उम्र जब शून्य की अवधि से
मां के ऑंचल से झांककर
घुटनों के बल चलकर
लड़खड़ाते कदमों से अपनों की
उंगली को थाम कर
सीखती चलना फिर
वक्त की रफ़्तार के साथ
दौड़ती जिन्दगी में सरपट भागी भी जहां
वहां नये रिश्तों की गर्माहट से
हाथों में हाथ लेकर हमसफ़र का
मंजिलों पे बढ़ाया कदमों को
पर उम्र यहां भी अपनी समझाइशें
साथ लाई
रिश्तों ने रिश्तों को जोड़ा
लेकिन उम्र ने साल दर साल
अपनी वर्षगांठ मनाई ...
मुस्कराहटों के बीच
उम्र अपने अनुभवों की लकीरें
देह पर छोड़कर
बड़ी ही सुगमता से
स्याह बालों को
सफे़दी की झिलमिलाहट
में परिवर्तन की बया़र के बीच
कमर को झुकाती कभी
हाथों में सहारे के लिए
लाठी की टेक लगाती
हथेली के कंपन के बीच
संभालती काया
शिथिल तन ढीली चमड़ी
वृद्धावस्था की मंजिल
पा ही गई उम्र
जाने किस घड़ी अंत हो जाए
सुबह और शाम के बीच
ये चलती हुई धड़कन बंद हो जाए
इस चलने की तैयारी में
अनुभवों को बांटती
यादों को समेटती रूह
आज भी आशीष की पोटली से
दुआओं की बरसात करती जब
कुछ बूंदे स्नेह की
चेहरों पे एक निख़ार ले ही आती जब
वह कुद़रत के इस खेल पर
ढली हुई उम्र के साथ
मन ही मन मुस्करा उठती ...!!!


वाह सदा जी...
प्रत्युत्तर देंहटाएंएक कविता में पूरी उम्र गुज़ार दी...
बहुत सुन्दर.
बहुत सुन्दर रचना है कुछ पंक्तिया तो लाजवाब है...शुरुआत से अंत तक सब कुछ सार्थक
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुन्दर रचना
प्रत्युत्तर देंहटाएंकोमल सुन्दर भाव
प्रत्युत्तर देंहटाएंयादों को समेटती रूह
प्रत्युत्तर देंहटाएंआज भी आशीष की पोटली से
दुआओं की बरसात करती जब
कुछ बूंदे स्नेह की ...
awesome !!
बहुत सुंदर
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपने जो तस्वीर लगाई है, सच में बहुत अच्छी है।
सुंदर रचना।
प्रत्युत्तर देंहटाएंगहरे भाव....
बहुत सुन्दर,बहते भाव..अभिव्यक्ति अच्छी लगी |
प्रत्युत्तर देंहटाएंउम्र जब शून्य की अवधि से
प्रत्युत्तर देंहटाएंमां के ऑंचल से झांककर
घुटनों के बल चलकर
लड़खड़ाते कदमों से अपनों की
उंगली को थाम कर
सीखती चलना फिर
वक्त की रफ़्तार के साथ
दौड़ती जिन्दगी में सरपट भागी भी जहां
वहां नये रिश्तों की गर्माहट से
भावनात्मक गहरे भाव लिए खुबशुरत रचना,...
welcome to new post--काव्यान्जलि --हमदर्द-
हटाएंकोमल मगर गहन भावो का समावेश्।
प्रत्युत्तर देंहटाएंsab jaante hein aisaa hee honaa hai
प्रत्युत्तर देंहटाएंrone se faaydaa nahee ,isiliye hanste huye jeenaa hai
जीवन ऐसे बढ़ता रहता।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुन्दर भावों के साथ लिखी गई सुन्दर रचना ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंउम्र का यह यात्रा वृत्तांत अच्छा लगा !
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत कोमल भाव !
यूँ ही बढती रहती है उम्र और चलता रहता है जिंदगी का चक्र ... सुन्दर रचना
प्रत्युत्तर देंहटाएंWaah...!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंShaandaar prastuti.
Aabhaar...!!
अपनी सुविधा से लिए, चर्चा के दो वार।
प्रत्युत्तर देंहटाएंचर्चा मंच सजाउँगा, मंगल और बुधवार।।
घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच।
लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!
लाजवाब चित्रण!! भावनाएं साकार हो उठी!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंउम्र अपने अनुभवों की लकीरें
हटाएंदेह पर छोड़कर
बड़ी ही सुगमता से
स्याह बालों को
सफे़दी की झिलमिलाहट
में परिवर्तन की बया़र के बीच
कमर को झुकाती कभी
हाथों में सहारे के लिए
लाठी की टेक लगाती
हथेली के कंपन के बीच
संभालती काया
शिथिल तन ढीली चमड़ी
वृद्धावस्था की मंजिल
पा ही गई उम्र
Yahee to antim saty hai!
इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - आखिर कहां जा रहे हैं हम... ब्लॉग बुलेटिन...
प्रत्युत्तर देंहटाएंह पर छोड़कर
प्रत्युत्तर देंहटाएंबड़ी ही सुगमता से
स्याह बालों को
सफे़दी की झिलमिलाहट
में परिवर्तन की बया़र के बीच
कमर को झुकाती कभी
हाथों में सहारे के लिए
लाठी की टेक लगाती
हथेली के कंपन के बीच
संभालती काया
शिथिल तन ढीली चमड़ी
वृद्धावस्था की मंजिल
सुन्दर भावों के साथ
पा ही गई उम्र
बहुत सुंदर रचना ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंअपनी अपनी उम्र।
प्रत्युत्तर देंहटाएंलाजवाब चित्रण|
प्रत्युत्तर देंहटाएंकुदरत के खेल निराले होते हैं ... उम्र का लेखा जोखा उसी के हाथ है ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंभावों से नाजुक शब्द.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत कोमल और नाजुक भाव.
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