शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

तेरे डर से वह ...

मैं आज तुझसे तेरी

शिकायत करना चाहता हूं

जिस बात का इल्‍म

तुझको है

पर य‍कीं नहीं

वह भी बताना चाहता हूं

कोई गर

तेरी बात मानता है

तो उसे तेरी

फिक्र होती है

तेरे डर से वह

हर बात मानता नहीं ।

14 टिप्‍पणियां:

  1. उहापोह की अच्छी अभिव्यक्ति
    तुझसे ही तेरी शिकायत --

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  2. अपने मनोभावो को अच्छे शब्द दिए हैं।

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  3. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  4. कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।
    बहुत सुन्दर रचना । आभार

    ढेर सारी शुभकामनायें.

    SANJAY KUMAR
    HARYANA

    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  5. हां ...लेकिन क्या करे .....अक्सर भरम हो जाता है .............न हो इसके लिए जरूरी है की बीच बीच में कुछ बाते न भी मानी जाय !

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  6. बहुत सुंदर....!!

    स्त्री होकर भी पुरुष के मनोभावों को बखूबी उतारा है आपने .....!!

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  7. तेरे डर से वह

    हर बात मानता नहीं ।

    OMG! kya line hain............ ab main is kavita ko kya kahun?.... sunder, behtareen, bahut khoob, yeh in sabse upar hai.... yeh kavita ultimate hai......

    तेरे डर से वह

    हर बात मानता नहीं ।

    main sach kahun to aisa bilkul mere saath ho chuka hai.... ya! main abhi is waqt zyada emotional hoon......... isliye yeh poem achchi lag rahi hai.....par pata nahi.......... yeh poem mere dil ke andar "unfathomic" utar gayi hai......ya! shayad iska bhaav main achche se samjha hoon..... isliye achchi lagi hai..... pata nahi......... shabd nahi hai........ ya! shabd to hain ......... par express nahin kar pa raha hoon...........pata nahi... dono mein se kuch bhi ho sakta hai.....

    par yeh kavita mujhe bahut achchi lagi hai.....

    ULTIMATE.........

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  8. कोई गर
    तेरी बात मानता है
    तो उसे तेरी
    फिक्र होती है
    तेरे डर से वह
    हर बात मानता नहीं...

    ये bilkul durust कहा है ........ पर इस बात को वो samajhte नहीं ...

    उत्तर देंहटाएं
  9. जब से नैना फेर लि‍ये हैं, बैन कानों में नहीं घोले,
    सारे रि‍श्‍ते उलझ गए हैं
    , जब से तुम कुछ नहीं बोले।

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  10. वह सच में झूठ
    हंसी में द्वेश
    प्‍यार में नफरत को देखा करते हैं ....

    दोस्तों के हाथ में खंजर इतने देखे हैं की दुश्मनों से मुहब्बत हो गयी कटु सत्य है ...!!

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....