सोमवार, 20 मई 2019

तुम इच्छाशक्ति हो !!

मेरे पास सपने थे
तुमने उम्मीद बँधाई
मेरे पास हौसला था
तुमने पंख लगाये
मेरे पास
कुछ कर गुज़रने की
च़ाहत थी
तुमने मुझे
बुलंदी पे पहुँचाया !
....
मैने तुम्हें
आस-पास अपने
कभी देखा नहीं
पर हमेशा साथ पाया
माँ कहती है
तुम इच्छा शक्ति हो
जिसे जो चाहिये होता है
उसे वो मिल जाता है
तुम्हारे साथ होने से !!!
....




शुक्रवार, 10 मई 2019

माँ, तुलसी और गुलमोहर ...

माँ कहती थी
आँगन के एक कोने में तुलसी
और दूसरे में गुलमोहर हो
तो मन से बसंत कभी नहीं जाता
तपती धूप में भी
खिलखिलाता गुलमोहर जैसे
कह उठता हो
कुछ पल गुजारो तो सही
मेरे सानिध्य में
मन का कोना-कोना
मेरी सुर्ख पत्तियों के जैसा
खुशनुमा हो जाएगा!

नहीं है इस बड़े महानगर में
गुलमोहर का पेड़
मेरे आस-पास
पर कुछ यादें आज भी हैं
इसके इर्द-गिर्द
बचपन की, माँ की,
और इसकी झरतीं सुर्ख पत्तियों की
मेरी यादों में गुलमोहर
हमेशा मेरे साथ ही रहेगा
मेरे पीहर की तरह
अपनेपन की छाँव लिये !!
..

शनिवार, 4 मई 2019

माँ कवच की तरह !!!


मैं सोचती हूँ माँ कवच की तरह
मेरे साथ क्‍यूँ चलती है,
वजहें बहुत सारी हैं
बहुत स्‍पष्‍ट तरीका होता है उनका,
हर बात को कहने का
अपनी बात को स्‍पष्‍ट करने में
कभी क्रोध में भी होती हैं जब कभी
तो सामने वाले के सम्‍मान का
पूरा ध्‍यान रहता है उन्‍हें, उनके इन सदगुणों ने
मेरे कई रास्‍तों के अंधकार को हर लिया
...
माँ के नाम का कवच
मुश्किल पलों में हौसला होता है  तो
निराशा के पलों में उम्‍मीद भी जो
हार के पलों में बन जाता है जीत भी
सम्‍भावनाओं की उँगली तो
विश्‍वास का आँचल भी
जब दूर हो माँ से तो उनके
शब्‍दों की विरासत मेरे नाम
यूँ भी होती है
...
तुम और तुम्‍हारी निष्‍ठा
मेरे लिये सम्‍मान है
पर तुम्‍हें इन सबसे पार पाना होगा
मैं तुम्‍हारी हूँ
तुम्‍हें मुझसे कोई छीनेगा नहीं
ना कोई बीच में आएगा
जिन्‍दगी को जीना सीखो
मीठे बोल बोलो
जहां भी रहो पूरी तन्‍मयता से
जो भी करो दिल से
जो रिश्‍ता तुम्‍हें मान दे उसे तुम
बस सम्‍मान दो !!!!


गुरुवार, 2 मई 2019

मैं तृष्णा !!


मैं संग्रहित करता रहा
जीवन पर्यन्त
द्रव्य रिश्ते नाते
तेरे मेरे
सम्बन्ध अनगिनत
नहीं एकत्रित करने का
ध्यान गया
परहित,श्रद्धा, भक्ति
विनम्रता, आस्था, करुणा
में से कुछ एक भी
जो साथ रहना था
उसे छोड़ दिया
जो यही छूटना था
उसकी पोटली में
लगाता रहा गाँठ
कुछ रह ना जाये बाकी !!!
...
मैं तृष्णा की रौ में
जब भरता अँजुरी भर रेत
कंठ सिसक उठता
प्यासे नयनों में विरक्तता
बस एक आह् लिये
मन ही मन
दबाता रहता
उठते हुए ग़ुबार को !!!

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....