
आज पहरे पर मुहब्बत के नफरत बैठ गई ऐसे,
किसी ने मुहब्बत की कीमत अदा कर दी जैसे ।
वफा का सिला बेवफाई प्यार के बदले नफरत ये,
लगता किसी गुनाह की सजा मैने पाई हो जैसे ।
बेडि़यां पड़ गई पैरों में पाजेब की तरह मैं चली,
एक कदम भी हौले से तो खनक जाएगी जैसे ।
खुशियों के मेले में गम तन्हा मेरे पास अकेला,
रास नहीं आई हो उसे हंसी की महफिल जैसे ।
रूठती गई किस्मत जितना मनाया उसको मैने,
छोड़कर फैसला रब पर मैने भी सुकूं पाया जैसे ।
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