रविवार, 25 जनवरी 2015

तिरंगे का उत्‍सव !!


तिरंगे का उत्‍सव मनाता बचपन
फूलों की तरह मुस्‍काता बचपन ।

वीरों की गाथाओं का कर स्‍मरण,
शीष अपना हरदम झुकाता बचपन ।

वंदे मातरम् कह बुलंद आवाज में
तिरंगे के साये में इतराता बचपन ।

भारत माता की छवि लिये मन में,
विजय के गीत गुनगुनाता बचपन ।

नाउम्‍मीदी के हर दौर में भी सदा
बन के उम्‍मीद मुस्‍कराता बचपन ।





रविवार, 18 जनवरी 2015

कैसा ये रिश्‍ता है ....

विश्‍वास की मुट्ठी में
डर की उँगली
एक मुस्‍कान हौसले की लबों पर
सोचती हूँ
कैसा ये रिश्‍ता है
हार और जीत के पलों में
हौसले का
जो हर बार उम्‍मीद लिये
आँखों में पलता है
निराशा के रास्‍तों पर
बड़े ही जोश से
साथ-साथ चलता है!!!!

....

शनिवार, 15 नवंबर 2014

यादों के धागे !!!

 तुम्‍हारी यादों के रास्‍ते
चलते-चलते मैं जब भी
अतीत के घर पहुँचती
तुम रख देते
एक संदूक मेरे सामने
मैं तुम्‍हें महसूस करती
कुछ स्‍मृतियों की
धूल झाड़ती
कुछ को धूप दिखाती
ये सीली-सीली यादें
कितना कुछ कहती बिना कुछ कहे !
...
तुम कहा करते थे न कि
खुशियों के बीज़ बोने पड़ते हैं
दर्द की कँटीली बाडि़याँ
उग आती हैं खुद-ब-खुद
मैं हँसती थी औ’ कहती थी
तुम्‍हें तो फिलॉसफ़र होना चाहिये था
नाहक़ ही तिज़ारत में आ गये
तुम मुँह फ़ेर कहते
अब कुछ नहीं कहूँगा !!
...
सच, मैने भी तो बोये थे
कुछ हँसी और मुस्‍कराहट के पल
इन सीली यादों का साथ तो
नहीं माँगा था
पर ये खुद-ब-खुद
ले आईं थीं वक्‍़त के साथ नमीं
तुम्‍हारी बातों का अर्थ
जिंदगी के कितने क़रीब था
सच यादों के धागे बिना
गठान बाँधे भी
आजीवन साथ बंधे रहते हैं !!!


रविवार, 26 अक्तूबर 2014

'मैं' रिश्‍तों का सूत्रधार !!!!

मैं का संसार
अनोखा होता है
कभी विस्‍तृत तो
कभी शून्‍य
मैं गुरू जीवन का
इसका ज्ञान इसका मंत्र
मैं का ही रूप
जिसके भाव अनेक
मैं परम साधक
तप की साधना में
मैं हिमालय पे नहीं जाता
ना ही रमाता है धूनी
ना ही जगाता है
सुप्‍त भावनाओं को
अलख निरंजन बोल के !
....
मैं तो बस
चलता है साथ मैं के
मंजिल पर पहुँच जाने तक
मुश्किलों में साथ
निभाने के लिए
निराशा के क्षणों में
उम्‍मीद की एक किरण
हो जाने के लिए !!
...
मैं होता है
रिश्‍तों का सूत्रधार
जुड़ता कड़ी दर कड़ी
हम हो जाने के लिए
जीवन के अर्थों को देखता है
कर्तव्‍य की हथेलियों में
जितनी बार कोई
उँगली उसकी मुट्ठी में
क़ैद होती !!!

... 

बुधवार, 15 अक्तूबर 2014

तो कभी चाहत में !!!!!


प्रेम को जब भी देखती हूँ मैं
अपेक्षाओं की आँखों में
रंग सारे बारी-बारी
बिखर जाते हैं
कभी प्रेम माँगता बदले में प्रेम
तो कभी चाहत में बलिदान माँगता
मैं हैरानी के सोपानों को 
पार करते हुए
इसकी हर ऊँचाई का
क़द मापती
पर कहाँ संभव था
प्रेम का आँकलन !!
...
जब याचना से परे
प्रेम दाता बना,
टूटा, बिखरा
फिर भी मुस्कराया
खुद हँसा
लम्हों को जीना सिखाया
सोचती हूँ तो
होता है एहसास
बेमक़सद कहाँ रब ने
दिया था ये रूहानी जज्बा
सौग़ात में !!!

...

मेरे बारे में

मेरा फोटो
मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....