सोमवार, 13 अप्रैल 2009

बंदिशें लगा के देखा है मैने . . .

दर्द से मेरा रिश्ता बहुत है पुराना,
आंसुओं का भी है यहां आना-जाना ।

कुछ अश्‍क दूर तक आ के, ठहर जाते हैं तो,
कुछ का काम होता है, केवल छलक जाना ।

सुनाता हूं दास्‍तां जब अधूरे प्‍यार की, कहता हूं,
बन्‍द कर दो अब तो यूं अपना आना-जाना ।

तमाम बंदिशें लगा के देखा है मैंने उस पर,
न बंद हुआ उसका, मुझे यूं सरेआम रुलाना ।

तनहाई के साये में ही ‘सदा' गुजरा मेरा हर पल,
शान में था उसकी हर महफ़िल की जान बन जाना ।

4 टिप्‍पणियां:

  1. waah...............bahut gahre doobkar likhte hain aap.har nazm dard mein doobi huyi.
    mere blog par bhi padharein.

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  2. तमाम बंदिशें लगा के देखा है मैंने उस पर,
    न बंद हुआ उसका, मुझे यूं सरेआम रुलाना ।

    शानदार पंक्तियाँ हैं.

    सादर

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  3. दर्द से मेरा रिश्ता बहुत है पुराना,
    आंसुओं का भी है यहां आना-जाना ।
    बेहतरीन रचना....सादर अभिनन्दन !!!

    उत्तर देंहटाएं
  4. तमाम बंदिशें लगा के देखा है मैंने उस पर,
    न बंद हुआ उसका, मुझे यूं सरेआम रुलाना ।

    बहुत असर है उसकी बेरुखी में ...शुष्क रेगिस्तान से धारें निकल पड़ी !
    लाजवाब !

    उत्तर देंहटाएं

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....