मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

नये वर्ष की नई खुशियाँ !!

इसे दिसम्बर नहीं
सांता आया कहना चाहिए
इसके काँधे पे
जो झोली है न उसमे से
झाँकती है जनवरी
कुनमुनाता है बसन्त
बिखरा है गुलाल
मचाते हुए धमाल !
..
कच्ची अम्बियों के साथ
मनभावन सावन
झूलों की पींगे
वीर की कलाई पे
बंधने को रेशम की डोर
कितना कुछ समेटे
पटाखों की लड़ी से
झगड़ती वो फुलझड़ी !!
..
समेट कर सारे दिन सुहाने
आया फ़िर से दिसम्बर में
झोली लेकर सांता
हम सबको लुभाने
नये वर्ष की नई खुशियाँ लुटाने !!!
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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....