मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012

अवसरवादी चेहरे !!!

कभी अवसरवादी चेहरे देखे हैं तुमने,
मुस्‍कान सजी हुई आंखों में तलाश
एक अवसर की जहाँ कहीं भी मिले
लपकने को आतुर
दोनो हाथों की क्‍या कहें साष्‍टांग दण्‍डवत कर
सीधे चरणों में समर्पित
 ...
यह अवसरवादिता
अपनी घुसपैठ बड़ी तेजी से करती है
इसकी जड़ें गहरी होती हैं
इनपर आवश्‍यकता नहीं होती सिचंन की
यह तो बस सदैव चिंतन करते हैं
तर्क तो बिल्‍कुल नहीं करते
जो भी आपने कहा सब शिरोधार्य
आखिर मिला हुआ अवसर गंवाया क्‍यूँ जाये ??
...
विश्‍वास करते नहीं विश्‍वास दिलाते हैं
अवसर देते नहीं अवसर लिया करते हैं कुछ पाने का
श्रेष्‍ठ होते नहीं ये  बताया करते हैं श्रेष्‍ठता है तुममे
हर वर्ष एक बुत रावण का जलाकर
अवसरवादिता को नया चोला पहना
हमारे बीच  उतार कर राम के संकल्‍पों की दुहाई
दिलाते लोग नया बहाना गढ़ ही लेते हैं
...
वक्‍़त रहते संभल गए तो ठीक है
वर्ना इनका उद्धार तो हो ही जाएगा
तुम्‍हारी तुम जानना
घुटनों से पेट ढकता आदमी
भ्रष्‍टाचार को दोष देते हुए
ईमानदारी की तालियां पीटता तो है
पर एक हाथ से तो ताली भी नहीं बजती
कसमसाहट को व्‍यक्‍त करता है
भूख जब जि़गर कचोटती है
तो ख़ालिस पानी भी सीना छलनी कर देता
और दो बूंदे पलकों पर
बनकर नमीं उतर आती है !!!

35 टिप्‍पणियां:

  1. अपने स्वार्थ के लिए सब कुछ कराते हैं अवसरवादी .... सार्थक विश्लेषण

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  2. अवसरवादी धूर्तता, पनप रही चहुँओर ।

    सत्ता-गलियारे अलग, झेलें इन्हें करोर ।

    झेलें इन्हें करोर, झेल इनको हम लेते ।

    किन्तु छलें जब लोग, भरोसा जिनको देते ।

    वो मारक हो जाय, करे जीवन बर्बादी ।

    अगल बगल पहचान, भरे हैं अवसरवादी ।।

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  3. उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  4. अवसरवादियों की धूर्तता बाद में पता चलती है...जब चिड़िया चुग जाती खेत|
    बेहतरीन रचना!!

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  5. बहुत बढ़िया सदा....
    इस सार्थक रचना के लिए बधाई...

    सस्नेह
    अनु

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  6. वहुत सुंदर रचना, व्यवस्था ऐसे ही चलती रहेगी, कोई बदलाब नहीं आने वाला..

    भ्रष्‍टाचार को दोष देते हुए
    ईमानदारी की तालियां पीटता तो है
    पर एक हाथ से तो ताली भी नहीं बजती
    कसमसाहट को व्‍यक्‍त करता है
    भूख जब जि़गर कचोटती है

    क्या कहने, बहुत सुंदर। दो लाइन दे रहा हूं

    हर शख्स अपनी तस्वीर को बचा कर निकले
    ना जाने किस मोड़ पर किसी हाथ से पत्थर निकले।

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  7. अवसरवादी तो सदा ही अहितकर होते हैं, अपने लिये कम, औरों के लिये अधिक।

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  8. इनपर आवश्‍यकता नहीं होती सिचंन की
    यह तो बस सदैव चिंतन करते हैं

    गजब अभिव्यक्ति!!

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  9. अवसरवादियों से सचेत करती सुन्दर प्रस्तुति.
    गहन भावों को संजोये.

    आभार,सदा जी.

    समय मिलने पर मेरे ब्लॉग पर आईएगा.

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  10. बहुत सही और सटीक बात कही आपने...आस्तीनों में साँप जैसे होते हैं ऐसे लोग।

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  11. बहुत सशक्त प्रस्तुति.......!!
    सार्थक रचना सदा जी ....!!

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  12. अवसर लेने के बाद कुछ भी कह देते हैं

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  13. उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के चर्चा मंच पर ।।

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  14. अवसर का बनना
    अवसर का जाना
    नहीं खेल सारा
    यही हमने माना

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  15. घुटनों से पेट ढकता आदमी
    भ्रष्‍टाचार को दोष देते हुए
    ईमानदारी की तालियां पीटता तो है
    पर एक हाथ से तो ताली भी नहीं बजती

    बहुत खूब सीमा जी .....

    उत्तर देंहटाएं
  16. जिंदगी भर तो इन्हिसे तो घिरे रहते है ... बहुत सुन्दर रचना !

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  17. अवसरवादिता के ढोंग को उजागर करती एक सशक्त रचना.. और अंतिम पंक्तियों ने बस कमाल ही कर दिया है!!
    सदा जी, बधाई!!

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  18. भूख जब जि़गर कचोटती है
    तो ख़ालिस पानी भी सीना छलनी कर देता
    और दो बूंदे पलकों पर
    बनकर नमीं उतर आती है,,,,,,,,,,,

    वाह वाह,,,,,बहुत खूबशूरत कमाल की पंक्तियाँ,,,
    RECENT POST: तेरी फितरत के लोग,

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  19. बस कुछ ऐसे अहसास होते हैं जो लगते मीठे हैं, पर बहाते खारा जल ... आंखों से।

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  20. आम आदमी की कसमसाहट को बखूबी व्यक्त किया है आपने ,बधाई|

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  21. घुटनों से पेट ढकता आदमी...
    सोचना पद गया थोड़ी देर.. सुन्दर सार्थक रचना..

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  22. सार्थक अभिव्यक्ति |सुन्दर भावपूर्ण रचना |
    आशा

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  23. पर एक हाथ से तो ताली भी नहीं बजती
    कसमसाहट को व्‍यक्‍त करता है
    भूख जब जि़गर कचोटती है
    तो ख़ालिस पानी भी सीना छलनी कर देता
    और दो बूंदे पलकों पर
    बनकर नमीं उतर आती है !!!

    मार्मिक

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  24. ऐसे अवसरवादियों की कमी नहीं कहीं भी प्रशासन में तो भरमार है इनकी अगर इन्हें पहचान लो तो एक हाथ की दूरी बनाकर चलो |बहुत बढ़िया सार्थक प्रस्तुति दी है आपने बधाई

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  25. सार्थक विश्लेषण सुन्दर रचना ...

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  26. घुटनों से पेट ढकता आदमी
    भ्रष्‍टाचार को दोष देते हुए
    ईमानदारी की तालियां पीटता तो है
    पर एक हाथ से तो ताली भी नहीं बजती
    कसमसाहट को व्‍यक्‍त करता है
    भूख जब जि़गर कचोटती है
    तो ख़ालिस पानी भी सीना छलनी कर देता
    और दो बूंदे पलकों पर
    बनकर नमीं उतर आती है !!!........अमर बेल सी बढती अवसरवादिता रचना के अंत में बहुत संजीदा हो जाती है .नित करती रहती है वरण भ्रष्टाचार का .बढ़िया प्रस्तुति .

    ram ram bhai
    मुखपृष्ठ

    बुधवार, 10 अक्तूबर 2012
    वाड्रा गीत

    http://veerubhai1947.blogspot.com/

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  27. भूख जब जि़गर कचोटती है
    तो ख़ालिस पानी भी सीना छलनी कर देता
    और दो बूंदे पलकों पर
    बनकर नमीं उतर आती है !!!

    वाह!!!!!!!!!!!!!!!

    उत्तर देंहटाएं
  28. भूख जब जि़गर कचोटती है
    तो ख़ालिस पानी भी सीना छलनी कर देता
    और दो बूंदे पलकों पर
    बनकर नमीं उतर आती है

    वाह ...

    उत्तर देंहटाएं
  29. अवसरवाद का ही बोलबाला है. संवेदना जगाती कविता. बहुत खूब.

    उत्तर देंहटाएं

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