शनिवार, 9 मई 2015

सिर्फ माँ ही !!!









माँ ने नहीं पढ़े होते
नियम क़ायदे
ना ही ली होती है डिग्री
कोई कानून की
फिर भी हर लम्‍हा सज़ग रहती है
अपने बच्‍चों के अधिकारों के प्रति
लड़ती है जरूरत पड़ने पर
बिना किसी हथियार के
करती है बचाव सदा
खुद वार सहकर भी !
....
माँ के लिये एक समान होती हैं
उसकी सभी संताने
किसी एक से कम
किसी एक से ज्‍यादा
कभी भी प्‍यार नहीं कर पाती वह
ये न्‍याय वो कोई तुला से नहीं
बल्कि करती है दिल से
ममता की परख
बच्‍चे कई बार करते हैं !!
...
कसौटियों पर रख ये भी कहते हैं
हमें कम तुम्‍हें ज्‍यादा चाहती है माँ
कहकर आपस में जब झगड़ते हैं
तो उन झगड़ों को वो अक्‍़सर
एक सहज सी मुस्‍कान से मिटा देती है
और सब लग जाते हैं गले
ऐसा न्‍याय सिर्फ माँ ही कर सकती है !!!

...

गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

मंजिलों के रास्‍ते!!!

कर्तव्य की कोई भी राह लो
उस पर चलते जाने की शपथ
तुम्‍हें स्‍वयं लेनी होगी
राहें सुनसान भी होंगी
कोशिशें नाक़ाम भी होंगी
पर मंजिलें कई बार
करती हैं प्रतीक्षा
ऐसे राही की
जो सिर्फ उस तक
पहुँचने के लिए
घर से चला था.
.....
मंजिलों तक जाने के लिए
हमेशा अकेले ही
तय करने होते हैं रास्‍तें
अकेले ही चलना होता है
और पूछना होता है
पता भी मुश्किलों से
मुझे कितनी दूर 
यूँ ही तुम्‍हारे साथ
तय करने हैं
मंजिलों के रास्‍ते!!!

....

रविवार, 29 मार्च 2015

किसी और की खुशी में!!!!

खुशियों को जब भी देखा मैने
नये परिधान में
सोचा ज़रूर ये आज
किसी की हो जाने के लिये
तैयार हुई हैं!
...
बस उनके आग़त का
स्‍वागत करेगा जो
ये वहीं ठहर जाएंगी
पर कहाँ
इन्‍हें तो पल भर बाद
फिर आगे बढ़ जाना था
हिम्‍म़त कर पूछा
इतनी जल्‍दी चल दीं
थोड़ी देर तो और मेरा
साथ निभाया होता!!
....
वो मुस्‍करा के बोल उठीं
हम तो रहती हैं
यूँ ही गतिमान
नहीं है निश्चित
हमारा कोई परिधान
जब चाहा
एक लम्‍हा लिया रब से
किसी को सौंप दिया
फि़र किसी और के पास चले
हम लम्‍हों के संग
साथ तो तुम्‍हें निभाना होता है
किसी और की खुशी में
मुस्‍काराना होता है !!!!



बुधवार, 4 मार्च 2015

होली मुबारक!

फागुन मुस्‍काराता है
जब गुलाल
उँगली और अॅंगूठे को छोड़
हथेली में जाने को मचलता है
रंगीला सावन मनभावन हो
हर चेहरे को रंगता है
रंगों की फुहार में
भीग जाती है अनबन भी
तो बोल उठती है
होली मुबारक!
...
रंगों को भी
प्‍यास है पानी की
अपनों को भिगोने की
कुछ रिश्‍तों को
रंग देना चाहते हैं
स्‍नेह, प्‍यार और सम्‍मान से!!
....
एक चुटकी अबीर
माथे पे लगकर
सम्‍मान हो जाता है
गाल पे लगता है तो
स्‍नेह का फागुन
भीगकर प्‍यार हो जाता है
रंगों का ये त्‍योहार
घोलता है मिठास
सम्‍बंधों में जब-जब
तो जीवन का पल-पल
बस उल्‍लास हो जाता है!!!

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

आईना मन का !!!!


आईना मन का
संवारे घड़ी-घड़ी रूप अपना
करे श्रृंगार जब प्रेम का
तो खुद ही ये इतराये
उदासी की सूरत में
पलकें भी न झपकाये
कोई इसको
कितना भी समझाये!
....
पगला है मन कहते हैं सब
पल में खुश पल में नाखुश
इसकी खुशियों का हिसाब
रखते हुए जिंदगी
कई बार चूक कर जाती है
रिश्‍तों के गणित में
शून्‍य आता है जब परिणाम
तो नये सिरे से करती है
ज़मा और घटे का हिसाब
पर कहाँ मिलता है सू्त्र
जो मन को हमेशा
सौ में सौ दे सके!!
...
मन राजा हो तो
कुछ न होकर भी
बहुत कुछ होता है पास
संतोष का धन
हमेशा खजाने में
होना ज़रूरी है
फिर ये अमीरी 
ताजिंदगी साथ रहती है !!!!

मेरे बारे में

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....