बुधवार, 10 सितंबर 2014

फल्‍गु के तट पर !!!!









फल्‍गु के तट पर
पिण्‍डदान के व़क्‍त पापा
बंद पलकों में आपके सा‍थ
माँ का अक्‍स लिये
तर्पण की हथेलियों में
श्रद्धा के झिलमिलाते अश्‍कों के मध्‍य
मन हर बार
जाने-अंजाने अपराधों की
क्षमायाचना के साथ
पितरों का तर्पण करते हुये
नतमस्‍तक रहा !
...
पिण्‍डदान करते हुये
पापा आपके साथ
दादा का परदादा का
स्‍मरण तो किया ही
माँ के साथ
नानी और परनानी को
स्‍मरण करने पे
श्रद्धा के साथ गर्व भी हुआ
ये 'गया' धाम निश्चित‍ ही 
पूर्वजों के अतृप्‍त मन को
तृप्‍त करता होगा !!
...   
रिश्‍तों की एक नदी
बहती है यहाँ अदृश्‍य होकर
जिसे अंजुरि में भरते ही
तृप्‍त हो जाते है
कुछ रिश्‍ते सदा-सदा के लिये !!!!
....


बुधवार, 3 सितंबर 2014

स्‍वाद इस 'मैं' का !!!!

मैं हर पल साथ रहता है
जीवन के सफ़र में
उसकी जब़ान को
पता होता है
स्‍वाद इस 'मैं' का
जहाँ सब साथ छोड़ देते हैं
वहाँ भी ये गीत
गुनगुना लेता है खुशियों के !
.... 
मैं चलता रहता है
अपनी धुन में मस्‍त मगन
मुश्किल रास्‍तों पर भी
अल्‍हड़ता के साथ
रिश्‍तों के बनावटीपन से परे
अपने स्‍व के साथ
जीता है बड़ी बेबाकी से
सीखते हुए नित नया
सबक जिंदगी का जिंदगी से !!
...
‘मैं’ का रहस्‍य हमेशा
क़ायम रहता है
‘मैं’ के साये में
तपती धूप में कई बार
देखा है मैंने
इसे खुद का ही
आसमान बनते हुये !!!

रविवार, 24 अगस्त 2014

कुछ रिश्‍ते !!!!


कुछ रिश्‍ते
सच्‍चे होते हैं इतने कि
झूठ और फ़रेब
खुद छलनी हो जाते हैं
इनके क़रीब आकर !
  ....
कुछ रिश्‍ते
होते हैं नदी से
बहते जाने में ही
सुकू़न पाते हैं
कहाँ पथरीले रास्‍ते हैं
कहाँ समतल
उन्‍हें फ़र्क नहीं पड़ता !!
   ...
कुछ रिश्‍ते
जब नदी हो जाते हैं
तो अपनापन
समेट के ह्रदय में
निर्मलता का गुण
अपना लेते हैं जैसे माँ
या गंगा मइया !!!!


शनिवार, 16 अगस्त 2014

खामोशी बात करती है!!!!

शोर में दबा सन्‍नाटा
कसमसा कर बोला
अपनी मैं पर जब आऊँगा
तुम सब होगे मेरी प़नाह में
बोलती सबकी बंद होगी
तब मैं और सिर्फ मेरी ख़ामोशी बोलेगी !
...
खामोशी के साये में
मन ने जाने कितने सबक लिए
कितने संकल्‍पों की सीढि़याँ चढ़ी
कितनी उम्‍मीदों के
टूटने का रंज मनाया
बिखरती जिंदगी को
संघर्ष के रास्‍तों का आईना दिखाया !!
...
सवालों के कटघरे में
जिंदगी ने जब भी पक्षपात किया
खून के रिश्‍तों की दुहाई दी
घुटन में भी लबों पे
सजाई मुस्‍कराहट
वो सोचती
मैं विचलित क्‍यूँ हूँ
होती हुई हर बात निश्चित है
मेरा भविष्‍य
मेरी हथेली की लक़ीरों में क़ैद है
मेरे मस्‍तक पर पहले से ही
विधाता ने लिख दिया था लेख
फिर भी मैं भ्रमज़ाल में फंसकर
अपने-पराये के चक्रव्‍यूह में
बढ़ाये जा रही हूँ क़दम
ये सोच के बच के निकल जाऊँगी
पर कहाँ संभव था !!!
....
जीवन को पाकर
मौत के तिलिस्‍सम से बच पाना
किसी भी रास्‍ते से चलो
एक न एक दिन वो तुम्‍हें
वहाँ पहुँचा ही देगा
जीवन का सबसे बड़ा सत्‍य मृत्‍यु
अपनी चौखट पर ले आता है
एक दिन सबको चाहते न चाहते हुए
तब होता है सन्‍नाटा
जहाँ खामोशी बात करती है
जिंदगी सिर्फ विलाप करती है !!!!




बुधवार, 13 अगस्त 2014

एक अवसर आपके लिए ......

पुरस्‍कार की गरिमा देखनी हो तो पाने वाले की आँखों में देखो, जो आँखों की चमक बयाँ करती है दिल की धड़कनें उछल-उछल कर इस खुशी को अपनों से साझा करने के लिए उत्‍साहित होती हैं ... लेकिन आप पुरस्‍कृत तभी हो सकते हैं जब आप अपनी रचनाओं को इस मंच तक भेजने का एक प्रयास करेंगे, कई बार आप ऐसा कुछ चाहते हैं परन्‍तु अवसर नहीं मिलता, अवसर मिलता है तो तारीख निकल चुकी होती है... लेकिन इस बार ना तारीख निकली है ना अवसर आपके हाथों से फिसला है .... जी हाँ मैं जिक्र कर रही हूँ सरस्विता पुरस्‍कार का वरिष्‍ठ कवयित्री सरस्‍वती प्रसाद की साहित्यिक स्‍मृति में उनकी पुत्री श्रीमती रश्मि प्रभा के सौजन्‍य से ‘’हिन्‍द युग्‍म स‍रस्विता सम्‍मान’’ की शुरूआत कर रहा है और यह शुभारम्‍भ् उनकी पहली पुण्‍यतिथि 19 सितम्‍बर 2014 से उनके साहित्यिक संग्रह के साथ आयोजित होगा।

प्रत्‍येक विधा से चयनित रचनाकारों को सरस्विता पुरस्‍कार, एक प्रमाणपत्र एवं एक थी तरू पुस्‍तक दी जाएगी, साथ ही तीनों विजेता को 2500/- की राशि दी जाएगी।
19 सितम्‍बर, 2014 को दिल्‍ली के मयूर विहार में यह कार्यक्रम आयोजित होना है.... शेष जानकारी आप संलग्‍न चित्र से प्राप्‍त कर सकते हैं .... आप अपनी रचनाएँ शीघ्र भेजें ....इस मेल आईडी पर saraswita2808@gmail.com  रचनाएँ पीडीएफ फाइल में भेजें, समय कम हैं ... इस बार अत: देर न करें .... तो 15 अगस्‍त के पहले ..... झंडा ऊँचा रहे हमारा, विजयी विश्‍व तिरंगा प्‍यारा .... कहते हुये लहरा दे अपने नाम का झंडा :)

मेरे बारे में

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....