शुक्रवार, 17 जुलाई 2009

पहरे पे बैठी तबस्‍सुम ....

मैं हंस कर सह लूंगी तेरे दिये गम सारे,

छलक आए जो आंसू छुपा लूंगी वो सारे,

पहरे पे बैठी तबस्‍सुम कुछ इसतरह से,

कितने भी गम देकर देख नहीं हम हारे ।

हर बूंद अश्‍क की मेरे एक दिन समन्‍दर,

होगा, मुहब्‍बत का जिसमें ना होंगे किनारे ।

खेलना दिल से सितमगर संभल कर जरा,

टूट के बिखरा तो हांथ आयेंगे टुकड़े सारे ।

उड़ने का हौसला हो मन में जब तो कहां,

सोचता कोई नहीं सदा पर नही हैं हमारे

2 टिप्‍पणियां:

  1. टूट के बिखरा तो हांथ आयेंगे टुकड़े सारे ।
    bahut sundar rachana

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  2. खेलना दिल से सितमगर संभल कर जरा,
    टूट के बिखरा तो हांथ आयेंगे टुकड़े सारे ।

    -क्या बात है, वाह!

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....