सोमवार, 9 नवंबर 2009

शबनमी बूंदे जो ...


नाजुक पंखड़ी तेरी हर एक ठहरी गुलाब,

खिले जब तू लगे सिर्फ मेरा ही मेरा हो ।

हवायें मंद-मंद खुश्‍बू साथ तेरी लायें जब,

मन में मेरे तेरी खुश्‍बू का हरदम फेरा हो ।

मैं संभलकर लाख राहों पे चला रहबर तो,

करता क्‍या जो कांटो पे ही तेरा बसेरा हो ।

तेरी नजाकत से वाकिफ हैं कांटे भी तभी,

चाहत में तेरी चारों ओर इनका ही घेरा हो ।

शबनमी बूंदे जो तुझपे आकर ठहर जाती,

कह रही हो जैसे पहले हक इन पे मेरा हो ।

7 टिप्‍पणियां:

  1. शबनमी बूंदे जो तुझपे आकर ठहर जाती,

    कह रही हो जैसे पहले हक इन पे मेरा हो ।

    बहुत खूब . बढ़िया लगा

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  2. शबनमी बूंदे जो तुझपे आकर ठहर जाती,
    कह रही हो जैसे पहले हक इन पे मेरा हो ...

    गज़ब की पंक्तिया हैं ...... बहुत अच्छा लिखा है ......

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  3. बहुत बहुत ही खुब्सूरत पंक्तियाँ है.......शानदार रचना!

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  4. शबनमी बूंदे जो तुझपे आकर ठहर जाती,
    कह रही हो जैसे पहले हक इन पे मेरा हो ।
    सुन्दर भाव.

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  5. नाजुक पंखड़ी तेरी हर एक ठहरी गुलाब,

    खिले जब तू लगे सिर्फ मेरा ही मेरा हो ।


    हवायें मंद-मंद खुश्‍बू साथ तेरी लायें जब,

    मन में मेरे तेरी खुश्‍बू का हरदम फेरा हो ।

    बहुत सुन्दर रचना है।
    बधाई!

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....