मेरे चुप रहने की आदत को उसने जाने क्यों,
मान लिया मन ही मन खुद से डरपोक हूं मैं ।
किसी बड़े की बात को सिर माथे लिया जब मैने,
तो भी हां कहने पर मेरे सोचा ये डरपोक हूं मैं ।
ना करने की आदत सीख ली होती अगर मैने,
तो शायद नहीं कहते मुझे वह कि डरपोक हूं मैं ।
वक्त होकर भी नहीं होता जब उनके लिये तो कहते,
व्यस्त होगा, कह नहीं पायेंगे चाहकर भी डरपोक हूं मैं ।
जैसे बेअदब हो गये हैं यह यदि मैं ऐसा न बन पाया,
तो क्या मुझे सुनना पड़ेगा ‘सदा’ यही डरपोक हूं मैं ।
शुक्रवार, 15 मई 2009
मंगलवार, 12 मई 2009
कुछ भरम में रख . . .
मुझसे इस कदर दुश्मनी न कर की ,
दोस्ती से उठ जाए यकीं लोगो का ।
कुछ भरम में रख मुझे औरों को भी रहने दे,
मर न जाए ऐसी बातों से ज़मीर लोगों का ।
मैं कैसे मन लूँ नेक इंसान उस शख्स को,
जो समझता है ख़ुद को खुदा लोगों का ।
ये ठीक है तेरा ओहदा ऊँचा है हम सबसे,
बनाने में तुझे बड़ा, हाँथ है इन्ही लोगों का ।
हालात से इस तरह "सदा" मत कर समझौता
वरना हक़ मांगेगा कौन कमज़ोर लोगों का ।
दोस्ती से उठ जाए यकीं लोगो का ।
कुछ भरम में रख मुझे औरों को भी रहने दे,
मर न जाए ऐसी बातों से ज़मीर लोगों का ।
मैं कैसे मन लूँ नेक इंसान उस शख्स को,
जो समझता है ख़ुद को खुदा लोगों का ।
ये ठीक है तेरा ओहदा ऊँचा है हम सबसे,
बनाने में तुझे बड़ा, हाँथ है इन्ही लोगों का ।
हालात से इस तरह "सदा" मत कर समझौता
वरना हक़ मांगेगा कौन कमज़ोर लोगों का ।
सोमवार, 4 मई 2009
आंखों में नमी . . .

वफ़ा की चाहत में हम भटके थे बहुत,
मिली जो बन के मुहब्बत तो रास न आई ।
दर्द लिए जुदाई का बहुत दूर चले जाना चाहा,
तमन्ना थी जो मौत की तो पास ना आई ।
रहे तन्हा जिन्दगी का सफर कटा अकेले ही,
जब तक जियेंगे रहेगी साथ मेरी तन्हाई ।
राहे शौक में गर कदम मेरे डगमगाते न,
सच कहें होते ना तेरे हम यूँ तमन्नाई ।
हाले दिल सोचा जब भी "सदा" तुमको बताना,
फकत लबों पे दर्द आँखों में नमी थी उभर आई ।
शनिवार, 2 मई 2009
स्वर लहरी . . .

ऊँचे लंबे पर्वतों,
के बीच वो शांत,
निर्मल नदी जिसकी,
कलकल करती
स्वर लहरी, अक्सर
पर्वतों को विचलित करती,
ऊँचे लंबे . . . !
सोचते जबतब
हम यूँ जाने कब तक,
खड़े रहेंगे एक जगह,
काश, हम भी इस,
श्वेत सरिता से बहते,
बात अपने मन की,
किसी से कहते,
ऊँचे लंबे . . ।
उधर सोचती
धवल नदी,
मुझसे भले यह पर्वत हैं,
एक जगह खड़े तो हैं,
तनिक भी जीवन में
विश्राम नहीं
क्यों कर जीवन में,
पल भर भी
आराम नहीं . . !
ऊँचे लंबे . . . !
शुक्रवार, 1 मई 2009
बदल जाए जो हालातों से . . .
उड़ के छू लूँ मैं गगन - कहता तो है हर एक मन,
हाँथ बढ़ा के छू ले - नहीं आदमी में अभी ये फ़न ।
एक मकाम जो मुझको पाना है,
खुशियों तुम्हे मेरे घर आना है ।
राह में कभी आयेंगी जो मुश्किलें,
ऐसे में बिल्कुल नही घबराना है ।
हौसला हो मन में गर कुछ करने का,
ऐसे में पड़ता तूफान से भी टकराना है ।
बदल जाए जो हालातों से वो क्या शख्स,
बदल दे जो हालातों को हमने उसे माना है ।
झुका है ना सर तेरा कभी ना ही झुकेगा,
इसे तो बस "सदा" रब के आगे ही झुकाना है ।
हाँथ बढ़ा के छू ले - नहीं आदमी में अभी ये फ़न ।
एक मकाम जो मुझको पाना है,
खुशियों तुम्हे मेरे घर आना है ।
राह में कभी आयेंगी जो मुश्किलें,
ऐसे में बिल्कुल नही घबराना है ।
हौसला हो मन में गर कुछ करने का,
ऐसे में पड़ता तूफान से भी टकराना है ।
बदल जाए जो हालातों से वो क्या शख्स,
बदल दे जो हालातों को हमने उसे माना है ।
झुका है ना सर तेरा कभी ना ही झुकेगा,
इसे तो बस "सदा" रब के आगे ही झुकाना है ।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
लेबल
- 13 फरवरी / जन्मदिन (1)
- काव्य संग्रह 'अर्पिता' (1)
- गजल (1)
- ग़ज़ल (21)
- नया ब्लाग सद़विचार (1)
- बसन्त ... (1)
- यादें (1)
- kavita (30)
ब्लॉग आर्काइव
मेरे बारे में
- सदा
- मन को छू लें वो शब्द अच्छे लगते हैं, उन शब्दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....