सोमवार, 18 नवंबर 2013

समझाइशों की नदी !!!!!!!!!!!

मैं चाहती हूँ 
तुमसे कितना कुछ कहना 
पर तुम्हारे और मेरे बीच 
मौन की सुनामी है 
अवरूद्ध हैं सारे रास्‍ते  तुम तक पहुँच पाने के !
तुम अपने दायरे में स्तब्ध हो 
या यूँ कहूँ खामोश हो 
और मैं दायरे से बाहर 
प्रतीक्षित हूँ ख़ामोशी के टूटने की  …
 जाने कब टूटे - टूटे ना टूटे !
...
तुमसे झगड़ा तो नहीं हुआ मेरा,
कभी किसी बात को लेकर
पर फिर भी मेरा मौन लड़ा है
तुमसे जाने कितनी बार
बिना कुछ कहे भी
ये मौन कैसे झगड़ लेता है
मैं हैरान रह जाती हूँ
उसके इस व्‍यवहार पर !!
...

तुम और मैं जब भी
समझाइशों की नदी को 
साथ-साथ पार करना चाहते हैं
नदी का प्रवाह विपरीत होता है
हमारे किनारों से बेपरवाह
वह अपनी धुन में बहती जाती है 
कभी तुम्‍हारी आँख से 
मेरे हिस्‍से का मौन बन 
कभी मेरी उदासियों में 
तुम्‍हारे हिस्‍से की चुप्पियाँ बनकर !!!!!!
नदी - हम और किनारे का मौन 
जाने कब टूटे 
मैं प्रतीक्षित हूँ !!!!!!!!!

22 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आदरेया-

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  2. तुम और मैं जब भी
    समझाइशों की नदी को
    साथ-साथ पार करना चाहते हैं
    नदी का प्रवाह विपरीत होता है
    सच्ची अभिव्यक्ति
    हार्दिक शुभकामनायें

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  3. यह प्रतीक्षा एक दुविधा है..... सुंदर रचना

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  4. अक्सर उम्र बीत जाती है इसी इंतज़ार में ..और मौन ...बींधे जाने के इंतज़ार में... और विस्तार पाता जाता है

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  5. सदियाँ बीत जाती हैं मौन को मुखर होते ... कभी कभी पल की दूरी सालों नहीं मिट पाती ... इसे जल्दी ही तोड़ देना चाहिए ...

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  6. ye maun hi to nahi toota karta .............behad umda prastuti

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  7. शीर्षक ही शानदार लगा …… रचना के तो क्या कहने |

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  8. यह प्रतीक्षा भी एक दुविधा है जितनी जल्दी यह मौन टूट जाये उतना अच्छा...बहुत ही सुंदर भावाभिव्यक्ति...

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  9. प्रेम में मौन अवरोध है..ये टूट जाये तो ही अच्छा..
    कोमल भाव कि रचना...
    बेहतरीन...
    :-)

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  10. प्रतीक्षा का समाप्त होना ही बेहतर है, अंतस में उथल - पुथल मचा देती है ये ख़ामोशी की सुनामी ....

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  11. बड़े ही नाज़ुक से तार छेड़ गयी आपकी अभिव्यक्ति .......

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  12. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार१९/११/१३ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चामंच पर की जायेगी आपका वहाँ हार्दिक स्वागत है।

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  13. मौन विस्तार न पाये .....समझाइशों कि नदी को पार कर जाना ही ठीक..... बहुत सुंदर रचना

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  14. बहुत सुन्दर और भाव प्रधान रचना है

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  15. बहुत सुन्दर...
    कोमल भाव दिल को छू जाते हैं...

    सस्नेह
    अनु

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  16. मौन भी झगड़ ही लेता है ... मन के भावों को बहुत खूबसूरती से उकेरा है

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....