कभी तेज़ हवाओं के बीच
तुम रहे हो ?
यदि हां तो कितने अस्‍त-व्‍यस्‍त
हो गये होगे
उन पलों के बीच
बस उसी तरह से आज
कुछ तेज ख्‍यालों के बीच में
मैं हूँ ! हर ख्‍याल
एक अपनी ही तेजी में है
मेरी कुछ सुनता ही नहीं
मैं सुनते-सुनते सबकी
अपनी कहना भूल ही गई
किस ख्‍याल का अभिनन्‍दन करूं
तो किस ख्‍याल के आगे
हो जाऊँ नतमस्‍तक
....
एक उलझन सी है जिसमें
कुछ ख्‍याल उलझ गये हैं
कुछ गुथे से हैं एक दूसरे में
अपनी मैं का मान लिए
सबके सम्‍मान में
खामोश सी मैं एक
नन्‍हें ख्‍याल की उँगली थाम
चली हूँ अभी - अभी
कहीं वो गुम न जाए
ख्‍यालों की भीड़ में !!!
.....

शनिवार, 17 नवंबर 2012

इसका होना ही प्रेम है !!!













कुछ शब्‍दों का भार आज
कविता पर है
वो थकी है मेरे मन के बोझ भरे शब्‍दों से
पर समझती ह‍ै मेरे मन को
तभी परत - दर - परत
खुलती जा रही है तह लग उसकी सारी हदें
उतरी है कागज़ पर बनकर
तुम्‍हारा प्‍यार कभी
कभी बेचैनी बनकर झांकती सी है पंक्तियों में !
...
कभी आतुर हुई है तुमसे
इकरार करने को मुहब्‍बत का
या फिर कभी जकड़ी गई बेडि़यों में
पर यकीं जानो वह मुहब्‍बत
आज भी जिंदा है  मरी नहीं
सुबूत मत मांगना
ये धड़कने तुम्‍हारे नाम पर
अब भी तेज हो जाती हैं !!
...
जब भी प्रेम
लम्‍हा बन आंखों में ठहरता है,
मुझे इसमें ईश्‍वर दिखाई देता है
किसी ने कहा है प्रेम और ईश्‍वर दोनो
एक ही तत्‍व हैं
तुमने भी तो कहा था
कुछ भी अमर नहीं है सिवाय प्रेम के
कहो मैं कैसे भूलती फिर इस 'प्रेम' को
इसका अहसास, इसके अमरत्‍व की
एक बूँद कभी बारिश बनकर बरसती है,
कभी टपकती है आंखो से आंसुओं के रूप में
कभी चंदा की चांदनी बन
पूरे आंसमा को नहीं धरा को भी रौशन करती है
पर आज इसका पूरा भार
कविता पर है, इसकी रचना
इसका होना ही प्रेम है !!!

सोमवार, 12 नवंबर 2012

दिये का रिश्‍ता देखो बाती से ... !!!














सजती है रंगोली आंगन में,
कण-कण में ये विश्‍वास लेकर,
जलेगा दीप शुभकामना का
अपनी उम्‍मीदों का
प्रकाश लेकर
.......
भावनाओं की बाती को
स्‍नेह से दिये ने
अपने मस्‍तक लिया जब भी
'' तमसो मा ज्‍योतिर्गमय ''
का संदेश 'दीप' ने सदा
अंतिम श्‍वास तक दिया
...

दिये का रिश्‍ता
देखो बाती से कितना गहरा है,
अंधकार नीचे जाकर ठहरा है  !
...
आलोकमय हो इनके रिश्‍ते सा
हर जीवन
इनके साये में देखो तो
खुशियों का पहरा है !!

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

एक कदम हौसले का ...!!!













मुश्किलों में संभलना हो तो
हर मुश्किल पर उसका इस्‍तक़बाल करो
जब भी कभी ऊंचाईयों से डरा है मन,
एक कदम हौसले का धीरे से
सहमे हुये मन के पास आया है
और पूछा है
किस बात का डर
मैं हूँ न तुम्‍हारे साथ
घबराकर जब भी पलकों को बंद किया,
एक किरण रौशनी की
मेरी पलकों में समाई और
चमकते हुए कह उठी मेरे रहते
अंधकार कैसे संभव भला
मैने झट से अपनी
बंद पलको को खोला और
उस चमकती हुई रौशनी का
स्‍वागत किया
जहां हर दृश्‍य मन के संशय का
निराकरण करता नजर आया
......
एक अनंत शक्ति हमारे मन में
विश्‍वास के बीजों की
पोटली रख छोड़ती है
जिसे हम वक्‍त-बेवक्‍़त
बो दते हैं संयम की धरा पर
....
संयम की धरा
हमारे विश्‍वास के बीज को
अंकुरित कर पोषित करती है
ताकि हमारी आस्‍था
उस अनंत शक्ति पर सदैव बनी रहे !!!

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

वक्‍़त की किताब पर ... !!!













वक्‍़त की किताब
हर पृष्‍ठ पर हर लम्‍हे का
हिसाब रखते-रखते
भर चली है
...
अंको की गणना करता
उम्र का यह पड़ाव
सोचता है कभी ठहरने को
तो ठहर नहीं पाता
सब कुछ वक्‍़त की किताब पर
अंकित होने के फेर में
उसके इर्द-गिर्द
एक ताना-बाना रचता
काल करे सो आज कर
आज करे सो अब  ...
को चरितार्थ करता
चला जा रहा है
...
कभी डालना चाहती हूँ
एक दृष्टि
पिछले पृष्‍ठों पर
चाहती हूँ कुछ सुधार करना
पर कहां संभव है प्रूफ रीडिंग
वक्‍़त की किताब पर
जो जैसा है उसे वैसा ही छोड़
आगे बढ़ना
कोशिश यही लेकर
अगले पृष्‍ठों पर कोई मिस्‍टेक न हो !!!

सोमवार, 5 नवंबर 2012

कुछ गुनाह ...!!!

कुछ गुनाह भागते हैं
भागते ही रहते हैं सच का सामना करने से
सच का भय उन्‍हें चैन से पलकें भी
झपकने नहीं देता
खोजती दृष्टि ... के आगे
जब भी पड़े सूखे पत्ते से कांप उठे
या पीला ज़र्द चेहरा लिये
अपनी ही नजरो से ओझल होते
...
कुछ गुनाहों को मैने
देखा है नींद के लिये तरसते हुये
खुली आंखों से लम्‍बी रातों की कहानी
सन्‍नाटों को चीरती अंजानी आवाजें
घबराकर कानों पर हथेलियों का रखना
चिल्‍लाकर दीवारों के आगे सच कुबूल करना फिर
पसीने से तर-ब-तर हो
थाम लेना सिर को उफ् ये क्‍या हो गया !
के शब्‍द
सच कहूँ जीना दूभर कर देते हैं
...
कुछ गुनाह़ अंजाने में हो जाते हैं जब भी
सच के सामने शर्मिन्‍दा होते हैं
पश्‍चाताप के आंसुओं से
मन की सारी ग्‍लानि को बहाकर
कुबूल कर लेते हैं अपना अपराध और
हर गुनाह से तौबा कर सच का साथ देते हुए
यही कहते हैं ...
सच कभी छिपता नहीं
कभी कैद नहीं होता 
अटल .. अविचल ... अमिट जो होता है
वही मन का सुकून होता है !!!
....

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

शब्‍दों के रिश्‍ते हैं शब्‍दों से ....













शब्‍दों के रिश्‍ते हैं
शब्‍दों से
कोई चलता है उँगली पकड़कर
साथ - साथ
कोई मुँह पे उँगली रख देता है
कोई चंचल है इतना
झट से जुबां पर आ जाता है
कोई मन ही मन  कुलबुलाता है
किसी शब्‍द को देखो कैसे खिलखिलाता है
....
दर्द के साये में शब्‍दों को
आंसू बहाते देखा है
शब्‍दों की नमी
इनकी कमी
गुमसुम भी शब्‍दों की द‍ुनिया होती है
कुछ अटके हैं ... कुछ राह भटके हैं
कितने भावो को समेटे ये
मेरे मन के आंगन में
अपना अस्तित्‍व तलाशते
सिसकते भी हैं 
....
जब भी मैं उद‍ासियों से बात करती हूँ,
जाने कितनी खुशियों को
हताश करती हूँ
नन्‍हीं सी खुशी जब मारती है  किलकारी,
मन झूम जाता है उसके इस
चहकते भाव पर
फिर मैं  शब्‍दों की उँगली थाम
चलती हूँ हर हताश पल को
एक नई दिशा देने
कुछ शब्‍द साहस की पग‍डंडियों पर
दौड़ते हैं मेरे साथ-साथ
कुछ मुझसे बातें करते हैं
कुछ शिकायत करते हैं उदास मन की
कुछ गिला करते हैं औरों के बुरे बर्ताव का
मैं सबको बस धैर्य की गली में भेज
मन का दरवाजा बंद कर देती हूँ !!!

सोमवार, 29 अक्तूबर 2012

कुछ रिश्‍ते ... (6)

कुछ रिश्‍ते होते हैं ऐसे,
जिनमें नहीं होता
कोई रक्त सम्‍बंध
फिर भी वे दिल की
धड़कन जैसे होते हैं
...
कुछ रिश्‍ते होते हैं ऐसे,
जैसे कोई अनचाहा
बोझ
कहते हैं ऐसे रिश्‍तो को
तोड़ना बेहतर
...
कुछ रिश्‍ते होते हैं
धर्म के
जिनकी पवित्रता का
बोध बिल्‍कुल
ईश्‍वर जैसा होता है
...
कुछ रिश्‍ते
यक़ीन होते हैं
जो क़ायम रखते हैं
खुद को मरते दम तक
....

गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

जब भी तुम्‍हें सोचती ...

तुम एक खिलखिलाती हँसी हो
मेरे लिए
जब भी मिली
अपनी मृद वाणी सहज़ मुस्‍कान  से
जीवन का दर्शन कराती
कभी लगता तुम प्‍यार हो सिर्फ प्‍यार
कभी लगता तुम जीवन हो सिर्फ जीवन
तुम नहीं तो कुछ भी नहीं
तुम गीत बनती .. नदिया बनती
शब्‍दों में ढलती तो कविता बनती
फूलों में दिखती तो तितली सी
तुम्‍हारा एक रूप मन में बसा ही न‍हीं पाई
जब भी तुम्‍हें सोचती महसूस करती
तुम हर बार इक नया रूप धरती
तुम से कहती तो तुम कहती
ना मैं तो चिडि़या हूँ
...
मैं हैरान चिडि़या
वो भी गौरेया बेहद प्रिय
वक्‍़त के साथ चलते हुए तुम्‍हें
एहसासों को समेटना भी खूब आता है
पंखों का फैलाना लम्‍बी उड़ान भरना
थकन की शिक़न कहीं नहीं चेहरे पर
आराम का समय निश्चित
वक्‍़त - बेवक्‍़त कभी तुम्‍हारी पलकें
कभी नहीं झपकतीं
वही चिंतन वही मनन
जब जिसने आवाज दी तुम हाजि़र हो जाती
मैं विस्मित सी ! तुम्‍हें देखती
बस देखती रह जाती !!!
...

शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2012

कुछ रिश्‍ते ... (5)

कुछ रिश्‍ते
सौभाग्‍य के सिन्‍दूर
काले मोतियों की माला में
गुथकर
जन्‍म-जन्‍मांतर के हो जाते हैं
....
कुछ रिश्‍ते
जन्‍म जन्‍मांतर के होते हैं
इस विश्‍वास के साथ
वर्षों की दूरियां भी
कोई मायने नहीं रखती
....
कुछ रिश्‍ते
जन्‍म से पहले ही
उम्र से बड़े हो जाते हैं
और आत्‍मीय भी
...
कुछ रिश्‍ते होते हैं
जो हर रिश्‍ते को सहेजते हैं
बचाते हैं बिखरने से
उनका होना ही
सब कुछ होता है
 ...
कुछ रिश्‍ते
तपस्‍वी होते हैं
एक साधना जो निरन्‍तर
तप में लीन रहती है
..

बुधवार, 17 अक्तूबर 2012

गौरैया की चोंच में दबी किरण ...!!!














एक छवि तुम भाव की,
नज़र तुम पर जो उठे सम्‍मान की,
विषमताओं के मार्ग भी
अवरूद्ध से हो गये
जो हँसे लब तल्खियों से
वो विक्षिप्‍तता का भान अब कर रहे
तुम्‍हारे रास्‍ते में
सत्‍य अविचल था खड़ा हर मोड़ पर
देखकर कंटीली बाडियां
रक्‍तरंजित हथेलियों में कुंठाओं के तीर थामे
आह! के वो स्‍वर लिये
बच निकलने के रास्‍ते को थे खोजते
....
कामयाबी के शोर में वो हर कदम पे
असफलता का स्‍वाद चखते हुए
अपनी पीठ खुद थपथपाते
पूछते मूलमंत्र तुम्‍हारी सफलताओं का
माथे पे पसीने की बूंदों को  छिपाते
विस्मित नयनों को मूंदकर
कुछ चमत्‍कार की अभिलाषा रखते
लड़खड़ाते कदमों से
अपने शरीर का भार घसीटते चलते
ये दृश्‍य उनके लिए करूण है
पर मेरे लिये जैसे को तैसा
...
तुम साधक बन हर शब्‍द का
आह्वान करती मन के मंदिर में
एहसासों के दीप जलाती
मिटाती हर मन के क्‍लेश को
अलौकित करती हर भावना को
सद्भावनाओं के द्वार पर
प्रतीक बनती विनम्रता का
...
तुम्‍हारी तपस्‍या से मेरा मन
भाव-विह्वल हो नित दिन अभिषेक  करने को
अर्पित करता स्‍नेह, कभी सम्‍मान, कभी ध्‍यान
वंदित स्‍वरों की पुकार तुम तक पहुँचती जब
तुम मंद मुस्‍कान लिए
मुझे भी तप में अपने साथ कर लेती ...!!!

सोमवार, 15 अक्तूबर 2012

जन्‍मदिन मुबारक हो .... अलंकार

अपनी तोतली जबान से उआ (बुआ) कहना शुरू करने वाला मेरा भतीजा अलंकार 'अंकू' और अपने मित्रों के बीच में 'Alan' के नाम से लोकप्रिय आज 15 अक्‍टूबर को 20 वर्ष पूरे करने जा रहा है, उंगली पकड़कर चलते-चलते दौड़ना सीखा और तोतली ज़बान कब मधुरता के गीत गाने लगी उसका प्रिय शौक गाना है पढ़ाई में अव्‍वल बी.ई. (सिविल) 5वें सेमेस्‍टर में अध्‍ययनरत अलंकार फोटो्ग्राफी भी पूरी तन्‍मयता से करता है ...  आज के दिन बस यही दुआ है उसकी हर ख्‍वाहिश पूरी हो ...

कुछ दुआओं के शब्‍दों को
रख तेरे सिरहाने
मैने तेरे जन्‍म का
सदका उतारा है
तू मेरा ही नहीं
मां-पापा के संग
हम सबका दुलारा है
 ...
कुछ शब्‍दों में स्‍नेह है,
कुछ में कामना है
तुम्‍हारी सफलता की
कुछ शब्‍दों के भाव
आशीषों संग चले हैं
कुछ शब्‍दों ने
मन्‍नतों के मंत्र भी पढ़े हैं
तब जाकर कहीं ये
भाव तुम्‍हारे हुए हैं
.... 
मन के आंगन में
देखो खुशियों के लम्‍हे आये है
दुआओं के शब्‍द हैं
जो आशीषों से झोली तुम्‍हारी
भरने आये हैं
हर लम्‍हे से मांगती हूँ
तुम्‍हारी खुशी
जिनसे महके फूलों सी
तुम्‍हारी जिन्‍दगी

शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2012

जिन्‍दगी हर कद़म पर ....

कुछ विचार हैं मेरे मन के
तुम्‍हारे मन से उलझे हुए
कुछ बिखरे हैं
एक-एक कर समेटती जाती हूँ उन्‍हें
कई सवाल आंखों में आकर अटक से गए हैं
पूछने के लिए
सिर्फ पलकों का उठना तुम्‍हें देखना खामोशी से
तुम्‍हारा मौन कितनी लड़ाईयां लड़कर
पस्‍त हो चुका था
बिना कुछ कहे ही बुझा सा मन लिए
मेरी सवालिया नज़रों का  नज़रों से जवाब देता
बस कुछ लम्‍हे खामोशी के मुझसे मांग रहा था
....
सच कहूँ मैने हक़ से कभी
खुद से खुद की खुशी नहीं मांगी
तुम्‍हारे सवालों का जवाब क्‍या मांगती
हर बार की तरह
इस बार भी सब कुछ छोड़ दिया तुम्‍हारी चाहत पर
तुम्‍हारे यक़ीन पर अपने यक़ीन की मुहर लगा
सोचती हूँ एक से भले दो
बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि ले
संभव तो नहीं होता पर
एक रास्‍ता एक किरण जो अंधेरे को चीरती है
उसे भी बड़ी शिद्दत से इंतजार होता है
भोर का
...
जिन्‍दगी हर कद़म पर ज़ीना सिखाती है,
दुख हो, दर्द हो, धूप हो या फिर
हो नितान्‍त अकेलापन
वो धड़कनों में जीवन का संगीत लिए
अपनी लय में कद़म से कद़म मिला
जब थिरक़ती है तो सब कुछ
दृष्टिगोचर हो मनभावन हो जाता है
क्‍योंकि तब हम फ़र्क समझ चुके होते हैं
अच्‍छे और बुरे का
...

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

गनीमत है ...!!!

कुछ शब्‍दों के अर्थ कई बार
मन में अपना घर बना लेते हैं
अर्थ का अनर्थ करते शब्‍द
मन का चैन हर लेते हैं
ऐसे में एक शब्‍द
मेरे मन के आस-पास
परिक्रमा करता है
गनीमत है
इसका अर्थ मन को
इतना संतोष देता है
सोचती हूँ यदि ये न होता
कैसे मैं उग्र होते विचारों को
संयम का पाठ पढ़ाती 
...
ये शब्‍द अपने भावों को
संतुलित करते हैं
कुछ तोड़ते हैं जिज्ञासाओं को
तब मैं गनीमत की
अहसानमंद हो जाती हूँ
ये सब होना
तुमसे ही संभव हुआ है
जो असंभव को तुम ने
बांध रखा है अपने संयम से
एक लम्‍बी सांस जितना
अहसास है  गनीमत का होना
किसी कार्य के सम्‍पन्‍न होने
पर खुशी का प्रतीक है
इसका भाव
....
मन से निकली एक दुआ
एक श्रद्धा एक आहुति
एक विश्‍वास का पाना ही है  
गनीमत जिसका भाव
मेरे मन के
आस-पास परिक्रमा करता है
....

मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012

अवसरवादी चेहरे !!!

कभी अवसरवादी चेहरे देखे हैं तुमने,
मुस्‍कान सजी हुई आंखों में तलाश
एक अवसर की जहाँ कहीं भी मिले
लपकने को आतुर
दोनो हाथों की क्‍या कहें साष्‍टांग दण्‍डवत कर
सीधे चरणों में समर्पित
 ...
यह अवसरवादिता
अपनी घुसपैठ बड़ी तेजी से करती है
इसकी जड़ें गहरी होती हैं
इनपर आवश्‍यकता नहीं होती सिचंन की
यह तो बस सदैव चिंतन करते हैं
तर्क तो बिल्‍कुल नहीं करते
जो भी आपने कहा सब शिरोधार्य
आखिर मिला हुआ अवसर गंवाया क्‍यूँ जाये ??
...
विश्‍वास करते नहीं विश्‍वास दिलाते हैं
अवसर देते नहीं अवसर लिया करते हैं कुछ पाने का
श्रेष्‍ठ होते नहीं ये  बताया करते हैं श्रेष्‍ठता है तुममे
हर वर्ष एक बुत रावण का जलाकर
अवसरवादिता को नया चोला पहना
हमारे बीच  उतार कर राम के संकल्‍पों की दुहाई
दिलाते लोग नया बहाना गढ़ ही लेते हैं
...
वक्‍़त रहते संभल गए तो ठीक है
वर्ना इनका उद्धार तो हो ही जाएगा
तुम्‍हारी तुम जानना
घुटनों से पेट ढकता आदमी
भ्रष्‍टाचार को दोष देते हुए
ईमानदारी की तालियां पीटता तो है
पर एक हाथ से तो ताली भी नहीं बजती
कसमसाहट को व्‍यक्‍त करता है
भूख जब जि़गर कचोटती है
तो ख़ालिस पानी भी सीना छलनी कर देता
और दो बूंदे पलकों पर
बनकर नमीं उतर आती है !!!

शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2012

कुछ रिश्‍ते .... (4)

कुछ रिश्‍ते ऋणी होते हैं,
जिनकी कितनी भी
किस्‍ते अदा की जायें
ब्‍याज़ चुकाया जाये
फिर भी इनका
ऋण चुकता नहीं होता
...
कुछ रिश्‍ते अनमोल होते हैं
इनका मोल चुकाने के लिए
बेशकीमती खजाने
कम पड़ जाते हैं
....
कुछ रिश्‍ते
मध्‍यमा, अनामिका
और कनिष्ठिका न‍हीं
बल्कि तर्जनी होते हैं
जिन्‍हें पकड़कर कोई
बच्‍चा अपना पहला
कदम रखता है
विश्‍वास से
...
कुछ रिश्‍तों में बंधन नहीं होता
कोई भी
फिर भी वे बंधे होते हैं
मजबूती से बिना किसी डोर के
.....

बुधवार, 3 अक्तूबर 2012

तर्पण श्रद्धा का ...










अर्पित है जल की
प्रत्‍येक बूँद से आपको
इस श्राद्ध में
तर्पण श्रद्धा का
मां - पापा ...
भावना की नन्‍हीं सी
अंजुरि मेरी में
जौ, तिल, फूलों के संग
मिश्रित है गंगा का
पावन जल
आपकी तृप्ति के लिए
...
भीगा सा मन
नमी आंखों में
भावनाओं की करूणा  भरे
शब्‍द जिभ्‍या पर लिए मैं
श्रद्धान्‍वत्  हूँ पूर्ण आस्‍था से
यह मान आप जहां भी होंगे
तृप्‍त हो इस पितृपक्ष में अपना
आशीष हम पर सदा रखेंगे
...

सोमवार, 1 अक्तूबर 2012

शब्‍दों का मौन !!!














कुछ शब्‍द भीग गये हैं
ना जाने क्‍या हुआ
उनका मौन
सुना नहीं था किसी ने
या फिर चीखते हुए
गला रूंध गया था
हिचकियों के स्‍वर
भी घायल थे
हैरान हूँ !
भीगे शब्‍द भीगा सा मन लिए
कुछ भी कहने में  असमर्थ
उनके अर्थों से बेखबर
तुम हर शब्‍द को
अपना ही अर्थ देते रहे
कभी सीमाओं में बांधते
कभी लांघ जाते स्‍वयं ही
उत्‍तेजित हो हर दीवार
कसमसाते शब्‍द
बस सवालों के दायरे में
एक मानसिक द्वंद लिए
कभी सहते आघात
कभी बन जाते घात
कभी तपस्‍वी की तरह
साधक हो जाते
कभी होकर बावरे
निरर्थक से बिखर जाते
यहां-वहां
.........
जब भी कुछ बिखरा है
मैने अपनी दृष्टि को स्थिर कर
हथेलियों को आगे कर दिया
फिर वह तुम्‍हारी पलको से
गिरा कोई आंसू था
या कोई टूटा हुआ ख्‍वाब
मैने हर बार सच्‍चे मन से
बस यही चाहा
तुम्‍हारी चाहत साकार हो
तुम कोई ख्‍वाब देखो तो वह
अधूरा न रहे
कुछ शब्‍द भीग गये हैं
ना जाने क्‍या हुआ
उनका मौन
सुना नहीं था किसी ने
....

शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

साधना शब्‍दों की ... !!!


















साधना शब्‍दों की
तुम्‍हारे शब्‍दों को जब भी मैं अपनी
झोली में लेती वे तुम्‍हारी खुश्‍बू से
मुझे पहले ही सम्‍मोहित कर लेते
तुम्‍हारे कहे का अर्थ
मैं पूछती जब भी चुपके से
वे संस्‍कारवश
पहले तो उनका अभिषेक करते
फिर नतमस्‍तक हो
तुम्‍हारे श्रीचरणों में अपनी कलम रख देते
तुम सहज़ ही अपना हाथ
मेरे सिर पर रख देती
सौम्‍य मुस्‍कान तुम्‍हारी
कांतियुक्‍त आभामंडल
एक अलौकिक तेज लिए प्रदीप्‍तवान 
तुम्‍हारे नेत्र जिसमें
मुझे नज़र आता स्‍नेह और स्‍नेह
मैं अपनी आंखों को भीगने से रोक नहीं पाती
....
ये किसका है जादू मै सोचती
तुम्‍हारे शब्‍द हैं ये
या फिर तुम्‍हारी छवि जो
मेरे नयनों में है
या वो ख्‍याल जो हर वक्‍़त
दूरियों के बीच भी
सदा पास रहता है
...
तुमने कहा
कभी भी शब्‍दों का अभिमान मत करना
हो सके तुमसे जितना भी
तुम इनका सम्‍मान करना
ये मत कहना भरी है मेरी झोली
ये झोली कभी न‍हीं भरती
हमेशा खाली ही रहती है
जहां से जितना भी जैसे मिले
तुम ज्ञान लो
स्‍नेह बांटो सदा छोटों को दिल से
बड़ों का जितना भी मिले
आशीष अपने भाल लो
....

बुधवार, 26 सितंबर 2012

कुछ रिश्‍ते ... (3)

कुछ रिश्‍ते पुस्‍तक की जिल्‍द की तरह
सुन्‍दर और मजबूत होते हैं
जिनके भीतर का
हर पृष्‍ठ एकाकार और एकसार हो
जुड़ा होता है
........

कुछ रिश्‍ते कागज के होते हैं
जो वक्‍़त बेवक्‍़त जरूरत के समय
सौदागर हो जाते हैं
जिनमें अभाव होता है दर्द का
...
कुछ रिश्‍ते कागज़ और कलम से
एक दूसरे के बिन
अपनी बात कह ही नहीं पाते
जब तक साथ होते हैं
एक पूरी ताकत
वर्ना आधे-अधूरे
....
 कुछ रिश्‍ते गंगा-जमुना ही नहीं
बल्कि सरस्‍वती की तरह
अदृश्‍य भी होते हैं और समर्पित भी!!!

सोमवार, 24 सितंबर 2012

एक धुन जिंदगी को गुनगुनाने की ....














कभी तुमने देखा है
भागकर आया हो कोई शब्‍द
और लिपट गया हो
कागज़ से
जैसे कब से उसे इन्‍तज़ार था
इस पल का
...
उस रूठे शब्‍द को :(
भूलना मत
ताक रहा है दूर से ही तुम्‍हें
कब तुम उसे बुलाओ
पर कुछ नखरीला है
कुछ भूलने का क्रम  करता
कभी खट्पट भी
कर बैठता
फिर भाग जाता दूर  बहुत दूर
इतना कि तुम उसे
निकाल ही देते
अपने मस्तिष्‍क से
ये क्‍या अचानक
एक झपट्टा मार
वो कागज़ पर और तुम हैरान !
ये कैसे यहां ?
ध्‍यान से देखो एक हल्‍की मुस्‍कान है :)
तुम्‍हारे चेहरे प जहां
वहीं वो खिलखिला रहा है :)))
...
ये आंख - मिचोली
शब्‍दों की
कलम के साथ खूब होती
कभी वो पकड़ लेती
एक धुन
जिंदगी को गुनगुनाने की
बेसाख्‍़ता तुम तरन्‍नुम में
गुनगुना कर भूल जाते हर नग़मा
सिर्फ वही याद रखते जिसे
वह आज गुनगुनाना चाहती है
कुछ रूठे हुए शब्‍दों को मनाने के लिए!!!

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

जन्‍म से ही जुड़ी होती आकांक्षाएं ...!!!

कोई कैसे जिन्‍दगी को
अहसासों से मुक्‍त
और बंधनों से आजाद कर
स्‍वच्‍छंद विचरण
करने के लिए
छोड़ सकता है भूमंडल पर
जन्‍म से ही
जुड़ी होती आकांक्षाएं अनगिनत
संवेदनाओं से लिपटा
भावनाओं में पला
मां के आंचल से निकलकर
पिता के स्‍नेह से
पल्‍लवित हो विचारों की
पाठशाला में अध्‍ययन कर
शिक्षा रूपी ओज से संस्‍कारों का
पोषण करते हुए क्रमश:
एक लक्ष्‍य देता है जीवन को
...
पेड़ ये मात्र  पेड़ या पौधे नहीं होते
इनमें भी जीवन होता है
बीज से निकलकर
माटी में पल्‍लवित होकर
हवा और पानी पाकर इनका
विस्‍तार होता है
यह भी संवेदनशील होते है
सर्दी और गर्मी
स्‍पर्श का ज्ञान लिए
हमारी बाते सुनते भी हैं
और फल देकर अपने जीवन को
सार्थक भी करते हैं
...
सदानीरा जल की देवी
जिनसे जीवन है  मानव का
बहते रहने में ही
इसका सार है बहाव लिए  हुए
यह अपनी निरंतरता
कायम रखती है
कल कल कर बहता निर्मल पानी
जिसने हार कभी न मानी
...
मानव मन ही होता जाने क्‍यूं अभिमानी
जो यह सब भूल जाता है
अपनी 'मैं' के चलते ही
यह मन बारी-बारी से
जीवन रूपी आग की भट्ठी में
परखने के लिए
तपाया जाता है परिमाणत:
कभी वह निखर कर कुंदन हो जाता है
कभी जलकर राख ...!!!




बुधवार, 19 सितंबर 2012

वो बनकर आंसू बिखर गया ...

ये बिखराव कैसा है
जिसे समेटने के लिए
मेरी हथेलियां दायरे बनाती हैं
फिर कुछ समेट नहीं पाने का
खालीपन लिये
गुमसुम सी मन ही मन आहत हो जाती हैं
अनमना सा मन
ख्‍यालों के टुकड़ों को
उठाना रखना करीने से लगाना
सोचना आहत होना
फिर ठहर जाना
....

मन का भारी होना जब भी
महसूस किया
तुम्‍हारा ही ख्‍याल सबसे पहले आया
तुम कैसे जीते हो हरपल
बस इतना ही सोचती तो
मन विचलित हो जाता
इक टूटे हुए ख्‍याल ने आकर
मुझसे ये पूछ लिया
इन टुकड़ों में तुम भी बंट गई हो
मैं मुस्‍करा दी जब आहत भाव से
वो बनकर आंसू
बिखर गया मेरी हथेलियों में

शनिवार, 15 सितंबर 2012

शब्‍दों की गंगा ...














शब्‍दों की गंगा से
तुम हर पल अपनी विषम परिस्थितियों का
अभिषेक करती हो स्‍वत: ही
कभी जटिलतम होता मार्ग तो
तुम शिव की जटाओं सा
उनका मार्ग प्रशस्‍त करती
मनन करना फिर कहना
सहना हर शब्‍द को उतना ही
जितना वह तुम्‍हारे लिए असहनीय न हो
...
शब्‍दों की गंगा इसलिए कहना सही है
कोई भी अपवित्र शब्‍द
नहीं जन्‍मा तुम्‍हारी लेखनी से
ना ही कभी तुम्‍हारी जिभ्‍या ने उच्‍चारित किया
ऐसे किसी शब्‍द को तुम्‍हारे सानिध्‍य से
हर शब्‍द में एक अलौकिक तेज होता है
जिससे कभी  जन्‍म लेती गरिमा
या फिर गर्व फलीभूत होता है
जिनकी कीर्ति चारों दिशाओ में
गुंजायमान होती है
......
अपनी पराजय का क्षोभ मनाते
अहंकारित शब्‍द दूर खड़े
अपने दायरे से बाहर आने के लिए
छटपटाते रहते लेकिन मर्यादाओं के
बांध उन्‍हें संयम का पाठ पढ़ाते  हुए
तिरस्‍कृत भी नहीं करते तो
मान भी नहीं देते !!!
....
पावनता तुम्‍हारी
मन को भी निर्मल करती है
मन में कितना भी संताप हो
किसी को कोई अभिशाप हो
तुम क्षणश: हर लेती हो 
शब्‍दों की गंगा से
तुम हर पल अपनी विषम परिस्थितियों का
अभिषेक करती हो स्‍वत: ही
 ...

बुधवार, 12 सितंबर 2012

कुछ रिश्‍ते ...(2)

कुछ रिश्‍ते इंकलाबी होते हैं,
जिनमें होता है ज़ोश, जुनून
एक मर मिटने का ज़ज्‍बा
वहां कोई रा‍जनीति नहीं होती
...
कुछ रिश्‍तों में भावनाएं नहीं होती,
संवेदनाएं भी मृतप्राय: हो जाती हैं
ऐसे रिश्‍ते जीवित हो के भी
अस्तित्‍वहीन होते हैं
...
कुछ रिश्‍तों की उम्र  कम होती है
फिर भी वे मरते नहीं,
कुछ रिश्‍तों को बिना किसी जु़र्म के
सज़ा मिलती है और
कैद में जिंदगी रहती है
...
कुछ रिश्‍ते प्‍यार की भाषा
विश्‍वास की कीमत
और भावनाओं की बोली लगाकर
जिंदगी का सौदा कर डालते हैं
....

सोमवार, 10 सितंबर 2012

चलो मैं तुम्‍हारे साथ चलती हूँ !!!

डरती है वह अब खुशियों से
दुख के आगत का
वह स्‍वागत करती है
किसी भी विषम परिस्थिति से
अब उसका जी घबराता नहीं है
एक मन्‍द मुस्‍कान से
अभिनन्‍दन  करना भाता है उसे
हर चुनौती का  !
....
हर पल हर क्षण को जी लेती है
पूरे सुकून के साथ
तब निर्णय करती है
जो हुआ क्‍या सच में गलत था
या फिर इसमें भी
कुछ मेरा ही हित था
...
माँ कहा करती है अक्‍सर
जो होता है अच्‍छे के लिए होता है
बस हम कुछ क्षणों के लिए
घबरा जाते हैं
तुम्‍हें पता है जब तक हम ना चाहें
हमें कोई भी दुखी नहीं कर सकता
ना ही हमें पराजित
हम अपने लिए स्‍वयं  ही
शोक उत्‍पन्‍न करते हैं
विलाप करते हैं
...
यह संबल यह सौम्‍यता शब्‍दों की
जो नव चेतना जागृत करे
है सिर्फ़ उसी के पास जो
हर मुश्किल की पकड़ कर उँगली क‍हे
कहां तुम्‍हारा मार्ग अवरूद्ध है
चलो मैं तुम्‍हारे साथ चलती हूँ !!!

शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

साक्षरता का अपना ही एक उद्देश्‍य है !!!











दिवस कुछ विशेष है,
साक्षरता का अपना ही एक उद्देश्‍य है
लिखना-पढ़ना ऐसे
जैसे जला दिया हो किसी ने
ज्ञान का दीपक
अंधकार मिटाने को
शिक्षा की अलख जगाने को
हर हाथ में कलम थमा
मन को जागरूक बनाने को
एक संकल्‍प लिया है
हर बेटी को साक्षर करना होगा
जिससे पूरा परिवार
सुसंस्‍कृत होगा
......
साक्षर होगी बिटिया तो
ज्ञान की ज्‍योति जलाएगी,
रोशन होगा जीवन उसका
जग में वो इससे इक
नई चेतना लाएगी
हमने जो संकल्‍प लिया है
उसको ये ही पूरा कर पाएगी
दिवस कुछ विशेष है,
साक्षरता का अपना ही एक उद्देश्‍य है !!!

बुधवार, 5 सितंबर 2012

कुछ रिश्‍ते ... (1)














कुछ रिश्‍तों में कुछ भी तय नहीं होता
फिर भी वे समर्पित होते हैं एक दूसरे के लिए
बिना कुछ पाने या खोने की अभिलाषा लिए
...
कुछ रिश्‍ते रूहानी होते हैं
जिनकी हर बात साझा होती है
खुशी हो या ग़म
दर्द हो या बहते आंसू
...
कुछ रिश्‍ते अपाहिज़ होते हैं
वे बिना बैसाखियों के दो कदम भी
नहीं चल पाते
फिर वे बैसाखियां
रक्‍़त की हों या सम्‍बंधों की
...
कुछ रिश्‍ते कड़वे होते हैं
कितनी भी मिठास लाओ
बातों से, दिखावे से, या अपनेपन से
उनका कड़वापन किसी भी
नमक से नहीं जाता
....
कुछ रिश्‍ते प़ाकीज़ा होते हैं
जिन्‍हें बस किसी भी क़ीमत पर
निभाने का मन करता है
बिल्‍कुल जिंदगी की तरह
उन रिश्‍तों में
अपने-पराये जैसा कुछ भी नहीं होता
बस होता है एक विश्‍वास
सम्‍मान और समर्पण
....

सोमवार, 3 सितंबर 2012

एक व्‍यक्तित्‍व ... !!!



घाटियों से क्षितिज तक पहुँचने की धुन ............. प्रकृति अपनी अदभुत छटा बिखेरती कहाँ नहीं ! बस इसी तरह अपने नाम के अनुरूप हैं वे भी अपनी गौरवमयी आभा लिये पूरी तरह सहज़ सरल गरिमामयी व्‍यक्तित्‍व की स्‍वामिनी आदरणीय रश्मि प्रभा जी जिसने भी देखा आपको जिसने भी आपको जाना वह आपके व्‍यक्तित्‍व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका जिसने भी आपको पढ़ा वह आपकी लेखनी का क़ायल हो गया ऐसा होना स्‍वाभाविक भी है क्‍यूँकि आज की इस भागमभाग दुनिया में इंसान के पास खुद के लिए समय नहीं वहीं ये दूसरों के लिए समय निकालती हैं उन्‍हें पढ़ती हैं फिर उसमें से चयन करती हैं उनकी श्रेष्‍ठ ही नहीं सर्वश्रेष्‍ठ रचना का फिर उसे एक मंच देती हैं कभी वटवृक्ष तो कभी ब्‍लॉग बुलेटिन या फिर मेरी नज़र से पर तब उनका सम्‍मान और उनका व्‍यक्तित्‍व हमारे लिए आदर्श बन जाता है । 
दुराग्रह से पीड़ित मैंने बहुतों को देखा , पर रश्मि जी को यदि कभी किसी के लिए कुछ कहा भी गया तो उन्होंने गलत को अनदेखा करने का ही नज़रिया दिया . अपशब्द तो कभी नहीं निकले उनकी कलम से - परोक्ष, अपरोक्ष रूप से वे कई बार व्यथित हुई, उनके बहुत नज़दीक होने से मुझे इसका अंदाजा रहा , फिर भी उन्होंने खुद को सहज कर लिया , छुपकर या आगे आकर कोई वार नहीं किया . 
विरासत में उनको सहजता, शालीनता , सहनशीलता और मुस्कान मिली है... जिसे अपने बच्चों के साथ उन्होंने सबके साथ साझा किया . राहें बनाना उनका मकसद है .... उनको देखकर लगता है कि मदर टेरेसा की राहों में कितनी मुश्किलें आई होंगी . 
साहित्य के लिए वह एक धरोहर हैं ... और राष्ट्रीय धरोहर के सम्मान की ज़िम्मेदारी सबकी है . सुनने में अतिशयोक्ति लगेगी , पर धरोहर वही है जो सबका सम्मान करे . 
अपने लिए तो सब करते हैं जो औरों के लिए करता है वही तो आदर्श बनता है क्‍या आप खुद के लिए कुछ करके कभी स्‍वयं की नज़रों में आदर्श बने हैं एक जवाब सच्‍चे दिल से निकलेगा नहीं तो फिर ऐसी शख्सि़यत जो ना जाने कितने लोगों का आदर्श बनकर किसी के लिए मासी तो कहीं मां तो किसी के लिए दीदी का सम्‍बोधन स्‍वत: निकल पड़ता है लबों से और वे उँगली थामकर चलती हैं साथ ही साथ एक मार्गदर्शक की तरह बस यही वे क्षण होते हैं जहां हम उन पर गर्व करते हैं लेकिन वे अभिमान रहि‍त हमेशा अपनी सहज़ता से हमें नि:शब्‍द कर देती हैं ... पिछले वर्ष उनका जब किडनी में स्‍टोन का ऑपरेशन हुआ उसके बाद से उनका स्‍वास्‍थ्‍य पूरी तरह संभल नहीं पाया ... लेकिन हममें से किसी को कभी अहसास नहीं हुआ क्‍योंकि वे स्‍वास्‍थ्‍य को गंभीर रूप से लेती ही नहीं है ... नियमित रूप से उन्‍होंने हम सभी के ब्‍लॉग पर अपनी निरंतरता बनाये रखी अभी भी अस्‍वथता की स्थिति में वे हम सबका मार्गदर्शन करती रहती हैं । 
जब कभी उनसे बात होती है तो मन पूरी तरह से उनके प्रति नतमस्‍तक हो जाता है ... इस पोस्‍ट को आपके सामने लाने का मेरा कोई और ध्‍येय नहीं है उनका ब्‍लॉग जगत एवं लेखन के प्रति आस्‍था देखकर मन यही कहता है व्‍यक्तित्‍व हो तो ऐसा जिसपर सब गर्व करते हैं ... वे सहज़ ही एक मुस्‍कान से हमें अभिभूत कर देती हैं ...वे हमेशा ऐसी ही रहें सहज़ सरल और गरिमामयी ... ताकि हम सबका मार्गदर्शन होता रहे ... उनके स्‍वास्‍थ्‍य के लिए अनंत शुभकामनाएं ... 

शनिवार, 1 सितंबर 2012

नहीं सुनी परी कथा कोई !!!


















मैंने नहीं सुनी परी कथा कोई
ना जादू का पिटारा था मेरे पास
ना ही कोई गुडि़या
जिसके साथ मैं खेलती
और बातें करती
अपनी सहेलियों की
कभी रचाती ब्‍याह गुडि़या का
सपने सजाती उसकी पलकों में
मेरी मुट्ठियों में
काम से बचे वक्‍़त में होते थे
रंगीन कँचे
अकेले ही घर के कच्‍चे आंगन में
फैलाती उन्‍हें निशाना लगाती
कभी कागज की पतंग भी बनाती
उसे उड़ाती जब भी
खुद को भी उसी के जैसा उड़ता पाती
मेरी मुस्‍कान देख मां कहती
गिर मत जाना
छत नहीं थी तो हवा भी कम लगती
तब मैं लकड़ी के स्‍टूल पर खड़ी होकर
पतंग उड़ाया करती :)
...
वक्‍़त बदला सपने बदले
लेकिन मैं नहीं बदली आज़ भी
किसी बच्‍चे को रंगीन कँचे
या उड़ती पतंग की
डोर थामें देखती हूँ जब भी
तो खुद को उसी कच्‍चे आंगन में
खड़ा पाती ह‍ूँ
...

गुरुवार, 30 अगस्त 2012

जिंदगी ...

दिल के धड़कने को जो तुम
जिंदगी कहते हो तो
मुझे एतराज़ है
तुम्‍हारे इस ख्‍याल से
धड़कनों से तो सिर्फ यह
नश्‍वर शरीर ही जिंदा रहता है
जिंदगी तो हर वक्‍़त को
जीने का नाम है
...
इस जीने के क्रम में
कुछ किश्‍तों की अदाएगी जैसा हाल होता है
जिंदगी का
टुकड़ो में बँटी यह जिंदगी
कभी परिश्रम करती है कभी प्रयास करती है
तब जाकर कहीं इन दो आंखों में
उम्‍मीद के कुछ क्षण नज़र आते हैं तो कभी
रह जाती है सिर्फ़ हिस्‍से में वितृष्‍णा
जिंदगी इक पहेली भी है तो कभी सहेली भी
बिल्‍कुल सीधी सरल तो कभी एक उलझन
जो सुलझाये न सुलझे
....
एक सिलसिला जन्‍म से मृत्‍यु तक
अनवरत् चलता रहता है
एक का पालन -पोषण
हर दूसरी जिंदगी का कर्तव्‍य
बन जाना ही नहीं
बल्कि हर एक की नज़र में
इसकी परिभाषाएं अलग हैं
कभी एक चुनौती लगती है
तो कभी जैसे कोई जंग हो
जिसे हर हाल में लड़ना ही है
...
कभी जिंदगी बहती नदिया सी
तो कभी ठहरा हुआ पानी
जीत उसकी होती है हरदम
जिसने हार कभी न मानी
....

गुरुवार, 23 अगस्त 2012

संकल्‍प शक्ति बड़ी है ...

तुम्‍हें पता है
ये मन्‍नतों के धागे कितने विश्‍वास से
संकल्‍प की गठान बांधकर
निकलते हैं अंजान यात्रा पर
कभी पल भर तो कभी दिन महीनों के साथ
वर्षों की कड़ी तपस्‍या
मन्‍नतों के धागे जिद्दी होते हैं
यूँ ही नहीं श्री हरि का मन पसीज़ता
यूँ ही नहीं किसी की खाली झोली में
डाल देते हैं मुरादों के फूल
...
आस्‍था की कसौटी पर
परखे जाने के लिए
ये परवाह नहीं करते बिल्‍कुल भी खुद की
इन्‍हें तो बस समर्पण आता है
दुआओं में बँधना आता है
तभी तो मंदिर के बाहर
वो पेड़ है न आस्‍था का
हॉं आस्‍था ही तो जो श्री हरि के दर्शन पश्‍चात्
बॉंध जाते हैं भक्‍त पूरी श्रद्धा के साथ
उस की शाखाओं में बस तभी से
वह बेपरवाह है
तपती धूप से, मूसलाधार बारिश से
बस अपने बँधन का मान रखते हुए
बँधे रहना है उसे तो  तब तक
जब तक ईश्‍वर की हथेलियों में
उसकी मुराद पूरी होने का
प्रण न करवा ले
...
श्री हरि भी
उसकी इस निष्‍ठा का मान रखते हैं
बँधन मुक्‍त करने के लिए उसे
अपने भक्‍त की आन रखते हैं
भक्‍त और भगवान के बीच की
यह बड़ी ही सशक्‍त कड़ी है
मन्‍नतों के धागे में
संकल्‍प शक्ति बड़ी है ...

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

जहां निर्वाण होता हो मासूमियत का !!!


















कुछ शब्‍दों के अर्थ
अनर्थ होने के भय से
जिभ्‍या पर आने से कतराते हैं
...
कुछ शब्‍द सिर्फ़ श्रापित होते हैं
जो औरों की जिन्‍दगी में
आ जाते हैं अभिशाप़ बनकर
दे जाते  हैं एक संताप मन में
अंजानी पीड़ा लिए
कोरों में छलकते आंसू
अपना खारापन देकर छीन लेते हैं
मिठास होठों की 
...
मैं हर क्षण को ज़ीने के लिए
मन मुताबिक
शब्‍दों के औज़ार लिए रहता हूँ,
काट देता हूँ संवेदनाओं को जब भी मुझे वो
भावनाओं में बहाती हैं
पूछता हूँ अपने आप से
खुद का वो ठिकाना
जहां निर्वाण होता हो मा़सूमिय़त का
परखा नहीं जाता हो जिसे
वक्‍़त बे़वक्‍़त कसौटियों पर !!!

शनिवार, 18 अगस्त 2012

चलना तो तुम्‍हें ही होगा मुझे लेकर ....















ख्‍वा़हिशों के इस दौर में
कुछ ख्‍वाहिशों को जिंदा रखना जरूरी है
वर्ना जीने की वजह नहीं रहती
....
कुछ ख्‍वाहिशों को जिंदा रखने के लिए
जरूरत पड़ती है थपकियों की
कुछ ख्‍वा़हिशें बहुत मासू़म होती हैं
उन्‍हें नहीं आता ख्‍वा़हिशों की
इस भीड़ में आगे बढ़ना
वे चुपचाप सिमट जाती आकर
जब भी मेरे आगोश में
कुछ ख्‍वाहिशों को जब ठोकर लगती
वो खो देती अपना हौसला
तब मुझे उन्‍हें दिखाना होता
दूर क्षितिज़ पर बादलो में गु़म चांद को
कभी चांद के छिपने की वज़ह
बतानी होती तो कभी
सितारों के आगे की दुनिया
सितारों का टूटना और लोगों की
मन्‍नतों को पूरा करना
...
तभी एक मासूम़ सी ख्‍वा़हिश उचककर कह उठी
क्‍या हम सच में पूरे कर सकते हैं
किसी के ख्‍वा़ब
मैं मुस्‍कराती उसकी मासूमियत पर
और कहती बिल्‍कुल
तुम बस विश्‍वास की उंगली मत छोड़ना
उसने कसकर मेरी उंगली थाम ली
मैं हैरान होकर बोली मैने तो विश्‍वास कहा था
उसने भोलेपन से कहा
चलना तो तुम्‍हें ही होगा मुझे लेकर
... 
(इस चलने के साथ ही आज 300 पोस्‍ट पूरी हुईं सदा की )





गुरुवार, 16 अगस्त 2012

रूह तक उतर जाती हूँ ... !!!















जब भी कभी मैं उम्‍मीद को तलाशती
उसके आकार का
अस्तित्‍व खंगालती
तो पाती निराकार ही उसे
आखि़र उसका राज़ छिपा कहां है
...
उम्‍मीद के टूटने पर बस
यही देखा है
आहत मन, निरूत्‍साहित सा होकर
खुद को नाकामयाब पाता
सारा जीवन दर्शन छोटा हो जाता
हम खो बैठते अपना ही अस्तित्‍व
...
मेरे इन सवालों पर  उम्‍मीद मुस्‍कराती
झाँकती मेरी आंखों में गहराई से
कहती तुम बस हौसले से मुझे देखो
मैं तुम्‍हें हर बार
एक नये रंग में दिखाई दूँगी
मैंने कभी हारना सीखा ही नहीं
ना ही घबराना उसने वो सब कुछ पाया है
जिसने मुझे हौसले से अपनाया है
...
मैं भाग्‍य की लकीरों की तरह
तुम्‍हें हथेलियों में नहीं मिलूँगी
ना ही तुम पाओगे मुझे
जन्‍म कुण्‍डली के किसी चक्र में
मैं तो बस आंखों में मिलती हूँ
हौसले से पनपती हूँ
दिल में घर बना लेती हूँ
और रूह तक उतर जाती हूँ
बिना किसी से कुछ कहे
साकार होने के लिए ... !!!








मंगलवार, 14 अगस्त 2012

आजा़दी का ज़श्‍न कुछ इस तरह से हमें मनाना है ...















आज़ादी का ज़श्‍न कुछ इस तरह से हमें मनाना है,
रोता हो  बच्‍चा जो उसे खिलखिला कर हँसाना है ।

उसकी मुस्‍कराहटों  में बहते आंसुओं को पोछकर,
शहीदों की गौरवगाथा उन्‍हें आज फिर से बताना है ।

कुर्बानियों पे जिनकी नाज़ करता है तिरंगा आज भी,
ऐसे बलिदानियों की याद में उसे झूम के लहराना है ।

सारे जहां से अच्‍छा हिन्‍दोस्‍तां हमारा है गीत वही जिसे,
लिखा है इकबाल ने बच्‍चे - बच्‍चे को वाकि़फ़ कराना है ।

मंदिर की घंटी तो कभी मस्जिद की अजा़न है तिरंगा ये,
जय हिन्‍द के घोष में सदा इसका सम्‍मान ही सिखाना है ।

सोमवार, 13 अगस्त 2012

नज़रे चुरा मत लेना कभी ....

दिखाए कोई ख्‍वाब देख लो देखने से बुरा हुआ है कभी
बस उन ख्‍वाबों को तुम आंखों में बसा मत लेना कभी ।

कोई ग़र कहे तुम्‍हें बुरा तो कह लेने दो उसे शौक़ से,
बस उन बुरी बातों को दिल से लगा मत लेना कभी ।

कोई तुम्‍हारे रास्‍ते में बनकर आ जाये अड़चन कभी,
चलते रहना घबराकर रास्‍ता बदल मत लेना कभी ।

दुश्‍मन को दोस्‍त न बना सको तो कोई बात नहीं पर,
दोस्‍त को दुश्‍मन तुम भूले से बना मत लेना कभी  ।

अच्‍छाईयों में 'सदा' रब़ बसता है ऐसा सुना है बुजुर्गों से,
इन्‍हें अपना न सको गर तो नज़रे चुरा मत लेना कभी ।

बुधवार, 8 अगस्त 2012

हालातों के बीच अपनी जिंदादिली ...

दम तोड़ते हुए उन ख्‍वाबों को तुमने दफ़ना तो दिया होगा,
दफ़न करके फिर उनको सर अपना झुका तो दिया होगा ।

कोशिशों का चऱाग हवाओं की जिद में भी जल रहा था जो,
हवाओं की जिद़ से तुमने उसे वाकि़फ करा तो दिया होगा ।

झुक जाना कभी किसी की खुशी के लिए गुनाह तो नहीं है,
जीने का ये अनूठा सबब तुमने उसे बतला तो दिया होगा ।

कभी हालात कभी वक्‍़त की समझाइश ने मुझे जिंदा रखा,
हालातों के बीच अपनी जिंदादिली को बतला तो दिया होगा ।

सौदेबाज़ी का हुऩर आता नहीं सीखने की कोशिश में चला हूँ,
घर से बेसब़ब ही 'सदा' ये तुमने उसे बतला तो दिया होगा ।

सोमवार, 6 अगस्त 2012

चुटकी का बजना सार्थक होता है !!!

नियमों में बंधकर
चलते - चलते मन ऊब सा गया है
खुद को जैसे मैं समझने लगा हूँ
लकीर का फ़कीर 
उसी क्रम ... में चलते - चलते
आज सारे नियमों को तोड़
सारे कायदों को छोड़
मन के फ़ायदे का सौदा करने निकला हूँ
...
जिन्‍दगी की किताब से मैने
समझौते का पन्‍ना फाड़कर बना दिया है
महज़ उसे कागज़ की नाव
जहां पानी होगा
बह निकलेगी वह नाव
और उसके साथ होगा मुस्‍कराता बचपन
...
तुम्‍हारी आदर्शवादी बातों में
कभी - कभी जलने की बू भी होती थी
चु‍टकियाँ बजाकर काम कराने का ढंग
अच्‍छा है ... पर
वह भी हर एक को नहीं आता
ना ही सबके काम पूरे हो पाते हैं
गौर करना बजती चुटकी के साथ
दूसरा हाथ तुम्‍हें उसकी पीठ पर भी रखना होता है
तभी चुटकी का बजना सार्थक होता है !!!
....





शनिवार, 4 अगस्त 2012

दोस्‍त के इन शब्‍दों में .....













दोस्‍त .. जब कहता है
मेरे रहते तुम्‍हारा कोई कुछ नहीं कर पाएगा ...
टूटती हुई उम्‍मीद छूटता हुआ हौसला
मानो वापस लौट आता है
दोस्‍त के इन शब्‍दों में
मन का कोई कोना दोस्‍ती के इस ज़ज्‍बे पर
अपना सब कुछ कुर्बान करना चाहता है
एक कोई होता है जो बहुत खास होता है
कितनी भी दूर हो वो
सदा दिल के पास होता है
....
भीड़ में एक अलग चेहरा
जो सिर्फ तुम्‍हारी परवाह करता है
डगमगाते हैं जब भी कदम
वह आगे बढ़कर सम्‍हाल लेता है
ये मेरे साथ ही नहीं
आप सबके साथ होता है
दोस्‍ती पर जिनको दिल से विश्‍वास होता है
उनका दोस्‍त हमेशा उनके पास होता है
...

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

हिसाब मांगने लगो खुद से !!!

जिन्‍दगी की किताब को
जरा आराम से पढ़ो तो इसके
हर पृष्‍ठ के हर शब्‍द का भाव तुम्‍हें
समझ आ जाएगा
मुमकिन है कुछ अंजान शब्‍द होंगे
जिनके मायनो से तुम अनभिज्ञ होगे
तो क्‍या हुआ हर कोई होता है
पर सीखने के इस क्रम में यह मत भूलो
जो  सीखता है ...समझता है ...उसे
व्‍याकुल नहीं होना होता
फिर परिस्थितियां अनुकूल हों या प्रतिकूल
क्‍या फ़र्क पड़ता है
...
माना कि आडम्‍बर की दुनिया है
तुम आडम्‍बर में मत पड़ो
तुम्‍हारा व्‍यक्तित्‍व हर बात पर
खरा सोने से दमकता है
तपोगे और निखरोगे स्‍वीकारते हो
जो इस सत्‍य को 
तो फिर नकार दो हर बात को
अग्नि की दाहकता में तप कर
कुंदन बन जाओगे जिस दिन
सब की आंखे सिकुड़ जाएंगी
तुम अपनी जगमगाहट से
सबकी बोलती बंद कर दोगे
...
यह तुम्‍हारे आत्‍ममंथन का समय है
करो .. लेकिन आत्‍मा को
क्षत-विक्षत मत करो  इस क़दर की
वह स्‍वयं अपने वज़ूद का तिरस्‍कार  करने लगे
इसलिए तो नहीं  तुमने
अपनी अभिलाषाओं का हवन किया  था
कि कोई लगाकर अपने माथे पर तिलक उसका
क्रांति का बिगुल बजा जाए
और तुम मौन साधे अपनी आत्‍मा के
हर बिखरे हुए ज़र्रे का हिसाब मांगने लगो खुद से  !!!

बुधवार, 1 अगस्त 2012

रेश्‍म की डोर ....

एक बचपन मन के आंगन में
उतरा खुशियों भरा
त्‍योहार 'राखी' का मनाने को
परम्‍पराओं की थाली में
आस्‍था का दीप जलाकर
रिश्‍तो की डोर को सहेजा
भावनाओं की मिठास से
...
स्‍नेह का तिलक लगाकर
दुआओं के अक्षत  डाल
बहना ने कच्‍चे धागे से बांधा
रिश्‍तों के इस मजबूत बंधन को
वीर की कलाई पर
मुस्‍कान सजी  नयन भीगे हैं फिर भी
उस भाई के लिए 
बैठा है जो परदेस में कहता
मुझे पता है तुम ने
भेज दिया है मेरे लिए
लिफाफे में रख कितने दिन पहले से
उस रेश्‍म की डोर को
बांध लिया है मैने भी उसी स्‍नेह से
जैसे तुम बांधती हो
फिर भी मेरा मन  मीलों दूर का सफ़र कर
पहुँच ही गया है घर की दहलीज़ पर
जहां मां के हाथ से बने पकवानों की खुश्‍बू  है
तुम्‍हारा उपहार को लेकर चहकना है
बाबा का मुस्‍कराना है
इन पलों का खजाना बड़ा अनमोल है
दूर होकर भी पहुँच गया हूँ अपनों के पास
इस रेश्‍म की डोर के सहारे ही सही
आज के दिन  हर बहन दूर होकर भी
मन से रहती है सदा हर भाई के पास
...

सोमवार, 30 जुलाई 2012

मेरी हथेली की रेखाओं में ....

सीखा है तुमसे मुस्‍कराने का फ़न
जादूगरी शब्‍दों की  पाई है आशीष में
'' वक्‍़त की कलम में सच की स्‍याही भरना
हर फै़सला तुम्‍हारी मुट्ठी में होगा  ''

डगमगाये जब भी मेरे कदम
मुश्किल भरी राहों में
उंगली तुम्‍हारी मैं झट से थाम लेती हूँ

बुनियाद कितनी भी कमज़ोर हो
हौसला बन जाती हो तुम मेरा
जब भी तुम्‍हारा नाम लेती हूँ
...  जब भी  जिन्‍दगी के साथ
चलना हो तो मैं तुम्‍हारा नाम लेती हूँ
मैं जानती हूँ
रब मेरे गुनाहों को माफ़ नहीं करेगा
मैं जागते ही तुम्‍हारा नाम लेती हूँ
नहीं दौड़ता मेरी धमनियों में
तुम्‍हारा रक्‍त
लिखा नहीं है मेरी हथेली की रेखाओं में
तुम्‍हारा नाम 
फिर भी दुआओं में तुम्‍हारा साथ
सुब्‍हो - शाम  मैं रब से मांग लेती हूँ
....





शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

शब्‍दों के अरण्‍य में ...

जब कभी एक साथ दो लोग मिलकर चलते हैं तो उन्‍ह‍ें कोई दो कहता है तो कोई 11 लेकिन जहां एक साथ 60 लोग शामिल हों तो उन्‍हें आप क्‍या कहेंगे कोई करिश्‍मा ही... इस करिश्‍में को अंजाम दिया है इस बार ब्‍लॉग जगत की बेमिसाल शख्सियत आदरणीय रश्मि प्रभा जी ने ... बेमिसाल इसलिए की उनके बारे में जितना भी कहा जाए वह कम होता है उनकी पारखी नज़र के तो हम सभी क़ायल हैं ही इस पुस्‍तक में स्‍वयं को पाकर अभिभूत भी हैं ... इन सबकी तलाश तो की रश्मि जी ने पर इन्‍हें साथ लेकर चलें हैं '' हिन्‍द युग्‍म '' के शैलेश भारतवासी जी रचना प्राप्ति से लेकर पुस्‍तक प्रकाशन से होते हुए पुस्‍तक को आप तक पहुंचाने का श्रमसाध्‍य कार्य आपने जितनी सहजता से किया है उसके लिए आप बधाई के पात्र हैं ... यह तो थी शुरूआत से लेकर पुस्‍तक प्राप्‍त होने के पलो की दास्‍तान ... अब उनसे भी मिलना है जो इसमें शामिल हैं ...

जैसे कभी आप फूलों के बाग में जाएं तो एक मनमोह‍क खुश्‍बू आपका मन मोह लेती है वहां पर किसी एक फूल का उल्‍लेख नहीं होता ... वहां तो सभी सुवासित हो अपनी सुगंध बिखेर रहे होते हैं बिल्‍कुल उसी तरह यह पुस्‍तक है जो '' शब्‍दों के अरण्‍य में ''  इसमें शामिल हर रचनाकार भी अपनी - अपनी भावनाओं को व्‍यक्‍त कर रहा है एक ऐसे वृक्ष की तरह जो अडिग है अविचल है और अपनी खूबियों से  सबको भा रहा है ... इसी  वजह से इस अरण्‍य से बाहर आना मुश्किल सा हो रहा है ... पर चलना तो है ही तो आइए  चलते हैं ... शब्‍दों के अरण्‍य में वृक्ष दर वृक्ष पहचान करते हुए ... इनका कहना गलत तो नहीं ...

जीवन जीवन होता है
भिन्‍न होता है तो दृष्टिकोण,
जो देता है मायने जीवन को ... अंजू अनन्‍या जी का यह '' दृष्टिकोण '' जानकर हम आगे चले तो ... देखते हैं

झूठ की सूली पर चढ़कर
सत्‍य अपना शरीर त्‍याग देता है,
मगर सच की आत्‍मा अमर होती है,
सच कभी मरता नहीं ... अनुलता राज नायर जी  '' रस्‍साकशी - सच और झूठ के बीच ''

समय मिले तो
मोरपंख के साथ जड़ लेना मुकुट में
अपने ये अलतई सुमन परिजात के ... अपर्णा मनोज जी   '' विष का रंग क्‍या तेरे वर्ण - सा है कान्‍हा ?''

न जाने कब से
संभाल कर रखा है उन्‍हें मैने
अपने दिल की अलमारियों में
अपनी ही सांसों की तरह ... अमरेन्‍द्र अमर जी ...के शब्‍दों में '' मेरी किताब के वो रूपहले पन्‍ने '' पर पाया मैने ''

वृक्ष की छाया, हरी धरती
पंछियों का बसेरा, शीतल बयार
क्‍यों छीन लिया जीवन का मूल आधार,
क्‍यों किया आपने वृक्षों का संहार .. ऋता शेखर मधु जी .. '' मत संहार करो वृक्षों का ''

ये बेनाम रिश्‍ते हम नहीं चुनते
ये तो आत्‍मा चुनती है
और आत्‍मा जिस्‍म नहीं
आत्‍मा चाहती है .. ... गार्गी चौरसिया जी ... वो रिश्‍ता .. '' अनमोल ''

ओ मृत प्राय पल !
जाओ और बनो मेरी मुक्ति के देवदूत
मुझे जन्म लेना है आभी तुम्हारी राख से... गीता पंडित जी ... मेरी बूढ़ी होती हुई इन अस्थियों को दे सको तो ...  '' ओ मृत प्राय पल ''

तुम्‍हें आंसू नहीं पसंद
चाहे मेरी आंखों के हों
या किसी और के
चाहते हो .. हँसती ही रहूँ .... डॉ. जेन्‍नी शबनम जी ... मेरी जिन्‍दगी जी चाहता है तुम्‍हें श्राप दे ही दूँ  '' जा तुझे इश्‍क हो ''


सुबह का सपना सच होता है
इसलिए सोते हुए, यही प्रार्थना
कि तुम्‍हारा सपना आये तो सुबह आये ... डॉ. निधि टंडन जी ... फिर सुबह से रात होने तक बस तुम्‍हारा ख्‍याल '' मेरी व्‍यस्‍तताऍँ ''


ठंडी आह भर कर
पुन: कोशिश करती लड़ती अपने विचारों से
आखिर
जीत जाते संस्‍कार और हार जाती वो ... डॉ. प्रीत अरोड़ा जी ... कहती है यही है वो '' संस्‍कारों की जीत ''

 
तभी तो कूडेदान में सिसकती
बेटियां यही प्रश्‍न उठाती हैं  ... डॉ. मोनिका शर्मा जी ... क्‍यों, कैसे मानुष न रहे हम ?   '' आखिर क्‍यों विक्षिप्‍त हुए हम ? ''


अफसानों को हसीन मोड़ पे छोड़ना
न चाहते हुए भी गम से रिश्‍ता जोड़ना
आसान तो नहीं होता
हवा के रूख को मोड़ना ... दिगम्‍बर नासवा जी .. कुछ न कुछ होने का ये अहसास शायद तभी तो ... '' कभी खत्‍म नहीं होता ''

पत्‍नी से बिछुड़ा आदमी
कर्मयोगी है
वह संसार से भाग नहीं सकता ... दीपिका रानी जी ... नई उम्‍मीदों, नए हौसलों के साथ ... '' पति से बिछुड़ी औरत ''

ओ गंगा तुम बहती हो क्‍यों
उस नदी में बहते देखा है
उसने हमारी सभ्‍यता को
फूले हुए 'शव' की तरह ... नित्‍यानंद गायेन जी ... आज वह सहमा हुआ है  ... '' आखरी पेड़ और चिडि़या ''

बचपन भले ही चला जाये
बचपना कहां जाता है
और शायद यही तो है
जो इंसान की मासूमियत
खोने से बचाता है ... पल्‍लवी त्रिवेदी जी ... '' हम सब ऐसे ही होते हैं ''

इन आंखों को पढ़ना बहुत मुश्किल है
पढ़ लिया तो फिर समझना मुश्किल है
समझ लिया तो फिर भूलना मुश्किल है ... मीनाक्षी धन्‍वंतरी जी ... सुंदर सौम्‍य, मुस्‍काती नम्र नम आंखे उनका '' व्‍यक्तित्‍व ''

एक ईमानदार
कोशिश,  बस इतना ही ... मुकेश कुमार सिन्‍हा जी .. शायद बन जाय शहंशाह तकदीर से ऊपर उठकर ... '' हाथ की लकीरें ''

अब रूकने की जरूरत है
और यह जानने की जरूरत है
शब्‍दों के अरण्‍य में हम सब एक साथ कैसे??... हमें खोजा रश्मि प्रभा जी ने ... जिनकी अद्भुत रचना '' तथास्‍तु और सब खत्‍म ''

हँसते - बतियाते
ये तारे
क्‍या
हमेशा ही इतनी खुशी से चमकते रहते हैं ?... रश्मि रवीजा जी ..  '' काली कॉफी में उतरती सांझ ''

मुझे बुलाना हो तो
शांत मन और मस्तिष्‍क से
बुलाओ
परमात्‍मा का ध्‍यान करो ......... राजेन्‍द्र तेला जी .... '' नींद मानो रूठ कर बैठ गई '' 

नहीं मिलेगा तुम्‍हें कभी वरदान
नहीं खोज पाओगे तुम उसका ब्रह्मांड ... वंदना गुप्‍ता जी ... '' और श्राप है तुम्‍हें मगर तब तक नहीं मिलेगा तुम्‍हें पूर्ण विराम ''


अब कोई सपना अपना नहीं
थमा उसे सपनों की पोटली
निश्‍चिंत हुई  ............ वाणी शर्मा जी ......भर गया मेरा अधूरापन ..........  '' मैं पूर्ण हुई, सम्‍पूर्ण हुई ''


मां को मुझे कभी तलाशना नहीं पड़ा
वो हमेशा ही मेरे पास थीं और हैं अभी भी .... विजय कुमार सम्‍पत्ति जी ....आज सिर्फ मां की याद रह गई है .... '' तलाश ''


तुम्‍हें नहीं लगता
इस पूरी यात्रा में
सारे रिश्‍ते ज़ख्‍म ही बनकर रह जाते हैं ... विभारानी श्रीवास्‍तव जी ... तो रिश्‍तों से रू-ब-रू हो या ज़ख्‍म कुरेदो ... '' बात एक ही है ''

पर पेड़  से गिरे पत्‍ते
कहां फिर पेड़ पर लगते हैं
वो सूखे लम्‍हें भी
यहां - वहां बिखरे ही दिखते हैं .... शिखा वार्ष्‍णेय जी .......जिनके मन के किसी कोने में झिलमिलाते हैं ... '' कुछ पल ''



नादान ख्‍याल है / मगर सच में सोचती हूँ ऐसा
काश किसी याद को सिरहाने रख कर सो जाऊँ
और पा जाऊँ तुम्‍हें तब ............... शैफाली गुप्‍ता जी ......... क्‍या कम लगेगी मुझे... '' तुम्‍हारी कमी ''

 
जिंदगी की राह में
शूल भी हैं, फूल भी
किस - किस का त्‍याग करूं
और किसे वरण करूं .... संगीता स्‍वरूप जी ... नाते-रिश्‍ते सब मेरे दिल के बहुत करीब हैं ... '' किसे अर्पण करूं ''


इंसानों ने जो ऊँचे - ऊँचे टॉवर लगाये हैं
ये ही हमारे लिए मुसीबत लाये हैं .... संध्‍या शर्मा जी ..... मुझे सोचने के लिए छोड़ गई  ... '' चिडिया ''


हम जी न सकेंगे दुनिया में

माँ जन्मे कोख तुम्हारी से ... सतीश सक्‍सेना जी ...कैसे तेरे बिन दिन बीते, यह तुम्‍हें बताने का दिल है ..  '' तेरी याद में ''


उम्र के इस पड़ाव पर आ
निकलता हूँ जिस शाम
मैं घर से अपने
सात समुन्दर पार आने को ... समीर लाल जी ... उसके आने का सबब ... '' वापसी ''

लोग कहते हैं - कल छोड़ तो आज को जी
फिर भी यादें हैं कि अनचाहे चली आती हैं .... सरस दरबारी जी .... बस इस तरह से उम्र बीतती जाती है ... '' यादें ''

यदि ऐक्टिंग है तो अद्भुत है
 

करोडो से कम अमिताभ भी नहीं लेता
इस ऐक्टिंग के
इस बेचारे ने तो करोडो का खजाना
कोडियों के मोल बेचा है .... सलिल वर्मा जी ... तभी जनपथ पर बैठा भीख देखो मांगता है ...'' भिक्षुक ''

मैं मर्यादा पुरूषोत्तम राम
की मां कौशल्‍या नहीं
उनके अनुज लक्ष्‍मण
की मां सुमित्रा हूँ ? ...... साधना वैद जी ... फिर मेरी पीड़ा तुम्‍हारी पीड़ा से बौनी कैसे हो गयी? ... '' सुमित्रा का संताप ''  


कभी कभी आत्मा के गर्भ में
रह जाते हैं कुछ अंश
दुखदायी अतीत के ..... सुनीता शानू जी ... अमर बेल की मानिंद '' एक विचार '' 

हाँ ! आज मैं
मुहब्‍बत की अदालत में खड़ी होकर
तुम्‍हें हर रिश्‍ते से मुक्‍त करती हूँ  .... हरकीरत हीर जी .. दर्द के सहारे उस रिश्‍ते से मुक्‍त करती हूँ  '' मैं तुम्‍हें मुक्‍त करती हूँ ''

रामायण - महाभारत, वेद-पुराण इसी अरण्‍य की जड़े हैं .. पंचतंत्र की कहानियां यहीं लिखी गईं हैं .. प्रभु के निर्माण को रचनाकार अलग-अलग साँचे देता है ... 
''शब्‍दों के अरण्‍य में'' भी हर रचनाकार ने अपनी रचनाओं से पूरा न्‍याय किया है कहीं अध्‍यात्‍म है तो कहीं जीवन दर्शन कहीं यादों का संगम तो कहीं मुहब्‍बत तो कहीं शिकायत मुहब्‍बत से ... मैने भी एक छोटा सा प्रयास किया है ... हां इस प्रयास में कुछ नाम शामिल नहीं कर पाने का अफसोस जरूर है ... पर आप सभी के सहयोग की अपेक्षा भी है ... एक पहचान करने के लिए सभी से आपको भी पुस्‍तक की आवश्‍यकता महसूस हो रही होगी तो ... इसे आप प्राप्‍त कर सकते हैं ... ऑनलाइन फ्लिपकॉर्ट पर 
 
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बुधवार, 25 जुलाई 2012

गिर गया तो फिर किसको नज़र आएगा

डर था मुझे वो टूटेगा तो बिखर जाएगा,
तुमसे जो मुंह फेरेगा तो किधर जाएगा ।

संभालता रहा खुद को भागती दुनिया में,
गिर गया तो फिर किसको नज़र आएगा ।

बेबसी जब भी पूछती मेरा हाल धीमे से,
सोचता कुछ कहा तो बन ज़हर जाएगा ।

बुत बना रहा वो हादसों को देखकर जब,
कहा लोगो ने इसतरह तो ये मर जाएगा ।

गुनाहों  की जो लोग माफ़ी भी नहीं मांगते,
पूछो तो बचाया इनको किस कदर जाएगा ।

शनिवार, 21 जुलाई 2012

तुम्‍हारी हर ख्‍़वाहिश को ...


















कुछ बातों पर
यकी़न करना जैसे कील चुभोना होता है
सच की नोक इतनी पैनी
फिर भी झूठ के
आवरण उसे ढंकते रहते हैं
चुभ सकती थी ऐसे जैसे किसी ने
ठोक दिया हो जबरदस्‍ती
पर वह चुभती रही हर बार
एक नई जगह पर
और छलनी कर देती पूरा का पूरा
...
कुछ बेबसी के लम्‍हों पर
फिर खा़मोशी ने
तान दी चादर बड़े ही सलीके से
हिचकियों की आवाजें
हलक से बाहर आ रही थीं दबी-दबी सी
उसने चादर का
एक कोना भर लिया मुंह में
सन्‍नाटा बेताब था
विद्रोह की गर्जना करने को
उसने हथेलियों से
दी थीं थपकियां
वो निढाल हो गया
कहना चाहता था
बेबसी तुम सन्‍नाटे की
दुलहन न बनती तो अच्‍छा था
वो मासूम़
जिसका कल रात कत्‍ल हुआ
वो फक़ीर अंधा था
सौंप गया था बड़े ही यकीन से
तुम्‍हें मेरे बाजु़ओं में
और मैंने
तुम्‍हारी हर ख्‍वाहिश को
चकनाचूर कर दिया !!!
...

बुधवार, 18 जुलाई 2012

खुद का खुद से नाता तोड़ता !!!













सब कुछ पा लेने के भ्रम में वह
जाने कितना कुछ वह
खोता चला गया
...
टूटता रहा जब भी कुछ
वह उसे जोड़ने के क्रम में
कभी वादे करता
कभी मिन्‍नतें करता
कभी बांधकर गांठ
किसी न किसी तरह  से
अपना काम चला ही लेता
...
होता मन जब भी प्रेम में
फूलों को तोड़ता
तुमसे स्‍नेह का रिश्‍ता जोड़ता
...
क्रोध की अग्नि में जब वह
अपना धैर्य खो देता
मैं की सर्वज्ञता में
रिश्‍तों को तोड़ता
....
वक्‍़त के साथ दौड़ता
इसको उसको सबको
पीछे छोड़ता
खुद का खुद से नाता तोड़ता
....

सोमवार, 16 जुलाई 2012

आस्‍था का परम दर्शन !!!














आस्‍थावान होता है मन तो
भावनाओं का अभिषेक होना स्‍वाभाविक है
लेकिन  जब भी कभी यह आस्‍था
किसी दिन विशेष को ईश्‍वर की दहलीज़
पर आती  भीड़ का सैलाब़ आ जाता
ईश्‍वर की एक झलक पाने के लिए
धक्‍का-मुक्‍की मच जाती
पहले आप की श्रेणी यहां नादारद
सिर्फ रह जाता पहले मैं -पहले मैं
दर्शन करके अपना जीवन धन्‍य करना
.........
यह आस्‍था किसी दिन विशेष को ही
क्‍यूँ उमड़ती नवरात्रि हो महाशिवरात्रि
गंगा स्‍नान हो या फिर
हर की पौढ़ी पर मां गंगा की आरती
आस्‍था अपनी चरम सीमा पार करते हुए
उत्‍सव में परीणित हो जाती
यह उत्‍सव व्‍यापार हो जाता
मार्ग अवरूद्ध हो
संकरी गली में  तब्‍दील हो जाते
प्रसाद की दुकाने सज जाती ...
आलम यहां तक भी देखा
देव प्रतिमा को समर्पित जल
किसी अगले श्रद्धालु को अर्पित हो जाता
यही होता अंत में
आस्‍था का परम दर्शन !!!
आस्‍था जब भी कभी ईश्‍वर की दहलीज़
पर आती  भीड़ का सैलाब़ आ जाता
 .....

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

क्‍या कहूँ अब इन यादों को ... !!!














वो आज रूठा है यादों से
गुस्‍से से बोला
निकम्‍मी हैं ये तो
जब भी छुट्टी होती है
सोचता हूँ आज तो जी भर के सोना है
पर कहां आज तो आंखे रोज से पहले ही
तरोताज़ा हो गईं
यादें ले आईं सवेरे-सवेरे
एक फीकी सी बेड टी
मैं करवट बदल - बदल कर उसे अनदेखा करता  रहा
कानों में एक धीमी फुसफुसाहट सी हुई
ठंडी हो जाऊंगी तो बेस्‍़वाद लगूंगी
....
उफ् तुम्‍हें पता है हफ्तें भर की भागमभाग के बाद
ये संडे कितना प्‍यारा लगता है
एक भरपूर नींद हो कुछ ख्‍वाब हों
बस कोई खल़ल डालने वाला न हो
यादों का सुबह से आ धमकना
सच इन यादों की जगह
तुम होती तो
ये फीकी सी बेड टी भी मीठी लगती
हम मिलकर कुछ यादों का
एक स्‍पेशल बुके तैयार करते
कुछ यादों को साथ शेअर कर खिलखिलाते
कुछ को गुनगुनाते गीत की तरह
कुछ पलों को बनाते हम भी इक याद
कहते - कहते वो बड़बड़ा उठा
लो इन निकम्‍मी यादों ने मुझे भी
निकम्‍मा कर दिया :)
क्‍या कहूँ अब इन यादों को ... !!!


गुरुवार, 12 जुलाई 2012

वो गूंगी नहीं थी !!!

वो गूंगी नहीं थी,
उसे बोलना आता था,
उसे देता था दिखाई
सुनती रहती थी
धड़कनों की उथल-पुथल को
पर वह बस
खा़मोश रहती थी
मुहब्‍बत की हद़ से
वाक्रिफ़ थी
इसलिए कुछ कहती नहीं थी!!!

मंगलवार, 10 जुलाई 2012

कभी यूँ भी आज़मा के देख ...

आज़माना है तो मुझे तो कभी यूँ भी आज़मा के देख,
मैं हँसती रहूँ तेरे हर सितम पर तू मुझे रूला के देख ।

जा डाल दी खाक़ मैने तेरे हर गुनाह पे कोई शिक़वा नहीं,
जा माफ़ कर तू भी कभी किसी को यूँ अपना बना के देख ।

मुश्किलों का भी अपना है एक मज़ा तू इक बार यकीं से
इन मुश्किलों की ओर हौसले से सर अपना उठा के देख ।

दौर मुश्किल हो हालात नाजु़क हों जब भी कोई साथ न दे,
ऐसे वक्‍़त में तू इक बार दिल से मुझे आवाज़ लगा के देख ।

बुलन्‍दी पर पहुंचने का कोई टोटका नहीं होता है बता दे उसे,
बस इक बार सदा  तू मन में लगन का दीप जला के देख ।

शनिवार, 7 जुलाई 2012

खामोशी को शब्‍द मिल जाएं .... !!!
















कुछ किवाड़ बंद हैं
सालों साल बीते नहीं बजी सांकल
चौखट ने नहीं सुनी उसकी खनखनाहट
ये कमरा जिसपे पड़ी कुर्सियों पे
बस धूल पसर जाती खामोशी की
कोने जालों से हैं भर जाते
व्‍यस्‍त मकड़ी हर दिन पूरी तन्‍मयता से
नया घर बनाती उतनी तल्‍लीनता से
जितना पहले वाला बनाया था
बहुत काम है उसके लिए तो
पूरा कमरा उसके आधिपत्‍य में जो है
....
कमरे में नमी सी है
इन दीवारों की सिसकियां शायद सुनी हों किसी ने
आहटों पर कान लगाये सन्‍नाटा भी थक चला है
अब वह चाहता है कोई आये
और भंग कर दे उसकी नीरवता को
इन दबी सिसकियों में
वह परत दर परत छिपी नमीं को आखिर 
कब तक ढहने से रोक पाएगा
....
जाने कितनी आवाजें गुम हैं
तुम्‍हें पुकारकर
आओ आजाद कर दो उन आवाजों को
तुम्‍हारा नाम हो हर तरफ़
तुम ही रहो हर तरफ़  बस तुम्‍हारी ही मुस्‍कान हो
जब बजे सांकल ...
तुम्‍हारी पायल के स्‍वर साथ देते हुए कह उठें
लो मैं आ गई ....
खामोशी को शब्‍द मिल जाएं फिर कुछ और नहीं चाहिए .... !!!
...





गुरुवार, 5 जुलाई 2012

यह दुआ है तुम्‍हारे लिए ....!!!


















किसी योद्धा सी तुम कमजोर विचारों को
मन से झटकते हुए आगे बढ़ती
करती सवाल खुद से
आस्‍थाओं का मान रखना
सबका ह्रदय में सम्‍मान रखना
पर फिर क्‍यूँ
जीवित न अपना स्‍वाभिमान रखना

कर्तव्‍य का रक्‍त धमनियों में
नितांत वेग से बहता हरदम
मैं करती हूँ, कर लूगीं, तुम फिक्र मत करो
हौसले की परछाईं बनकर
समर्पित खुद को करना
मुश्किलें कैसी भी आईं
त्‍याग की पहली सीढ़ी पर कदम
खुद का रखने में पहल करना
वक्‍़त की कसौटियों पर
हँसकर खुद को परखना
बेफिक्री की चादर उढ़ाकर सबको
खुद ख्‍यालों के बिस्‍तर पे  करवट बदलना
तुम्‍हारा देखा है मैने
...
आस्‍थाओं का मान रखना
सबका ह्रदय में सम्‍मान रखना
पर फिर क्‍यूँ
जीवित न अपना स्‍वाभिमान रखना
इस बात से सहमत हूँ शत-प्रति-शत
कुछ रहे न रहे
तुम्‍हारा यह हौसला और यह स्‍वाभिमान सदा रहे
यह दुआ है तुम्‍हारे लिए... !!!

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....