शनिवार, 15 नवंबर 2014

यादों के धागे !!!

 तुम्‍हारी यादों के रास्‍ते
चलते-चलते मैं जब भी
अतीत के घर पहुँचती
तुम रख देते
एक संदूक मेरे सामने
मैं तुम्‍हें महसूस करती
कुछ स्‍मृतियों की
धूल झाड़ती
कुछ को धूप दिखाती
ये सीली-सीली यादें
कितना कुछ कहती बिना कुछ कहे !
...
तुम कहा करते थे न कि
खुशियों के बीज़ बोने पड़ते हैं
दर्द की कँटीली बाडि़याँ
उग आती हैं खुद-ब-खुद
मैं हँसती थी औ’ कहती थी
तुम्‍हें तो फिलॉसफ़र होना चाहिये था
नाहक़ ही तिज़ारत में आ गये
तुम मुँह फ़ेर कहते
अब कुछ नहीं कहूँगा !!
...
सच, मैने भी तो बोये थे
कुछ हँसी और मुस्‍कराहट के पल
इन सीली यादों का साथ तो
नहीं माँगा था
पर ये खुद-ब-खुद
ले आईं थीं वक्‍़त के साथ नमीं
तुम्‍हारी बातों का अर्थ
जिंदगी के कितने क़रीब था
सच यादों के धागे बिना
गठान बाँधे भी
आजीवन साथ बंधे रहते हैं !!!


रविवार, 26 अक्टूबर 2014

'मैं' रिश्‍तों का सूत्रधार !!!!

मैं का संसार
अनोखा होता है
कभी विस्‍तृत तो
कभी शून्‍य
मैं गुरू जीवन का
इसका ज्ञान इसका मंत्र
मैं का ही रूप
जिसके भाव अनेक
मैं परम साधक
तप की साधना में
मैं हिमालय पे नहीं जाता
ना ही रमाता है धूनी
ना ही जगाता है
सुप्‍त भावनाओं को
अलख निरंजन बोल के !
....
मैं तो बस
चलता है साथ मैं के
मंजिल पर पहुँच जाने तक
मुश्किलों में साथ
निभाने के लिए
निराशा के क्षणों में
उम्‍मीद की एक किरण
हो जाने के लिए !!
...
मैं होता है
रिश्‍तों का सूत्रधार
जुड़ता कड़ी दर कड़ी
हम हो जाने के लिए
जीवन के अर्थों को देखता है
कर्तव्‍य की हथेलियों में
जितनी बार कोई
उँगली उसकी मुट्ठी में
क़ैद होती !!!

... 

बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

तो कभी चाहत में !!!!!


प्रेम को जब भी देखती हूँ मैं
अपेक्षाओं की आँखों में
रंग सारे बारी-बारी
बिखर जाते हैं
कभी प्रेम माँगता बदले में प्रेम
तो कभी चाहत में बलिदान माँगता
मैं हैरानी के सोपानों को 
पार करते हुए
इसकी हर ऊँचाई का
क़द मापती
पर कहाँ संभव था
प्रेम का आँकलन !!
...
जब याचना से परे
प्रेम दाता बना,
टूटा, बिखरा
फिर भी मुस्कराया
खुद हँसा
लम्हों को जीना सिखाया
सोचती हूँ तो
होता है एहसास
बेमक़सद कहाँ रब ने
दिया था ये रूहानी जज्बा
सौग़ात में !!!

...

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

एहसासों की खिड़कियाँ ...

बड़ी तीक्ष्‍ण होती है
स्‍मृतियों की
स्‍मरण शक्ति
समेटकर चलती हैं
पूरा लाव-लश्‍कर अपना
कहीं‍ हिचकियों से
हिला देती हैं अन्‍तर्मन को
तो कहीं खोल देती हैं
दबे पाँव एहसासों की खिड़कियाँ
जहाँ से आकर
ठंडी हवा का झौंका
कभी भिगो जाता है मन को
तो कभी पलकों को
नम कर जाता है 
...
कुछ रिश्‍तों को
कसौटियों पर
परखा नहीं जाता
इन्‍हें निभाया जाता है
बस दिल से
स्‍मृतियों को कभी
जगह नहीं देनी पड़ती
ये खुद-ब-खुद
अपनी जगह बना लेती हैं
एक बार जगह बन जाये तो
फिर रहती है अमिट
सदा के लिए

....

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

इन शब्‍दों को !!!!

शब्‍दों की चुभन से
कई बार मन
बस हैरान रह जाता है
ताकते हुये शून्‍य में सोचता है
कैसे इतने पैने हो गये हैं ये
आक्रामक हो जाना
इनका यूँ अचानक से
भाता नहीं
शब्‍दों का तीखापन
जिंदगी के स्‍वाद को
बेमज़ा सा कर जाता
एक आह निकलती
तो कभी सिसकी !
...
एक चुटकी मिठास की
जबान पे इनकी
रख देता गर कोई
तो क्‍या बिगड़ जाता
वक्‍़त का मिज़ाज सिखाता रहा
जीने का सलीका
तो कभी बचाता रहा
बदज़ुबानी से इन्‍हें
तो कभी ख़ामोश रहकर
इन्‍हें अनसुना भी किया है
जाने कितनी बार !
...
ठगना भी आता है
इन शब्‍दों को
और लुभाना भी
मोहित भी करते हैं
और चैन भी छीन लेते हैं
तुमसे वफ़ादारी की
कसमें भी खाते हैं
और सम्‍बंधों की
दुहाई भी देते हैं
बस इतना ही
ये अहसान करते हैं
कि निर्णय का अधिकार
सौंपना तुम्‍हें नहीं भूलते !!!

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मेरे बारे में

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....