शनिवार, 21 अगस्त 2010

गूजें स्‍वर शहनाई का .....












नमी आंसुओं की उभर आई आंखों में जब,

गिला कर गई फिर किसी की बेवफाई का ।

बहना इनका दिल के दर्द की गवाही देता,

एतबार किया क्‍यों इसने इक हरजाई का ।

कितना भी रोये बेटी बिछड़ के बाबुल से,

दब जाती सिसकियां गूजें स्‍वर शहनाई का !

ओट में घूंघट की दहलीज पर धरा जब पांव,

चाक हुआ कलेजा आया जब मौका विदाई का ।

जार-जार रोये बाबुल मां ने छोड़ी न कलाई मेरी,

बहते आंसुओं में चेहरा धुंधला दिखे मां जाई का ।

शनिवार, 17 जुलाई 2010

सारे रिश्‍ते तोड़ आया ....







गुरबत पे मेरी मुझको छोड़ सबको तरस आया,

सब मुझे छोड़ गये मैं न उसको फिर छोड़ पाया ।

कुछ भूल गये मुझको, कुछ अजनबी हुये मुझसे,

मैं लौटा यादें साथ ले जब मुश्किल ये मोड़ आया ।

रिश्‍ता खून का दुहाई मांगे मेरे होने की जब भी,

मैं कहता हंसकर मैं तो सारे रिश्‍ते तोड़ आया

नासमझ को समझाओ तो जरा टूटे हुए धागे को,

बिन गांठ के कौन है जो आजतलक जोड़ पाया ।

खेल तकदीर के खिलौना बन के इंसान निभाता है,

भटका सारा जीवन तब जाकर यह निचोड़ आया ।

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

हंसने के फन में ....






तेरी मुहब्‍बत मुझे इस कदर रूलाएगी छिपाने में,

उसको इक मुस्‍करा‍हट भी मेरी न काम आएगी ।

यूं तो हंसने के फन में खूब माहिर हूं होगा क्‍या,

जब हंसी बन के अश्‍क आंखों से छलक जाएगी ।

दर्द तेरा दिया अब दवा का काम करता है,

जख्‍म पे कोई मरहम अब न काम आएगी ।

टीस जख्‍मों की चैन दिल का बन गया मेरे,

इस चुभन से बच के जिन्‍दगी किधर जाएगी ।

जुर्म हो गया मुहब्‍बत पे इस तरह ऐतबार करना,

इसकी कीमत तो ताउम्र अश्‍को से चुकाई जाएगी ।

बुधवार, 30 जून 2010

शुभा होता है .....



हिचकियों के आने से तेरे,

याद करने का शुभा होता है ।

यादे होती हैं सहारा इंसान का,

जिनसे हर शख्‍स बंधा होता है ।

तनहाईयां डस लेती आदमी को,

परछाईयों का इनपे पहरा होता है ।

मिलना-बिछड़ना खेल तकदीर के,

आदमी बस इक खिलौना होता है ।

दिल की गहराईयों से चाहो जिसे,

बस वही तो दिल में बसा होता है ।

शुक्रवार, 18 जून 2010

पैरों में पाजेब की तरह .....





आज पहरे पर मुहब्‍बत के नफरत बैठ गई ऐसे,

किसी ने मुहब्‍बत की कीमत अदा कर दी जैसे ।

वफा का सिला बेवफाई प्‍यार के बदले नफरत ये,

लगता किसी गुनाह की सजा मैने पाई हो जैसे ।

बेडि़यां पड़ गई पैरों में पाजेब की तरह मैं चली,

एक कदम भी हौले से तो खनक जाएगी जैसे ।

खुशियों के मेले में गम तन्‍हा मेरे पास अकेला,

रास नहीं आई हो उसे हंसी की महफिल जैसे ।

रूठती गई किस्‍मत जितना मनाया उसको मैने,

छोड़कर फैसला रब पर मैने भी सुकूं पाया जैसे ।

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....