सोमवार, 16 अप्रैल 2012

मेरी राहों का तम हरता है ... !!!













 कैसे बिखरे हैं आज शब्‍द
मन के आंगन में
मैं समेटती हूं
भावनाओं की अंजुरी में जब  भी
ये दूर छिटक
मुझसे जाने कैसे - कैसे सवाल करते हैं
मैने कुछ नहीं छिपाया इनसे
सच कहा है सदा
सच को ही जिया है सदा
मेरा वज़ूद सच की
आंच से तप कर कुंदन हुआ
मन में  कितना भी क्रंदन हुआ
पर नहीं तन कभी विचलित हुआ
है शिखर पर आज जो
होकर मुझसे ज़ुदा
कल वो मेरा ही साया थे
तुम ही कहो
साया भी कभी पराया होता है?
पर कैसे समझाऊं
किसको अपना मन दर्पण दिखलाऊं
इनके मन का भरम में
किस विधि मिटाऊं
.....
वक्‍त की साजि़शों का शिकार
जब भी कभी मन होता है
सच कहूं
बस अपनों से ही गिला होता है
एहसासों के म‍ंदिर में
एक दिया विश्‍वास का जलता है
यही है वह  दिया जो
हर तूफ़ान में
मेरी राहों का तम हरता है ...

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

क्‍या कर रहे हो ???

कुछ अहसासों के बादल
जो तेरी आंखों में थे
वो मेरी आंखों से जाने कब
बरस गये
कुछ लम्‍हे थे जाने-पहचाने
सोचा था उनको मैं थाम लूंगी
जीवन का सच
कहना इतना आसान तो नहीं होता
हम झूठ को सच मानते हैं
उसमें ही अपनी
खुशियां ढूंढते हैं
हमारी बावरी होती मन:स्थिति
किसी मृगतृष्‍णा सी प्रतीत होती है
ये मिल जाए तो हम खुश होंगे
उसे पा लेंगे तो शायद
पर खुशी कहां किसी वस्‍तु में टिकती है
मन का लालच और हमारी
खुशियों को ढूंढने की प्रवृत्ति
जाने क्‍या-क्‍या नाच नचाती है
लेकिन जिस दिन
होता है सच का सामना
हम किनारा कर लेते हैं
या किनारे लगा देते हैं उस नाव को
जिस पर हम सवार होते हैं
वजह वही डांवाडोल होता मन
और फिर
इस पार या उस पार  की मन:स्थिति
से पार तो पाना ही होता है
कब तक ...
बीच मंझधार में रहा जा सकता है
किसी और के पूछने से पहले
खुद ही मन निर्भीक हो
पूछ बैठेगा ...
क्‍या कर रहे हो ?
तब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा
और हम खुद ही कतराने लगते हैं अपने आप से
चेहरे की रौनक गायब हो जाती है
आंखों में तिरती उदासी के बीच हम
मज़बूर कर दिये जाते हैं
सच को समझने और जीने के लिए ...
ज़रूरी है एक सामना इसके साथ ...!!!

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

आस का एक धागा ....














मैं  आस का एक धागा लाई हूं
जो अभी बहुत कमज़ोर है
पर तुम्‍हे पता है

इसे हम और मज़बूत कर सकते हैं
इसी तरह का
एक धागा मैने तुम्‍हारे पास भी देखा था
तुमने भी तो उसमें
कोई गांठ नहीं बांधी है
और मैंने भी 
इसमें कोई गांठ नहीं बांधी 
दोनो इकट्ठे होंगे तो
मजबूत हो जाएंगे ...

हमें इस धागे को
मजबूत करने के लिए
दोनो को एकसार करना होगा
कमजोर धागों में यूं तो
गांठ लगती नहीं
यदि लग गई तो फिर
खुलती नहीं ...

फिर जब भी कोई
इसे तोड़ना चाहेगा
उंसकी उंगलियों में
ये अपने टूटने का
घाव जरूर दे जाएगा
और एक अनचाहा दर्द भी ...

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

कौन मनायेगा ???













याद तेरी जब भी आती
जाने कितने सवाल करती
कभी जज्‍बातों से लड़ती
तो कभी तनहाईयों से पूछती
किस बात पे तुमने
मुझपर यूं पहरे लगाये हैं
  ...
मैं सिमट जाऊंगी
खुद ही एक दिन
तुम्‍हारी आंखों में
बन के अश्‍क
जिनमें आज भी
मेरी यादों के साये हैं ...
कोई कुछ कहता
इससे पहले ही
इक रूठी हुई याद ने
इस कदर हंगामा कर दिया
मेरे दिल का कोना
फ़कत तनहाईयों के नाम
कर दिया 
...
कौन मनायेगा ?
उस रूठी हुई याद को
किससे पूछती ?
लब खामोश थे  जहां
वहां जज्‍बात बेजुबान से
दिल की सदा
सुनने को कोई तैयार नहीं
दिमाग अपनी चलाता
मर्जी अपनी
सबसे पहले दिखलाता
कोई कुछ कहता तो
बस एक (: बुझी मुस्‍कान
कोई रास्‍ता नहीं
उसके पास यादों का
झगड़ा निपटाने के लिए
कोई याद तैयार नहीं थी तेरी
इस दिल से जाने के लिए ...





सोमवार, 2 अप्रैल 2012

सुननी ही होगी आवाज ... वो !!!
















तुमने भागने का मन बना तो लिया है
पर खुद से कब तक भाग सकोगे
बहुत मुश्किल है
मैं कोई और नहीं ... तुम्‍हारी ही परछाईं हूँ
सुननी ही होगी आवाज ... वो !!!
जो दस्‍तक दे रही है दिल के दरवाज़े पर
जिसकी वजह से मन और बुद्धि  में
हो जाता है झगड़ा
फिर कसैला हो हर मधुर ख्‍याल
हिला देता है हर बुनियाद को
मन को हमेशा
अपनी 'मैं' का ही ख्‍याल होता है
और बुद्धि निसहाय हो जाती है
विवेक को जागृत करना
उतना ही आवश्‍यक है
जितना मन के 'मै' का मान रखना ...
मन पे लग़ाम तो
विवेक ही लगा सकता है
आदत ... याने नशा
फिर वह किसी भी काम का हो
आदत अच्‍छी है या बुरी
इसके लिए विवेक को
ध्‍यान से जोड़कर
उसकी सतह तक जाना ही
होता है तभी किसी नतीज़े पर
पहुंचा जा सकता है ...
यक़ीन रखो जिस दिन तुमने
ये कर लिया
तुम मुक्‍त हो जाओगे
भय से .. अवसाद से...
आंखे डालकर जि़न्‍दगी से बातें
कर सकोगे और पा सकोगे
कुछ लम्‍हे सुकून के ...

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....