शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

उम्र के किसी न किसी दौर में :)

एक चश्‍मा प्‍लस (+) का
हो गया है जीवन भी
जब भी लगाया
नये सिरे से
निगाहों को अभ्‍यस्‍त करना पड़ा,
कई बार धुँधली इन आकृतियाँ से
मन की अकबकाहट
चेहरे पर साफ़ उभर आती
एक प्रयास देखने का
कटे हुये शीशे में नज़र को टिकाना
या फिर छोटे से गोले में
देखना निकट दृश्‍य !!
.....
चश्‍मा माइनस (-)
सब कुछ दूर बस दूर
नज़दीक में देखो तो लगता
रास्‍ते ऊपर - नीचे कब हो गये :)
सँभल के रखते कदम
ऐसे ही जिंदगी और रिश्‍तों में भी
आ जाती है समय के साथ दूरियाँ
इस माइनस (-) दूरी  के लिए
नहीं है कोई विशेषज्ञ
ना ही कोई चश्‍मा
इन फ़ासलों को कम करने के लिए
जिंदगी की किताब को पढ़ने के लिये
हर किसी को लगाना पड़ता है चश्‍मा
उम्र के किसी न किसी दौर में :)
....

शनिवार, 23 नवंबर 2013

मु़मकिन हो के न हो !!!!













कुछ पाक़ीज़ा से रिश्‍ते
जिनकी सरपरस्‍ती के लिये
दुआ़ जब भी निकलती
सर पे कफ़न बाँध के
ये कहते हुए
मु‍मकि़न हो के न हो
पूरा कर के लौटूंगी
तेरी ख्‍वा़हिश मेरे मौला !!!!
...
तबस्‍सुम की गली
मिला दर्द अंजाना सा तो
बढ़ा दी हथेलियाँ मैने
ओक़ में,
बस आँसू थे ज़ानां
कुछ नमक मिला था इनमें
सलीक़े का इस क़दर
बस लबों को खारापन दे गये
इस उम्‍मीद के साथ
जब भी इनका जि़क्र होगा
तेरा नाम न अाने देंगे
सिहर गई पी के जिंदगी इनको
और एक वादा किया
ये नमक तेरी वफ़ा का
ता-उम्र दिल में छिपा के रखेगी !!!!

सोमवार, 18 नवंबर 2013

समझाइशों की नदी !!!!!!!!!!!

मैं चाहती हूँ 
तुमसे कितना कुछ कहना 
पर तुम्हारे और मेरे बीच 
मौन की सुनामी है 
अवरूद्ध हैं सारे रास्‍ते  तुम तक पहुँच पाने के !
तुम अपने दायरे में स्तब्ध हो 
या यूँ कहूँ खामोश हो 
और मैं दायरे से बाहर 
प्रतीक्षित हूँ ख़ामोशी के टूटने की  …
 जाने कब टूटे - टूटे ना टूटे !
...
तुमसे झगड़ा तो नहीं हुआ मेरा,
कभी किसी बात को लेकर
पर फिर भी मेरा मौन लड़ा है
तुमसे जाने कितनी बार
बिना कुछ कहे भी
ये मौन कैसे झगड़ लेता है
मैं हैरान रह जाती हूँ
उसके इस व्‍यवहार पर !!
...

तुम और मैं जब भी
समझाइशों की नदी को 
साथ-साथ पार करना चाहते हैं
नदी का प्रवाह विपरीत होता है
हमारे किनारों से बेपरवाह
वह अपनी धुन में बहती जाती है 
कभी तुम्‍हारी आँख से 
मेरे हिस्‍से का मौन बन 
कभी मेरी उदासियों में 
तुम्‍हारे हिस्‍से की चुप्पियाँ बनकर !!!!!!
नदी - हम और किनारे का मौन 
जाने कब टूटे 
मैं प्रतीक्षित हूँ !!!!!!!!!

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

तुम कहने के पहले सोचती क्‍यूँ नहीं :)

ना शिकायत मुझे तुमसे है,
ना ही समय से, ना किसी और से
बस है तो अपने आप से
हर बार हार जाती हूँ तुम से
तो झगड़ती हूँ मन से
रूठकर मौन के एक कोने में
डालकर आराम कुर्सी
झूलती रहती अपनी ही मैं के साथ !
...
कभी खल़ल डालने के वास्‍ते
आती हैं हिचकियाँ लम्‍बी-लम्‍बी
गटगट् कर पी लेती हूँ पानी का ग्‍लास
एक ही साँस में
सूखता हलक़ तर हो चुका होता है
पर पलटकर तुम्‍हारी तरफ़
मैं निहारती भी नहीं
ज़बान आतुर है फिर कुछ कहने को
कंठ मौन के साये में
शब्‍दों को चुनता है मन ही मन
फिर नि:शब्‍द ही रहकर
कह उठता है
तुम कहने के पहले सोचती क्‍यूँ नहीं !!
....
.....तुम में संयम नहीं होता तो
भला कैसे रहती
तुम दंत पंक्तियों के मध्‍य
यूँ सुरक्षित,
तुमसे मुझे इतना ही कहना है
मेरा सर्वस्‍व तुम से है
और मेरी ये चाहत तुम्‍हारे लिये है
तुम सहज़ रहो,
कुछ भी कहने से पहले
अपनी सोच को दिशा दो तब कहो
विवेक के सानिध्‍य में अानंद है
आनंद में सुख है
मैं नहीं चाहती कि तुम इस सुख से वंचित रहो
मेरे रहते तुम्‍हें कोई ये कहे
तुम कहने के पहले कुछ सोचती क्‍यूँ नहीं :)

शनिवार, 2 नवंबर 2013

दिया समर्पण का रखना !!!












निश्‍चय की ड्योढ़ी पर दिया समर्पण का रखना,
जब भी मन आंशकित हो तुम धैर्य हमेशा रखना ।

पूजन, वंदन आवाहन् होगा गौधूलि की बेला में जब,
अपने और पराये की खातिर बस नेक भावना रखना ।

उत्‍सव की इस मंगल बेला में दीप से दीप जलाना जब,
मन मंदिर में एक दिया संकल्‍प का भी जलाकर रखना ।

लम्‍हा-लम्‍हा उत्‍साहित है बच्‍चे पंच पर्व पर आनंदित हैं
परम्‍पराओं के ज्ञान का दीप जलाकर उनके मन भी रखना ।

दिया जब भी विश्‍वास का जलता है हवायें तेज चलती हैं,
घबराहट की सांसों को  इतनी बात सदा बताकर रखना ।

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....