बुधवार, 16 सितंबर 2009

तेरे बिन धड़कन नहीं ...

मैं आज भी तुझे अपने आस-पास पाता हूं

तेरी यादों को नये-नये रंगों में सजाता हूं ।

हर तस्‍वीर पूरी हो जाती मगर फिर भी,

उनको तेरे बिन धड़कन नहीं दे पाता हूं ।

मैं जिस राह पर चला तू हमसफर रही मेरी,

तेरे जाने के बाद भी अपने साथ ही पाता हूं ।

हर कोई तेरे होने की निशानी मांगे मुझसे,

तू मेरे साथ है हर पल बस यही कह पाता हूं ।

हर आंख में अमृत की बूंदों सी उभरी थी तू,

म‍हफिल जब भी तेरे गीतों की सजाता हूं ।

बुधवार, 9 सितंबर 2009

गुमनाम ख्‍यालों के पैगाम . . .

ये सफर आखिरी है मेरा उसे सलाम दे देना,

लौट के फिर न आऊंगा ये पैगाम उसे दे देना ।

म‍हफिलें सजती रहेंगी पर हम न उसमें होंगे,

कुछ गुमनाम ख्‍यालों के पैगाम उसे दे देना ।

पढ़ लिख कर वो इतना बड़ा हो गया ज्ञानी,

मेरी छोटी-छोटी बातों के पैगाम उसे दे देना ।

ख्‍यालों में रहकर वो ख्‍वाबों में घर कर गया,

मैं सदा पास रहूंगा तेरे ये पैगाम उसे दे देना ।

रस्‍सी जल जाए तो भी उसके बल नहीं जाते,

कह गए ज्ञानी-ध्‍यानी ये पैगाम उसे दे देना ।

यादों के जंगल में भटक जाओगे तो भूलोगे,

एक दिन खुद का पता ये पैगाम उसे दे देना ।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

पंक्ति पूरी होने को प्‍यासी है ...

आज शब्‍दों में कुछ उदासी है,

पंक्ति पूरी होने को प्‍यासी है

टूटे लफ्ज जोड़ने को आतुर,

हर लम्‍हा बात जरा खासी है ।

कोई कुछ कहता कोई कुछ,

यह कितना ज्‍यादा बासी है ।

मन ही मन इतनी उलझन,

हर शब्‍द इसका ही वासी है ।

लिख दे आज तू इनकी व्‍यथा,

पढ़े कोई इनकी जो उदासी है ।

सोमवार, 31 अगस्त 2009

चन्‍द लकीरों से ....

आड़ी तिरछी

टूटी फूटी रेखाओं में

हथेली की जब

भाग्‍य रेखा

कहीं बीच में ही

कटी होती है

यह घोषित करती है

उसका दुर्भाग्‍य

तब वह बदलना चाहता है

उन लकीरों का अर्थ

अपने कर्म से

कहीं

जीवन रेखा

नजर आती जब

दो टुकड़ों में विभाजित

तब वह जीना चाहता

हर पल को

आत्‍मविश्‍वास से

इसी तरह एक

दिन बदल लेता वह

अपनी पूरी तकदीर

चन्‍द लकीरों से

वह लड़कर

विजयी होता विश्‍वास

के साथ

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

एक – एक फूल गूंथकर ...

जाने कब से बिखरी थी

मेरे चारों ओर तेरी यादें

जिन्‍हें समेटकर

मैं तुझे अपनी रूह में

बसाना चाहता था


जिनसे निकलकर

फिर तुम यूं जा ना सको

मुझे देकर तनहाई

मैं खुद के वजूद में,

उन यादों को

यूं गूंथना चाहता हूं

जैसे एक एक फूल गूंथकर

बनती है पूरी माला


जिसकी खुश्‍बू बस जाती है

अन्‍तर्मन में

यादों के साये में

मैं गुनगुनाना चाहता हूं

तुझे गीत की तरह

अपनाना चाहता हूं

संगीत की तरह जीवन में

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....