फागुन मुस्काराता है
जब गुलाल
उँगली और अॅंगूठे को छोड़
हथेली में जाने को मचलता है
रंगीला सावन मनभावन हो
हर चेहरे को रंगता है
रंगों की फुहार में
भीग जाती है अनबन भी
तो बोल उठती है
होली मुबारक!
...
रंगों को भी
प्यास है पानी की
अपनों को भिगोने की
कुछ रिश्तों को
रंग देना चाहते हैं
स्नेह, प्यार और सम्मान से!!
....
एक चुटकी अबीर
माथे पे लगकर
सम्मान हो जाता है
गाल पे लगता है तो
स्नेह का फागुन
भीगकर प्यार हो जाता है
रंगों का ये त्योहार
घोलता है मिठास
सम्बंधों में जब-जब
तो जीवन का पल-पल
बस उल्लास हो जाता है!!!