आंसुओं को आत्मा की जुबान कहूं तो
कोई अतिश्योक्ति न होगी ...
ये हर भाव पूरी सच्चाई से बयां करते हैं
खुशी में भी इनके होने का एहसास
आंखों से छलकने पर हो जाता है
हंसते-हंसते भी आंखें स्वत:
तरल हो उठती है ...
पीड़ा ... शरीर के किसी भी हिस्से में
तकलीफ़ हो तो ये सहज़ ही बहते हैं
आंसुओं का बहना ...
किसी से बिछड़ने का दुख हो
किसी से मिलने की खुशी हो
ये खुद को बखूबी व्यक्त करते हैं
इंसान तो इंसान ईश्वर भी
इन आंसुओं को रोक नहीं पाए
कहते हैं सती के वियोग में
भगवान शिव की आंखों से
आंसू की धारा बह निकली थी तो
वैतरणी नदी का जन्म हुआ था
रूद्राक्ष की उत्पत्ति भी
शिव के आंसुओं से मानी जाती है ..
आंसु जितना बहते हैं प्रेम व विरह में
उतना ही कवि की कविताओं से भी
ये अपना रिश्ता कायम रखते हैं
शायद ही कोई रचनाकार होगा
जिसने अपनी रचनाओं में
इनका जिक्र न किया हो
भावनाओं से आंसुओं का नाता
जन्म जन्मांतर का तो है ही
आंसू खारापन लिए हुए भी
जीवन में एक मिठास
कायम रखते हैं ....
आपको क्या लगता है ... ???








