शनिवार, 19 अक्तूबर 2019

परिक्रमा मन से मन तक !!

कैसे रंग लेते हो शब्दों को
गेरुए रंग में
जहाँ हर पंक्ति रूहानी हो जाती है
और इनके अर्थ करने लगते हैं
परिक्रमा मन से मन तक
दूरियां सिमट कर
पलकों की छांव में
बस संदली हो जाती हैं !!

पोर-पोर उँगलियों का
भर उठता है खुशबु से
हँसते हुये कहा तुमने
मन पवित्र तो हर ओर
इत्र ही इत्र है ☺️
….
©


16 टिप्‍पणियां:

  1. पोर-पोर का जवाब नहीं
    रंगसाज जब कोई फूल बनाये और कागज ही महकने लग जाये..कुछ ऐसा अहसाज कराती रचना।

    मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है 👉👉  लोग बोले है बुरा लगता है

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  2. जी नमस्ते,


    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (21-10-2019) को (चर्चा अंक- 3495) "आय गयो कम्बखत, नासपीटा, मरभुक्खा, भोजन-भट्ट!" पर भी होगी।
    ---
    रवीन्द्र सिंह यादव

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  3. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में मंगलवार 22 अक्टूबर 2019 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. खूबसूरत से एहसासों को समेटे ,हुए गेरुए रंग में ख्यालों को डुबोये हुए मन को बींधती हुई रचना ... बहुत शानदार लिखा आपने..

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  5. पोर-पोर उँगलियों का
    भर उठता है खुशबु से
    हँसते हुये कहा तुमने
    मन पवित्र तो हर ओर
    इत्र ही इत्र है
    वाह!!!
    बहुत ही लाजवाब कृति।

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  6. अति सुंदर रचना दी भाव मन छू रहे।

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  7. हँसते हुये कहा तुमने मन पवित्र तो हर ओर इत्र ही इत्र है वाह!!! बहुत ही लाजवाब

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....