शनिवार, 16 जुलाई 2016

अर्थ बोलते हैं जब !



शब्‍द प्रेरणा होते हैं
जब मन स्‍वीकारता है उन्‍हें
तो अर्थ बोलते हैं उनके
आरम्‍भ होती हैं पंक्तियाँ
जन्‍म लेती है कविता
कितनी बार
इन शब्‍द और अर्थों के साये में !
...
प्रेरक विचार
जन्‍म लेने से पहले
कितना मथते हैं मन को
शब्‍दों का कोलाहल
एकदम शांत चित्‍त हो
ठिठककर सुनता है
अर्थ बोलते हैं जब
इन शब्‍दों के
विचार एकाएक
हो जाते हैं बलशाली
निश्‍चय की आखि़री सीढ़ी
वो चढ़ चुके होते है
जहाँ उनकी अडिगता को
डिगा पाना मन के लिए भी
संभव नहीं हो पाता !!!

शनिवार, 7 मई 2016

माँ के लिये !


माँ ने नहीं पढ़े होते
नियम क़ायदे
ना ही ली होती है डिग्री
कोई कानून की
फिर भी हर लम्‍हा सज़ग रहती है
अपने बच्‍चों के अधिकारों के प्रति
लड़ती है जरूरत पड़ने पर
बिना किसी हथियार के
करती है बचाव सदा
खुद वार सहकर भी !
....
माँ के लिये एक समान होती हैं
उसकी सभी संताने
किसी एक से कम
किसी एक से ज्‍यादा
कभी भी प्‍यार नहीं कर पाती वह
ये न्‍याय वो कोई तुला से नहीं
बल्कि करती है दिल से
ममता की परख
बच्‍चे कई बार करते हैं !!
...
कसौटियों पर रख ये भी कहते हैं
हमें कम तुम्‍हें ज्‍यादा चाहती है माँ
कहकर आपस में जब झगड़ते हैं
तो उन झगड़ों को वो अक्‍़सर
एक सहज सी मुस्‍कान से मिटा देती है
और सब लग जाते हैं गले
ऐसा न्‍याय सिर्फ माँ ही कर सकती है !!!

...


मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

जिंदगी ...

जिंदगी 
मैं सोचती हूँ 
जब भी तुम्हें 
तो फिर 
जाने क्यूँ सब कुछ 
भूल जाता है smile emoticon
....
सच कहो
तुम कोई याद हो
या फिर रिश्ता
जन्मों का
जो निभाती हो
नाता ताजिंदगी
जिंदगी के साथ !

...
कोई रिश्ता 
मन वचन के साथ-साथ 
हो जाता है‍ जिंदगी भी 
अपने आप से
...
ये मन का आप
न जाने कितनी
कसौटियों का
लेखा-जोखा करता है
और निभाता है
रिश्ता हर एक से
परख मन की
आईना जिंदगी का
...

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

बासन्‍ती पर्व कहलाऊंगा !!!!

बसंत पंचमी को
माँ सरस्‍वती का वंदन
अभिनन्‍दन करते बच्‍चे आज भी
विद्या के मन्दिरों में
पीली सरसों फूली
कोयल कूके अमवा की डाली
पूछती हाल बसंत का
तभी कुनमुनाता नवकोंपल कहता
कहाँ है बसंत की मनोहारी छटा
वो उत्‍सव वो मेले
सब देखो हो गये हैं कितने अकेले
मैं भी विरल सा हो गया हूँ
उसकी बातें सुनकर
डाली भी करूण स्‍वर में बोली
मुझको भी ये सूनापन
बिल्‍कुल नहीं भाता!
...
विचलित हो बसंत कहता
मैं तो हर बरस आता हूँ
तुम सबको लुभाने
पर मेरे ठहरने को अब
कोई ठौर नहीं
उत्‍सव के एक दिन की तरह
मैं भी पंचमी तिथि को
हर बरस आऊंगा
तुम सबके संग माता सरस्‍वती के
चरणों में शीष नवाकर
बासन्‍ती पर्व कहलाऊंगा !!!!
...


सोमवार, 25 जनवरी 2016

सारे जहाँ से अच्‍छा !!!








गणतंत्र की सुबह
उत्‍सव का उल्‍लास लिये
बचपन की हथेली में
कुछ गुलाब हैं
और कुछ पंखुडिया भी
नन्‍हें कदमों में
साधक का भाव है
जयहिन्‍द का स्‍वर
..
मैं ढूँढ़ती हूँ
खुद को
इन नन्‍हें पदचापों में
जो कुहासे से
लिपटी भोर में
उत्‍सुक हैं
तिरंगे के फहराये जाने को
गुलाब की कुछ
पंखुडि़या अर्पित कर
जन मन गण जय हे
गाये जाने को
..
ये दिवस
हमेशा एक उत्‍साह
एक उर्जा लिये
मेरे मन पे
दस्‍तक देता था
देता रहेगा
गणतंत्र दिवस की
पूर्व संध्‍या को ही
सुबह की तमाम
होने वाली
गतिविधियों को
चलचित्र की भांति
पलकों पे संजोये
भारत की शान में
गुनगुना उठता था
सारे जहाँ से अच्‍छा
हिन्‍दोस्‍ता हमारा ...
!! जय हिन्‍द !!

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....