सोमवार, 5 नवंबर 2012

कुछ गुनाह ...!!!

कुछ गुनाह भागते हैं
भागते ही रहते हैं सच का सामना करने से
सच का भय उन्‍हें चैन से पलकें भी
झपकने नहीं देता
खोजती दृष्टि ... के आगे
जब भी पड़े सूखे पत्ते से कांप उठे
या पीला ज़र्द चेहरा लिये
अपनी ही नजरो से ओझल होते
...
कुछ गुनाहों को मैने
देखा है नींद के लिये तरसते हुये
खुली आंखों से लम्‍बी रातों की कहानी
सन्‍नाटों को चीरती अंजानी आवाजें
घबराकर कानों पर हथेलियों का रखना
चिल्‍लाकर दीवारों के आगे सच कुबूल करना फिर
पसीने से तर-ब-तर हो
थाम लेना सिर को उफ् ये क्‍या हो गया !
के शब्‍द
सच कहूँ जीना दूभर कर देते हैं
...
कुछ गुनाह़ अंजाने में हो जाते हैं जब भी
सच के सामने शर्मिन्‍दा होते हैं
पश्‍चाताप के आंसुओं से
मन की सारी ग्‍लानि को बहाकर
कुबूल कर लेते हैं अपना अपराध और
हर गुनाह से तौबा कर सच का साथ देते हुए
यही कहते हैं ...
सच कभी छिपता नहीं
कभी कैद नहीं होता 
अटल .. अविचल ... अमिट जो होता है
वही मन का सुकून होता है !!!
....

40 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 07/11/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  2. सच कभी छिपता नहीं
    कभी कैद नहीं होता
    अटल .. अविचल ... अमिट जो होता है
    वही मन का सुकून होता है !!!

    शायद यही सत्य है

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  3. सच कभी छिपता नहीं
    कभी कैद नहीं होता
    अटल .. अविचल ... अमिट जो होता है
    वही मन का सुकून होता है !!!

    अमिट सच !!

    बहुत खूब !!

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  4. सच अपने आप से छिपता नहीं , !
    अटल सत्य !

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  5. अखण्ड सत्य सदा जी सच कहा है आपने बेहतरीन रचना

    उत्तर देंहटाएं
  6. कुछ गुनाहों को मैने
    देखा है नींद के लिये तरसते हुये
    खुली आंखों से लम्‍बी रातों की कहानी
    सन्‍नाटों को चीरती अंजानी आवाजें
    घबराकर कानों पर हथेलियों का रखना
    चिल्‍लाकर दीवारों के आगे सच कुबूल करना फिर
    पसीने से तर-ब-तर हो
    थाम लेना सिर को उफ् ये क्‍या हो गया !
    के शब्‍द
    सच कहूँ जीना दूभर कर देते हैं ..........waah bahut sundar baat kah di aapne in panktiyon mein ..

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  7. सच कभी छिपता नहीं
    कभी कैद नहीं होता
    अटल .. अविचल ... अमिट जो होता है
    वही मन का सुकून होता है !!!

    यही शाश्वत है ।

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  8. सच से हरदम भागते, भारी विकट गुनाह |
    कहीं बदल कर रखी तो, आह आह ही आह |
    आह आह ही आह, राह बाधित हो जाए |
    खैरख्वाह शैतान, नहीं फिर पास बुलाये |
    खुराफात में लीन, अगर यह नहीं रहेगा |
    इस दुनिया से जाय, भला क्या वहाँ कहेगा ||

    इसीलिए करता रहे, बन्दा यहाँ कुकर्म |
    छोड़ छाड़ के शर्म को, छेड़-छाड़ का धर्म ||

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  9. उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक कुछ कहना है पर है ।।

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  10. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  11. कुछ गुनाह़ अंजाने में हो जाते हैं जब भी
    सच के सामने शर्मिन्‍दा होते हैं
    पश्‍चाताप के आंसुओं से
    मन की सारी ग्‍लानि को बहाकर
    कुबूल कर लेते हैं अपना अपराध और
    हर गुनाह से तौबा कर सच का साथ देते हुए
    यही कहते हैं ...
    सच कभी छिपता नहीं

    वाह बहुत खुबसूरत.......मैं इस पंक्ति को आपके नाम के साथ फेसबुक पर शेयर कर रहा हूँ :-)

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  12. बहुत बढ़िया...

    कुछ गुनाह़ अंजाने में हो जाते हैं जब भी
    सच के सामने शर्मिन्‍दा होते हैं
    पश्‍चाताप के आंसुओं से
    मन की सारी ग्‍लानि को बहाकर
    कुबूल कर लेते हैं अपना अपराध ....

    सच बात..
    सस्नेह
    अनु

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  13. ज़ख्म जब भी कोई जहन-ओ-दिल पे लगा ज़िंदगी की तरफ एक दरीचा खुला
    हम भी गोया किसी साज़ के तार हैं चोट खाते रहे गुन-गुनाते रहे.....

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  14. मन के सुकून से बढ़ कर कोई सुकून नही ......
    शुभकामनाएँ!

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  15. सच ही जीते, हर घटना में..वही साध्य हो।

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  16. वाह बहुत खूब ... :)

    भुने काजू की प्लेट, विस्की का गिलास, विधायक निवास, रामराज - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  17. कुछ गुनाह़ अंजाने में हो जाते हैं जब भी
    सच के सामने शर्मिन्‍दा होते हैं
    पश्‍चाताप के आंसुओं से
    मन की सारी ग्‍लानि को बहाकर
    कुबूल कर लेते हैं अपना अपराध ....बहुत सही कहा सदा जी.बहुत बढ़िया...

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  18. क्या इत्तेफाक है , मैं अभी crime petrol ही देख रहा था , कि यहाँ भी गुनाह की बात | :)
    वैसे सचमुच बहुत ही बखूबी लिखा है , मन की मनोभावनाओं को | गुनाह तो हर कोई करता होगा कोई छोटा तो कोई बड़ा , लेकिन उसके बाद जो उसके मन में अंतर्द्वंद चलता है उसका बहुत अच्छा चित्रण |
    "चिल्‍लाकर दीवारों के आगे सच कुबूल करना"
    मेरी पसंदीदा पंक्ति |
    कुछ मेरा भी -
    आज जब नाखूनों से दिल को करोंचा अपने ,
    मुझे तेरे लहू के वहाँ , छींटे नजर आये |

    सादर

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  19. अंजाने में किया गया गुनाह तो क्षम्य होता है यदि लोग यह समझने लगें कि उनका किया गया कार्य गुनाह है तो शायद गुनाह कुछ कम हो जाएँ ..... सुंदर प्रस्तुति

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  20. बिल्कुल..... विचारणीय भाव लिए कविता

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  21. बहुत ही गहरे और सुन्दर भावो को रचना में सजाया है आपने.....

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  22. सच कभी छिपता नहीं
    कभी कैद नहीं होता
    अटल .. अविचल ... अमिट जो होता है
    वही मन का सुकून होता है !!!

    ..बेहद उम्दा और सटीक.
    एक झूट को छिपाने के लिए हजार झूट बोलने पड़ते हैं और इस तरह आदमी झूट के सागर में डूबता जाता है-डूबता जाता है ...फिर एक सच्च के साथ ही इस सागर से बहार निकल आता है और एक सकून भरी जिन्दगी जीने लगता हैं.

    मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत हैं ...
    http://rohitasghorela.blogspot.in/2012/11/blog-post_6.html

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  23. कुछ गुनाह़ अंजाने में हो जाते हैं जब भी
    सच के सामने शर्मिन्‍दा होते हैं
    पश्‍चाताप के आंसुओं से
    मन की सारी ग्‍लानि को बहाकर
    कुबूल कर लेते हैं अपना अपराध और
    हर गुनाह से तौबा कर सच का साथ देते हुए
    यही कहते हैं ...
    सच कभी छिपता नहीं
    कभी कैद नहीं होता
    अटल .. अविचल ... अमिट जो होता है
    वही मन का सुकून होता है !!!


    बिल्कुल सच, मन को छू गई ये रचना
    बहुत सुंदर

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  24. सच कभी छिपता नहीं
    कभी कैद नहीं होता
    अटल .. अविचल ... अमिट जो होता है
    वही मन का सुकून होता है !!!

    गलतियों से सबक लेकर आगे बढना ही जिंदगी है
    दुख तो तब होता है जब लोग गलती करके भी खुद को सही ठहराते है
    और दुनिया में अधिकतर समस्याएँ इसी वजह से होती है
    बहुत उम्दा रचना है ।

    उत्तर देंहटाएं
  25. पश्‍चाताप के आंसुओं से
    मन की सारी ग्‍लानि को बहाकर
    कुबूल कर लेते हैं अपना अपराध और
    हर गुनाह से तौबा कर सच का साथ देते हुए
    यही कहते हैं ...
    सच कभी छिपता नहीं

    सही कहा कि गुनाह कबूलने में ही मन की शांति है ।

    उत्तर देंहटाएं
  26. bahu sundar rachna" jb sachayee nirvasn hone lagi log bastra pahnane lage hai.....such ko khule man se swikar kar lena hi shreyashkr hota hai

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  27. ...anjane me sahi ,anubhuti hote hi kuchh pashchataap ajeevan chalte hain.man ko chhooti panktiyan

    उत्तर देंहटाएं
  28. कुछ गुनाह़ अंजाने में हो जाते हैं जब भी
    सच के सामने शर्मिन्‍दा होते हैं
    पश्‍चाताप के आंसुओं से
    मन की सारी ग्‍लानि को बहाकर
    कुबूल कर लेते हैं अपना अपराध और
    हर गुनाह से तौबा कर सच का साथ देते हुए
    यही कहते हैं ...
    सच कभी छिपता नहीं
    कभी कैद नहीं होता
    अटल .. अविचल ... अमिट जो होता है
    वही मन का सुकून होता है !!!
    bahut behtareen abhiwayakti .......sacchaai ko uker diya hai kagaj ke pannon par ...badhai....

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  29. सुंदर भावों से सजी रचना... आनंद की अनुभूति हो गयी... कभी आना.. http://www.kuldeepkikavita.blogspot.com

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  30. सच कभी छिपता नहीं
    कभी कैद नहीं होता
    अटल .. अविचल ... अमिट जो होता है
    वही मन का सुकून होता है !!!
    ....

    SADA JI BAHUT HI SUNDAR RACHANA ....VAKAI SACH KABHI NAHI CHHIPATA HAI .

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  31. कुछ गुनाह़ अंजाने में हो जाते हैं जब भी
    सच के सामने शर्मिन्‍दा होते हैं
    पश्‍चाताप के आंसुओं से
    मन की सारी ग्‍लानि को बहाकर
    कुबूल कर लेते हैं अपना अपराध ....
    एकदम सही बात..
    बहुत ही बढ़ियाँ रचना...

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  32. झूट के आवरण तले सच कुलबुलाता रहता है...कभी न कभी वह आवरण को हटा देने में सफल हो ही जाता है...सुंदर रचना!!

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  33. कुछ गुनाहों को मैने
    देखा है नींद के लिये तरसते हुये
    खुली आंखों से लम्‍बी रातों की कहानी
    सन्‍नाटों को चीरती अंजानी आवाजें
    घबराकर कानों पर हथेलियों का रखना...


    कुछ गुनहा जान कर किए जाते हैं और कुछ अनजाने में हो जाते है ...पर मन पर पड़े बोझ को कोई कैसे कम करे ...सशक्त अभिव्यक्ति ...बहुत खूब ...सादर

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