शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

स्‍वाद यादों का .....


(1)

स्‍वाद यादों का

चखी है तुमने

यादें

इनके स्‍वाद को

जाना है

कभी

मीठी याद

गुदगुदाती है मन को

फिर कभी कड़वी भी हो जाती है

कुछ खट्टी भी

लगती हैं

कभी बहुत बुरी हो जाती हैं

लगता हैं इन्‍हें

भूल जाओ

(2)

यादों का रंग

इनके रंग को जानना हो तो

इनके करीब जाना होता है

सफेद रंग

बिल्‍कुल शांत

सुर्ख लाल रंग

मुहब्‍बत से भरा हुआ

पीला रंग

दोस्‍ती लिये हुए

ऐसे ही होती है याद

जाने कितने रंगो में

सिमटी हुई ।

सोमवार, 20 सितंबर 2010

श्रृंगार हो जाती .....


बदल जाती हर सुबह
एक कली की जिंदगी,
वह खिलकर फूल बन जाती
कभी वह चढ़ा दी जाती
किसी देवता के चरणों में
कभी चढ़ा दी जाती
अर्थी पे
कहीं उसकी खुश्‍बू से
महक उठता
घर का कोना-कोना
कभी किसी के बालों का
श्रृंगार हो जाती
इक सुबह‍ आती ऐसी भी
उतार दी जाती
देवता के चरणों से
बिखर जाती किसी के जुल्‍फों में
सजी उसकी पंखड़ी
और अंत हो जाता उसका
सदा के लिए !!

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

दौर मुश्किल है .....







नहीं लगता कोई अपना आजकल,

सबका मन हुआ अपना आजकल ।

पराये हो जाते हैं मां-बाप भी अब,

घर में दुल्‍हन के आने से आजकल ।

जन्‍म दिया, पालन पोषण किया ये,

सब करते हैं कहते बच्‍चे आजकल ।

सब कुछ करो आप, मन की करने दो,

बस उम्‍मीद मत करो कहते आजकल ।

रूसवाई से डरे जमाने में कुछ न कहा,

हर घर के हालात एक से हैं आजकल ।

बुजुर्गों की नसीहतें बुरी लगती हैं जबसे,

कुछ भी कहने से डरते हैं यह आजकल ।

दौर मुश्किल है, हर रिश्‍तें में फासला है,

काम से वक्‍त नहीं मिलता बस आजकल ।

शनिवार, 21 अगस्त 2010

गूजें स्‍वर शहनाई का .....












नमी आंसुओं की उभर आई आंखों में जब,

गिला कर गई फिर किसी की बेवफाई का ।

बहना इनका दिल के दर्द की गवाही देता,

एतबार किया क्‍यों इसने इक हरजाई का ।

कितना भी रोये बेटी बिछड़ के बाबुल से,

दब जाती सिसकियां गूजें स्‍वर शहनाई का !

ओट में घूंघट की दहलीज पर धरा जब पांव,

चाक हुआ कलेजा आया जब मौका विदाई का ।

जार-जार रोये बाबुल मां ने छोड़ी न कलाई मेरी,

बहते आंसुओं में चेहरा धुंधला दिखे मां जाई का ।

शनिवार, 17 जुलाई 2010

सारे रिश्‍ते तोड़ आया ....







गुरबत पे मेरी मुझको छोड़ सबको तरस आया,

सब मुझे छोड़ गये मैं न उसको फिर छोड़ पाया ।

कुछ भूल गये मुझको, कुछ अजनबी हुये मुझसे,

मैं लौटा यादें साथ ले जब मुश्किल ये मोड़ आया ।

रिश्‍ता खून का दुहाई मांगे मेरे होने की जब भी,

मैं कहता हंसकर मैं तो सारे रिश्‍ते तोड़ आया ।

नासमझ को समझाओ तो जरा टूटे हुए धागे को,

बिन गांठ के कौन है जो आजतलक जोड़ पाया ।

खेल तकदीर के खिलौना बन के इंसान निभाता है,

भटका सारा जीवन तब जाकर यह निचोड़ आया ।

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....