बुधवार, 23 अप्रैल 2014

दूर करते हैं उदासियां !!!!


मेरी डायरी में
कुछ पन्‍ने हैं उदासियों के
सच कहूँ
तुम और तुम्‍हारा जि़क्र
ज़हां नहीं होता
वहाँ उदासियां
बिन बुलाये आ जाती हैं
इन उदासियों को
जब भी हटाना होता है
ज़रूरत होती है
मुझे तुम्‍हारे साथ की !
...
तुम जब भी साझा करते हो
एक मुस्‍कान :)
ये उदास पन्‍ने
मुस्‍कराने लगते हैं :) :) :)
तो फिर आओ साझा करते हैं
एक मुस्‍कान
और दूर करते हैं
उदासियां इन पन्‍नों की !!!!
....


शुक्रवार, 14 मार्च 2014

कुछ रंग उम्‍मीद की हथेलियों पर !!!!!














रंग आतिशी हो गए हैं सारे
गुलाल भंग के नशे में है
तभी तो हवाओं में
उड़ रहा है
चाहता है होली के दिन
ढोलक की थाप पर
हर चेहरा गुलाबी हो जाए !
..... 
सूखे हुये रंग
भीगना चाहते हैं
भीगते-भीगते
वो रंगना चाहते हैं
आत्‍मीयता का लिबास
होली की उमंग में !!
....
उमंग के इन्‍हीं लम्‍हों में
रंगों की जबान बस
स्‍नेह की बोली जानते हुए
कहाँ परहेज़ करती है
अपने और पराये का
तभी तो रंग जाता
तन के साथ मन !!!
...
कुछ रंग
उम्‍मीद की हथेलियों पर
घुल कर छाप छोड़ देते है
इन पलों में ताउम्र के लिए
फिर नहीं चढ़ता
कोई रंग दूजा
मन की दीवारों पर !!!!
.....

शनिवार, 8 मार्च 2014

कैसे डिग सकता है मेरा ‘मैं’ ????


‘मैं’ एक स्‍तंभ भावनाओं का
जिसमें भरा है
कूट-कूट कर जीवन का अनुभव
जर्रे- जर्रे में श्रम का पसीना
अविचल औ’ अडिग रहा
हर परीस्थिति में मेरा विश्‍वास
फिर भी परखता कोई
मेरे ही ‘मैं’ को कसौटियों पर जब
लगता  छल हो रहा है
मेरे ही ‘मैं’ के साथ !
....
तपस्‍वी नहीं था कोई मेरा ‘मैं’
पर फिर भी बुनियाद था
अपने ही आपका ‘मैं’
एक मान का दिया ‘मैं’
सम्‍मान की बाती संग
हर बार तम से लड़ता रहा
परछाईं मेरे ‘मैं’ की बनता जब उजाला
मिट जाता अँधकार जीवन का सारा !!
 .....
एक चट्टान था मेरा ‘मैं’
जिसको टुकड़ों में तब्‍दील करना
मुश्किल नहीं तो आसान भी नहीं था
हथेलियों में उभरेंगे छाले
ये सोचकर वार करना
मैं तूफानों के वार में था अडिग
जल की धार से पाया मेरे मैं ने संबल
सोचकर तुम बतलाओ

कैसे डिग सकता है मेरा ‘मैं’ ????

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

कोरे पन्‍नों पर !!!!!!!!!!!


मन में विचारों की आँधी चली,
लेखक का जीवन खंगाला गया
धर्म की पड़ताल हुई
गोत्र पर भी चर्चा हुई
तो पाया बस इतना ही कि
सारे लेखकों का
गोत्र एक ही होता है
धर्म उनका सदा लेखन होता है  !!
.....
मित्रता उसकी कलम से होती है
जो अपनी नोक से
कभी वार करती है तो
कभी बस फैसला आर-पार करती है
हर युग में लेखक
अपने धर्म का बड़ी निष्‍ठा से
पालन करता रहा
सच को सच, झूठ को झूठ, लिखता रहा
जाने कितनों का मार्गदर्शक बन
मन का मन से वो
संवाद करता रहा !!
.....
कोरे पन्‍नों पर होती कभी
अंतस की पीड़ा
कभी जीवन की छटपटाहट तो
कभी बस वो हो जाता साधक
जागता रातों को
शब्‍दों का आवाह्न करता
पर धर्म से अपने कभी न डिगता
किसी पात्र की रचना करता है जब कोई लेखक
बिल्‍कुल उस जैसा हो जाता है
ना नर होता है ना नारी
वो तो होता है बस लेखक
जो विचारों की अग्नि में देता है आहुति
अपने दायित्‍वों की
लेखनी को अपनी पावन करता है
जब भी किसी की पीड़ा को

शब्‍दों से अपने वो जीवनदान देता है !!!

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

ख्‍वाहिशें झाँकती हैं बन के ख्‍व़ाब !!!!!

अंज़ाम की परवाह
बिना किये जब
जिंदगी के साथ चलता है कोई 
कदम से कदम मिलाकर तो 
जीने का सलीक़ा आ जाता है
...
जिंदगी चलती है
मुस्‍कराहटों के साथ जब भी
तो वक्‍़त की दौड़ तेज़ हो जाती है
हसरतें मचलती हैं दबे पाँव
ख्‍वाहिशें झाँकती हैं बन के ख्‍व़ाब
बँद पलकों में अक्‍़सर
तो फि़र सोचना कैसा ?
क्‍या होगा, क्‍यूँकर होगा ???
....
खिलखिलाहट को आज
बन के हँसी गूंज जाने दो
खामोशी के हर कोने में
उम्‍मीदों को दौड़ने दो
पूरे मनोयोग से
एक नई आशा के साथ
जहाँ ख्‍वाबों ने सीखा हो
सिर्फ साकार होना
आकार उनका कुछ भी हो
इस बात का हर फ़र्क मिटाकर !!!!!

मेरे बारे में

मेरा फोटो
मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....