शनिवार, ४ जुलाई २००९

यादों को समेट के आंचल में . . .

जाने कब से तरसती थी निगाहे,

तेरे एक दीदार को हमनशी मेरे ।

रूखसत हुआ जब से दिया नहीं,

कोई संदेश कभी ये हमनशी मेरे ।

तेरे जाने के बाद घर में सूनेपन,

के सिवा कुछ नहीं हमनशी मेरे ।

तेरी यादों को समेट के आंचल में,

ढक लेती हूं चेहरा हमनशी मेरे ।

लब खामोश, आंखों में विरह की,

छाया सदा साथ रही हमनशी मेरे ।

14 टिप्पणियाँ:

ओम आर्य ने कहा…

bahut hi sundarta se wirah ke aag ko abhiwykt kiya hai.....
तेरी यादों को समेट के आंचल में,

ढक लेती हूं चेहरा हमनशी मेरे ।

dil ko chhoo gayee.......

Ravi Srivastava ने कहा…

नमस्कार!
आज मुझे आप का ब्लॉग देखने का सुअवसर मिला।
वाकई आपने बहुत अच्छा लिखा है। आप की रचनाएँ, स्टाइल अन्य सबसे थोड़ा हट के है....आप का ब्लॉग पढ़कर ऐसा मुझे लगा. आशा है आपकी कलम इसी तरह चलती रहेगी और हमें अच्छी -अच्छी रचनाएं पढ़ने को मिलेंगे. बधाई स्वीकारें।

आप के अमूल्य सुझावों और टिप्पणियों का 'मेरी पत्रिका' में स्वागत है...

Link : www.meripatrika.co.cc

…Ravi Srivastava

भारत मल्‍होत्रा ने कहा…

बहुत अच्‍छा, दिल को छू लेने वाले भाव हैं आपकी इस रचना के।

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

khoobsooratee ke saath lkhee gyee hai yh rchna.

''ANYONAASTI '' {अन्योनास्ति} ने कहा…

विवेक सिंह के स्वप्नलोक से आप का पता ले वहां से छूट कर सीधे ''सदा'' लगाने यहाँ आ गया कि
कुछ जरुरी सूचनाये यहाँ भी उपलब्ध हैं ::---- " स्वाइन - फ्लू और समलैंगिकता [पुरूष] के बहाने से " परन्तु यहाँ जो भावों का प्रवाह , संवेदनाओं तूफान देखा तो उसी में बह गया ,
बहुत खूब कहा
" रूखसत हुआ जब से दिया नहीं,

कोई संदेश कभी ये हमनशी मेरे ।

तेरे जाने के बाद घर में सूनेपन,

के सिवा कुछ नहीं हमनशी मेरे । "
या इसे ही देखें

" रिश्‍ते न बढ़ते हैं,

रिश्‍ते न घटते हैं,

वो तो उतना ही

उभरते हैं ।

जितना रंग उनमें,

हम अपनी

मुहब्‍बत का भरते हैं ।
या फिर यह

जन्‍म देने वाली,

होती एक मां

फिर भी बेटे को,

कुल का दीपक,

बेटी को पराई ही,

सदा कहते लोग ।|

आप के इन भावों का रसास्वादन एक बार में एक साथ संभव नहीं है ,आनन्द नहीं आयेगा \ अब तो ''सदा '' आना पड़ेगा हर स्वर के भावों का रसपान करने |
कभी मेरे ब्लॉग ''कबीरा '' पर भी आवें आमंत्रण है ||

cartoonist anurag ने कहा…

sada ji bahut hi shandar
rachna ha.....ek baat aour itne sunder alfaz kaha se dhund laati hain....
is sunder rachna k liye aapko dher saaree badhai....

दिगम्बर नासवा ने कहा…

तेरी यादों को समेट के आंचल में,
ढक लेती हूं चेहरा हमनशी मेरे

गहरी बात लिखी है .......... लाजवाब रचना

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

आप का ब्लाग अच्छा लगा...बहुत बहुत बधाई....

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

WAH BADHIYA GHAZAL...

..AUR YE LINE TO JAAN HAI IS GHAZAL KI...

तेरी यादों को समेट के आंचल में,

ढक लेती हूं चेहरा हमनशी मेरे ।

Pyaasa Sajal ने कहा…

simple and effective hai...some of the words chosen are really good...impressiveone

sada ने कहा…

आप सभी की बहुत ही आभारी हूं, आशा है आप सब यूं ही सदा प्रोत्‍साहित करते रहेंगे ।

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

तेरी यादों को समेट के आंचल में,

ढक लेती हूं चेहरा हमनशी मेरे ।

बहुत सुन्दर पसंद आई आपकी यह रचना शुक्रिया

Suman ने कहा…

nice

Nirmla Kapila ने कहा…

तेरी यादों को समेट के आंचल में,
ढक लेती हूं चेहरा हमनशी मेरे
खूबसूरत एहसास शुभकामनायें

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sada kuchh padhna hai
मन को छू ले वो शब्द अच्छे लगते है, उन शब्दों के भाव जोड़ देते है, अन्जान होने के बाद भी एक दूसरे को ......सदा के लिए......!
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