गुरुवार, 9 जुलाई 2009

मुस्‍कराई वफा . . .

दामन वफा का,

पकड़कर एक दिन,

बेवफाई ये बोली,

रिश्‍तों में बढ़ रहीं,

दूरियां,

आपस में तकरार,

मन में द्वेश है बस,

नहीं अब यहां,

तेरी जरूरत !

मुस्‍कराई वफा

बड़ी शान से

फिर भी जिंदा हूं,

मैं ईमान में,

झुकती नहीं,

डरती नहीं,

मरती नहीं,

पहचान अपनी,

खुद हूं जहान में !!

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही बडिया और सही बात कही है सिर्फ इन्सान ही है जो खुद को अपनी खुदगर्ज़ी के लिये बदल लेता है लाजवाब आभार्

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  2. पहचान अपनी,
    खुद हूं जहान में

    sach kaha ....... aaj भी jinda है vafa ............ ye बात alag है aasaani se नहीं milti ............

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  3. बहुत ही खुब ...............कविता के एक एक पंक्ति से एहसासो के लम्हे टपक रहे है .......................बहुत ही सुन्दर ......धन्यावाद

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  4. पहचान अपनी,
    खुद हूं जहान में !!
    वफा तभी तो जिन्दा है
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ती

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  5. रिश्‍तों में बढ़ रहीं,

    दूरियां,

    ........ sahi likha hai aapne.........

    achchi rachna hai.........


    thanx fo sharing.........

    regards.......

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  6. बड़ी ही सुन्दर कविता लिखी है आपने आभार !

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  7. जो अपनी पहचान खुद,
    जग उसको पहचान.
    वंदन करता है 'सलिल',
    वह होता रस-खान..

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....