शनिवार, 17 जुलाई 2010

सारे रिश्‍ते तोड़ आया ....







गुरबत पे मेरी मुझको छोड़ सबको तरस आया,

सब मुझे छोड़ गये मैं न उसको फिर छोड़ पाया ।

कुछ भूल गये मुझको, कुछ अजनबी हुये मुझसे,

मैं लौटा यादें साथ ले जब मुश्किल ये मोड़ आया ।

रिश्‍ता खून का दुहाई मांगे मेरे होने की जब भी,

मैं कहता हंसकर मैं तो सारे रिश्‍ते तोड़ आया

नासमझ को समझाओ तो जरा टूटे हुए धागे को,

बिन गांठ के कौन है जो आजतलक जोड़ पाया ।

खेल तकदीर के खिलौना बन के इंसान निभाता है,

भटका सारा जीवन तब जाकर यह निचोड़ आया ।

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

हंसने के फन में ....






तेरी मुहब्‍बत मुझे इस कदर रूलाएगी छिपाने में,

उसको इक मुस्‍करा‍हट भी मेरी न काम आएगी ।

यूं तो हंसने के फन में खूब माहिर हूं होगा क्‍या,

जब हंसी बन के अश्‍क आंखों से छलक जाएगी ।

दर्द तेरा दिया अब दवा का काम करता है,

जख्‍म पे कोई मरहम अब न काम आएगी ।

टीस जख्‍मों की चैन दिल का बन गया मेरे,

इस चुभन से बच के जिन्‍दगी किधर जाएगी ।

जुर्म हो गया मुहब्‍बत पे इस तरह ऐतबार करना,

इसकी कीमत तो ताउम्र अश्‍को से चुकाई जाएगी ।

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....