शुक्रवार, 15 मई 2009

वक्‍त होकर भी नहीं होता जब . . .

मेरे चुप रहने की आदत को उसने जाने क्‍यों,
मान लिया मन ही मन खुद से डरपोक हूं मैं ।

किसी बड़े की बात को सिर माथे लिया जब मैने,
तो भी हां कहने पर मेरे सोचा ये डरपोक हूं मैं ।

ना करने की आदत सीख ली होती अगर मैने,
तो शायद नहीं कहते मुझे वह कि डरपोक हूं मैं ।

वक्‍त होकर भी नहीं होता जब उनके लिये तो कहते,
व्‍यस्‍त होगा, कह नहीं पायेंगे चाहकर भी डरपोक हूं मैं ।

जैसे बेअदब हो गये हैं यह यदि मैं ऐसा न बन पाया,
तो क्‍या मुझे सुनना पड़ेगा ‘सदा’ यही डरपोक हूं मैं ।

मंगलवार, 12 मई 2009

कुछ भरम में रख . . .

मुझसे इस कदर दुश्मनी न कर की ,
दोस्ती से उठ जाए यकीं लोगो का ।

कुछ भरम में रख मुझे औरों को भी रहने दे,
मर न जाए ऐसी बातों से ज़मीर लोगों का ।

मैं कैसे मन लूँ नेक इंसान उस शख्स को,
जो समझता है ख़ुद को खुदा लोगों का ।

ये ठीक है तेरा ओहदा ऊँचा है हम सबसे,
बनाने में तुझे बड़ा, हाँथ है इन्ही लोगों का ।

हालात से इस तरह "सदा" मत कर समझौता
वरना हक़ मांगेगा कौन कमज़ोर लोगों का ।

सोमवार, 4 मई 2009

आंखों में नमी . . .


वफ़ा की चाहत में हम भटके थे बहुत,

मिली जो बन के मुहब्बत तो रास न आई ।


दर्द लिए जुदाई का बहुत दूर चले जाना चाहा,

तमन्ना थी जो मौत की तो पास ना आई ।


रहे तन्हा जिन्दगी का सफर कटा अकेले ही,

जब तक जियेंगे रहेगी साथ मेरी तन्हाई ।


राहे शौक में गर कदम मेरे डगमगाते न,

सच कहें होते ना तेरे हम यूँ तमन्नाई ।


हाले दिल सोचा जब भी "सदा" तुमको बताना,

फकत लबों पे दर्द आँखों में नमी थी उभर आई ।


शनिवार, 2 मई 2009

स्वर लहरी . . .


ऊँचे लंबे पर्वतों,

के बीच वो शांत,

निर्मल नदी जिसकी,

कलकल करती

स्वर लहरी, अक्सर

पर्वतों को विचलित करती,

ऊँचे लंबे . . . !

सोचते जबतब

हम यूँ जाने कब तक,

खड़े रहेंगे एक जगह,

काश, हम भी इस,

श्वेत सरिता से बहते,

बात अपने मन की,

किसी से कहते,

ऊँचे लंबे . . ।

उधर सोचती

धवल नदी,

मुझसे भले यह पर्वत हैं,

एक जगह खड़े तो हैं,

तनिक भी जीवन में

विश्राम नहीं

क्यों कर जीवन में,

पल भर भी

आराम नहीं . . !

ऊँचे लंबे . . . !



शुक्रवार, 1 मई 2009

बदल जाए जो हालातों से . . .

उड़ के छू लूँ मैं गगन - कहता तो है हर एक मन,
हाँथ बढ़ा के छू ले - नहीं आदमी में अभी ये फ़न ।

एक मकाम जो मुझको पाना है,
खुशियों तुम्हे मेरे घर आना है ।

राह में कभी आयेंगी जो मुश्किलें,
ऐसे में बिल्कुल नही घबराना है ।

हौसला हो मन में गर कुछ करने का,
ऐसे में पड़ता तूफान से भी टकराना है ।

बदल जाए जो हालातों से वो क्या शख्स,
बदल दे जो हालातों को हमने उसे माना है ।

झुका है ना सर तेरा कभी ना ही झुकेगा,
इसे तो बस "सदा" रब के आगे ही झुकाना है ।




ब्लॉग आर्काइव

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....