सोमवार, 25 जनवरी 2016

सारे जहाँ से अच्‍छा !!!








गणतंत्र की सुबह
उत्‍सव का उल्‍लास लिये
बचपन की हथेली में
कुछ गुलाब हैं
और कुछ पंखुडिया भी
नन्‍हें कदमों में
साधक का भाव है
जयहिन्‍द का स्‍वर
..
मैं ढूँढ़ती हूँ
खुद को
इन नन्‍हें पदचापों में
जो कुहासे से
लिपटी भोर में
उत्‍सुक हैं
तिरंगे के फहराये जाने को
गुलाब की कुछ
पंखुडि़या अर्पित कर
जन मन गण जय हे
गाये जाने को
..
ये दिवस
हमेशा एक उत्‍साह
एक उर्जा लिये
मेरे मन पे
दस्‍तक देता था
देता रहेगा
गणतंत्र दिवस की
पूर्व संध्‍या को ही
सुबह की तमाम
होने वाली
गतिविधियों को
चलचित्र की भांति
पलकों पे संजोये
भारत की शान में
गुनगुना उठता था
सारे जहाँ से अच्‍छा
हिन्‍दोस्‍ता हमारा ...
!! जय हिन्‍द !!

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

जाने कहाँ ?

गुम जाने की उसकी बुरी आदत थी,
या फिर 
मेरे रखने का सलीका ही सही न था,
चश्‍मा दूर का
अक्‍सर पास की चीजें पढ़ते वक्‍़त
नज़र से हटा देती थी
एक पल की देरी बिना वह
हो जाता था मेरी नज़रों से ओझल
कितनी बार नाम लेती उसका
जाने कहाँ गया ?
दिखता भी नहीं था वह दूर जो हो जाता था
उसको ढूँढते वक्‍त
बरबस एक ख्‍याल आता था
काश मोबाइल की तरह इसकी भी कोई
प्‍यारी सी रिंगटोन होती J
तो यूँ ढूँढने की ज़हमत तो नहीं होती !
....
इस मुई चाबी को भी
हथेलियों में दबे रहने की जैसे आदत हो,
पर कब तक ??
कभी तो उसे इधर-उधर रखना ही होता न
मन ही मन बल खाती ये भी
नज़र बची नहीं कि खामोशी की
ऐसी चादर तानती
सारे तालों की हो जाती बोलती बंद
और मच जाती सारे घर में खलबली
मची हड़बड़ाहट के बीच
एक कोफ़्त भी होती
काश इसे टांग दिया होता किसी कीले पर
मेरी ही आदत खराब है या फिर
इसे ही चुप्‍पी साधने में मज़ा आता है!!!!



रविवार, 4 अक्तूबर 2015

तर्पण की हर बूँद ....

पापा हथेली में जल लेकर
आपका ध्‍यान करती हूँ
तर्पण की हर बूँद का
मैं मान करती हूँ
कुछ बूँदे पलकों पे आकर
ठहर जाती हैं जब
तो आपका कहा
कानों में गूँजता है
बहादुर बच्‍चों की आँखों में
आँसू नहीं होते
उनकी आँखों में तो
बस चमक होती है
जीत की, उम्‍मीद की,
विश्‍वास की
एक हौसला होता है
उनके चेहरे पे
और मैं मुस्‍करा पड़ती थी!
...
पलकों पे ठहरी बूँदे
जाने-अंजाने
कितना कुछ कह गईं
आपका दिया मेरे पास
हौसला भी है
उम्‍मीद भी है और विश्‍वास भी
पर आपकी कमी
कौन पूरी कर सकता है
तो इस तर्पण की हथेली में
गंगा जल के साथ
छलका है जो अश्रु जल नयनों का
वो स्‍नेह है
आपकी अनमोल यादों का
जिसे मैने अपने सिर-माथे लिया है
और आपको अर्पित ही नहीं
समर्पित भी किया है अंजुरी का जल
बूँद-बूँद स्‍नेह मिश्रित
पूरी निष्‍ठा से इस पितृपक्ष में!!!

रविवार, 27 सितंबर 2015

प्रेम में ईश्‍वर !!!

प्रेम के रिश्‍ते
निभते जाते हैं
इन्‍हें निभाना नहीं पड़ता
कोई रहस्‍य
कोई पर्दा
नहीं ढक पाता है
इसके होने के
वज़ूद को !
...
ये जब होता है
तो पूरी क़ायनात
एक हो जाती है
इसकी तरफ़दारी में
सारी नफ़रतों को
पिघलना पड़ता है
प्रेम में
ईश्‍वर का साक्षात्‍कार
होना तय है !!
...
जो नहीं मानता प्रेम को
उससे तुम
घृणा मत करो
ये सोचो
जाने कौन सा
गुऩाह किया होगा इसने
जो रब़ ने
इसे ये नेम़त नहीं बख्‍़शी !!!

...



सोमवार, 14 सितंबर 2015

हर दिन इसका हो !!!!

भाषा हिन्‍द की
माँ बोली वो
लगे एक पहचान सी
इसका अपनापन
मन में उतरे
जैसे माँ की सहजता !
...
हिन्‍दी गर्व की
वो बिन्‍दी है
जिसके लग जाने से
मन मस्तिष्‍क को
मान के साथ
सम्‍मान भी देता है !!
...
आओ इसको
दिवस की विशेषताओं से परे
बसा लें ऐसे संकल्पित हो
पखवाड़ा ही नहीं
हर दिन इसका हो !!!!



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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....