शनिवार, 28 सितंबर 2013

सम्‍बंधों का बाईस्‍कोप !!!

प्रेम सब कुछ छोड़ देता है
पर भरोसा करना नहीं छोड़ता
जिस दिन वह भरोसा करना छोड़ देगा
यकीं मानो
उसे कोई प्रेम नहीं कहेगा !!!
....
टटोल कर देखो कभी रिश्‍तों में प्रेम
बिना ठहरे पल-पल का हिसाब
करती यादों के साथ
अपने सम्‍बंधों का
बाईस्‍कोप तैयार करता मिलेगा मन तुम्‍हें
जो वक्‍़त-बेवक्‍़त एक अदद तस्‍वीर
बड़ी ही तन्‍मयता से चिपका लेता था !
....
ना कोई आवाज लगाता
कि तुम पलटकर देखो ना ही तुमसे दूर जाता,
बसकर रह जाता रूह में सदा के लिए
खामोशियों में भी धड़कन का गति में रहना
दिखाता है प्रेम के रंग
कोई इन्‍द्रधनुष जब बनता है
सारे रंग मन के संगी हो जाते हैं !!
......
मन की मुंडेर पर जब भी
प्रेम आकर चहका है
हर बुरे विचार को
बड़े स्‍नेह से चुगता चला गया
इसकी चहचहाहट के स्‍वर
आत्‍मा में उतरते चले जब
भरोसे की एक थपकी
यकीन की पगडंडियों पर
मेरे साथ-साथ चलती रही !!!

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

माँ का तर्जुबा !!!












माँ का तर्जुबा
रह-रहकर मेरी आँखों में झाँकता रहा,
मेरे चेहरे की उदासियों को पढ़ता
फिक्र की करवटें बदलता कभी,
फिर सवालों की बौछार भी करता
पर मेरी खामोशियों का वाईपर,
जाने कब उन्‍हें एक सिरे से
साफ कर देता
एक मुस्‍कान :) ही तो चाहती थी माँ
मैं ले आती बनावटी हँसी
खिलखिलाकर हँसती
माँ बुझे मन से कहती
चल जाने दे मैं तुझसे बात नहीं करती
गलबहियाँ डाल मैं
डालती सब्र की चादर भी
उनकी पलकों पर
सीखने दो मुझे भी
उलझनों के पार जाकर कैसा लगता है
समझने दो न
तुम्‍हारी फिक्र है न मेरे साथ
यकीन मानो वो दुआ का काम करेगी  !
....
कुछ सोच माँ
निर्णय की स्थिति में आती
मन की कसमसाहट पे
थोड़ा अंकुश लगाती
मेरी नादानियों पर
गौर करना भी सिखलाती
तो कोशिशों को जीतने का फ़न भी बताती
मेरी हर मुश्किल पे
हौसले की मुहर जब  लगाती
यकीं मानो उन पलों में
मैं हारकर भी जीत जाती !!!

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

उम्‍मीदों की मुंडेर पे ...

उम्‍मीदों की मुंडेर पे
वक्‍़त विश्‍वास बन कर जब भी उतरा
जिंदगी परछाईं बन उसी की हो गई
सपनों को सौंप उसकी झोली में
काँधे पे उसके
अपनी हथेलियां रख चलती रही
बिना थके अनवरत्
जिंदगी और वक्‍़त
दोनो एक दूसरे की परछाईं है ना
चाहे कैसी भी परिस्थिति हो
जिंदगी वक्‍़त के साये में
भागती रहती है
कभी लगा लेती है जब ऊँची छलांग
तो चिंहुक कर देखती है वक्‍़त को
ये मौका उसे मिला
वक्‍़त भी सलाम कर उठता है ऐसे में
इन जज्‍़बों को जो उसके साथ
कदम से कदम मिला कर
कदमताल करते हैं !

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....