मंगलवार, 21 अगस्त 2012

जहां निर्वाण होता हो मासूमियत का !!!


















कुछ शब्‍दों के अर्थ
अनर्थ होने के भय से
जिभ्‍या पर आने से कतराते हैं
...
कुछ शब्‍द सिर्फ़ श्रापित होते हैं
जो औरों की जिन्‍दगी में
आ जाते हैं अभिशाप़ बनकर
दे जाते  हैं एक संताप मन में
अंजानी पीड़ा लिए
कोरों में छलकते आंसू
अपना खारापन देकर छीन लेते हैं
मिठास होठों की 
...
मैं हर क्षण को ज़ीने के लिए
मन मुताबिक
शब्‍दों के औज़ार लिए रहता हूँ,
काट देता हूँ संवेदनाओं को जब भी मुझे वो
भावनाओं में बहाती हैं
पूछता हूँ अपने आप से
खुद का वो ठिकाना
जहां निर्वाण होता हो मा़सूमिय़त का
परखा नहीं जाता हो जिसे
वक्‍़त बे़वक्‍़त कसौटियों पर !!!

34 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर

    कुछ शब्‍द सिर्फ़ श्रापित होते हैं
    जो औरों की जिन्‍दगी में
    आ जाते हैं अभिशाप़ बनकर
    दे जाते हैं एक संताप मन में
    अंजानी पीड़ा लिए

    बहुत सुंदर, क्या बात

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  2. वाह...
    बहुत सुन्दर रचना....
    सस्नेह
    अनु

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  3. मासूमियत का निर्वाण .... समवेदनाओं को काटने के लिए औज़ार ... गहन भाव हैं ....

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. मैं हर क्षण को ज़ीने के लिए
    मन मुताबिक
    शब्‍दों के औज़ार लिए रहता हूँ,
    काट देता हूँ संवेदनाओं को जब भी मुझे वो
    भावनाओं में बहाती हैं
    पूछता हूँ अपने आप से
    खुद का वो ठिकाना
    जहां निर्वाण होता हो मा़सूमिय़त का
    परखा नहीं जाता हो जिसे
    वक्‍़त बे़वक्‍़त कसौटियों पर !!!.... एक शब्द , शानदार अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  6. मैं हर क्षण को ज़ीने के लिए
    मन मुताबिक
    शब्‍दों के औज़ार लिए रहता हूँ,
    काट देता हूँ संवेदनाओं को जब भी मुझे वो
    भावनाओं में बहाती हैं
    पूछता हूँ अपने आप से
    खुद का वो ठिकाना
    जहां निर्वाण होता हो मा़सूमिय़त का

    waah...bauhat khoob upmaayein!!

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  7. वाह वाह निवार्ण ही निमार्ण की कुंजी होती है

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  8. बहुत सुन्दर भाव व प्रभावी रचना..

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  9. मन मुताबिक शब्द मिल जाएँ तो अभिव्यक्ति भी आसान हो जाती है ...
    बहुत प्रभावी ...

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  10. बहुत ही सुंदर भाव एवं प्रभावी रचना...

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  11. मासूमियत के लिए अभिव्यक्ति……
    परखा नहीं जाता हो जिसे
    वक्‍़त बे़वक्‍़त कसौटियों पर !!!

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  12. कोरों में छलकते आंसू
    अपना खारापन देकर छीन लेते हैं
    मिठास होठों की
    .........क्या बात है! जस्ट अमेंजिंग!

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  13. शब्‍दों के औज़ार लिए रहता हूँ,
    काट देता हूँ संवेदनाओं को जब भी मुझे वो
    भावनाओं में बहाती हैं
    काश मुझसे भी ऐसा हो पाता ... !

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  14. कुछ शब्‍दों के अर्थ
    अनर्थ होने के भय से
    जिभ्‍या पर आने से कतराते हैं

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति,,,,लाजबाब प्रस्तुति के लिए बधाई,,,,सदा जी,,,,,

    RECENT POST ...: जिला अनुपपुर अपना,,,

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  15. संवेदनाओं और मासूमियत के आभाव में तो जिंदगी ही बेस्वाद हो जाएगी सदा जी...
    कुछ लोगों की संवेदना और मासूमियत ही तो है, जिस पर ये दुनिया अभी तक टिकी हुयी है...

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  16. अन गढ़ बिम्ब लिए है यह रचना संवेदन शून्य होते जीवन और जगत के ,व्यवहार जगत के अपने दवाबों के ....शब्द जो हमारे अनुकूल नहीं होते घेरे रहतें हैं परिवेश को ,शब्दों का ही पैरहन हमें नचाए है ...बढ़िया रचना .

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  17. भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने.....

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  18. काट देता हूँ संवेदनाओं को जब भी मुझे वो
    भावनाओं में बहाती हैं

    अपनी संवेदनाओं को नियंत्रित करना, जीवन के यथार्थ को उसके मूल स्वरूप में जीना साहस का काम होता है. आपकी यह कविता अध्यात्म की ओर मुडती चली जाती है.

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  19. शीर्षक ही अनुपम है, आगे क्या कहूँ.


    पूछता हूँ अपने आप से
    खुद का वो ठिकाना
    जहां निर्वाण होता हो मा़सूमिय़त का
    परखा नहीं जाता हो जिसे
    वक्‍़त बे़वक्‍़त कसौटियों पर


    अद्भुत, इन भावनाओं को इन शब्दों में समेटना भी कला है.

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  20. जहां निर्वाण होता हो मा़सूमिय़त का

    और बुद्ध गति प्राप्त होती हो...सुख-दुःख में सम-भाव...खूबसूरत रचना...

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  21. बहुत खूब लिखा है जी

    कुछ शब्‍दों के अर्थ
    अनर्थ होने के भय से
    जिभ्‍या पर आने से कतराते हैं

    इसी लिये तो हम भी
    सब कुछ नहीं कह पाते हैं जी !

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  22. कुछ शब्‍द सिर्फ़ श्रापित होते हैं
    जो औरों की जिन्‍दगी में
    आ जाते हैं अभिशाप़ बनकर
    दे जाते हैं एक संताप मन में
    अंजानी पीड़ा लिए......बहुत सुन्दर..

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  23. कुछ शब्‍द सिर्फ़ श्रापित होते हैं
    जो औरों की जिन्‍दगी में
    आ जाते हैं अभिशाप़ बनकर
    दे जाते हैं एक संताप मन में
    अंजानी पीड़ा लिए
    कोरों में छलकते आंसू
    अपना खारापन देकर छीन लेते हैं
    मिठास होठों की


    बेहद प्रभावी और सुन्दर पोस्ट।

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  24. मैं हर क्षण को ज़ीने के लिए
    मन मुताबिक
    शब्‍दों के औज़ार लिए रहता हूँ,

    अत्यंत प्रभावपूर्ण रचना .....

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  25. वो मासूमियत ही है जिस पर सब से अधिक वार होते हैं. उसे बचा कर रखना कठिन होता है.

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  26. बहुत सुन्दर ..शब्द कई बार मन पर न मिटने वाले घाव छोड़ जाते हैं..
    पर इन शब्द रुपी बाणों को जीवन और मन से निकाल कर फेंक देना ही उत्तम है

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  27. शब्दों के साथ हमारे सम्बन्ध द्वंदात्मक होते है पर उन्हें विभिन्न सन्दर्भों में परखने का ज़ज्बा बनाये रखें

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  28. सीमा जी नमस्कार...
    आपके ब्लॉग 'सदा' से कविता भास्कर भूमि में प्रकाशित किए जा रहे है। आज 24 अगस्त को 'जहां निर्वाण होता है मासूमियत का ...' शीर्षक के कविता को प्रकाशित किया गया है। इसे पढऩे के लिए bhaskarbhumi.com में जाकर ई पेपर में पेज नं. 8 ब्लॉगरी में देख सकते है।
    धन्यवाद
    फीचर प्रभारी
    नीति श्रीवास्तव

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....