शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

ये तर्पण मेरा ....!!!











बंद पलकों में
आपकी स्‍नेहमयी
छाया उभरती है
समर्पित है इस पितृपक्ष में
मेरी हथेलियों का जल
आपको मां - पापा
सजल नयनों से मैने
आपकी पसन्‍द का
भोजन पकाया है
जिसका कुछ अंश
गाय ने कुछ कौवे ने
कुछ श्रेष्‍ठ जन ने पाया है ....
ये तर्पण मेरा
आपके नाम का
समर्पित है इस श्राद्ध में
श्रद्धा से विश्‍वास से
आप जहां भी होंगे
इसे ग्रहण करेंगे
भावनाएं किसकी हैं ये
कर्म किसने किया
बेटी को ही तो
आप बेटा कहते आए हैं
मत सोचना ऐसा कुछ पल भर भी
आशीष देना बस इतनी
मैं सदा रहूं ऐसे ही ...
मन वचन कर्म की
विरासत लेकर ....!!!

35 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत लाज़वाब...सार्थक प्रस्तुति..

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  2. पितरों को स्‍मरण करने का अच्‍छा पर्व पितृपक्ष पर अच्छी रचना बहुत अच्‍छा लिखा है आनन्‍द आ गया ... हर पक्ष समेट लिया आपने बधाई रचना के लिये आपको ।

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  3. आशीष देना बस इतनी
    मैं सदा रहूं ऐसे ही ...
    मन वचन कर्म की
    विरासत लेकर ....!!!
    हम निभाएं फ़र्ज़ अपना
    समय पर अच्छा सन्देश। धन्यवाद।

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  4. वाह ………यही होता है असली तर्पण्।

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  5. आपको आपके बुजुर्गों का आशीर्वाद मिलता रहे बस यही कामना है

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  6. सुंदर भावना के साथ लिखा आलेख और खूबसूरत प्रस्तुति.

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  7. मन और श्रद्धा से किया गया तर्पण ..माँ और पिता को और क्या चाहिए ... सुन्दर और भावपूर्ण रचना

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  8. हमसभी को बुजुर्गों का आशीर्वाद यों ही मिलता रहे ....

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  9. बहुत ही खुबसूरत कविता पितृपक्ष पर .

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  10. अपने श्रद्धेयों को इससे खूबसूरत तोहफा क्या होगा जो आपने अपने शब्दों में कहा है...
    हमारा भी प्रणाम उनको शत-शत..

    आभार
    तेरे-मेरे बीच पर आपके विचारों का इंतज़ार है

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  11. माँ और पिता को और क्या चाहिए ........भावपूर्ण रचना...

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  12. सुंदर भावना के साथ सार्थक प्रस्तुति यही है सच्चा तर्पण...
    समय मिले तो कभी आएगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

    http://mhare-anubhav.blogspot.com/

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  13. मनसा,वाचा,कर्मणा की विरासत अक्षुण्ण रहे.

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  14. पित्र पक्ष में सच्चा तर्पण किया है आपने

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  15. आपकी किसी पोस्ट की चर्चा है नयी-पुरानी हलचल पर 24-9-11 शनिवार को ...कृपया अनुग्रह स्वीकारें ... ज़रूर पधारें और अपने विचारों से हमें अवगत कराएं ...!!

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  16. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  17. बहुत ही सुन्दर पोस्ट...........माता पिता का क़र्ज़ तो कभी नहीं चुकता पर श्रद्धा बनी बनी रहे यही बहुत है..........बहुत सुन्दर|

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  18. ye to unke prati prem hai...
    shraddha hai...
    tarpan/shraaddh sirf apne shraddhaa-suman arpan karne ka bahana hai... aapke suman bhee bahut hi khoobsoorat hai... abhaar...

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  19. आच्छी लगी आपकी ये बातें और यह विचार।

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  20. आशीष देना बस इतनी
    मैं सदा रहूं ऐसे ही ...
    मन वचन कर्म की
    विरासत लेकर ....!!!

    खुबसूरत कविता पितृपक्ष पर. बधाई.

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  21. पितरों का स्मरण.... सार्थक भावपूर्ण सामयिक रचना..
    सादर...

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  22. वाह! बेटी के इस तर्पण भाव से यह बेटा भी प्रभावित हुआ।

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  23. बहुत ही मार्मिक प्रसंग।दिल को
    छूनेवाली।धन्यवाद।

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....