शुक्रवार, 18 जून 2010

पैरों में पाजेब की तरह .....





आज पहरे पर मुहब्‍बत के नफरत बैठ गई ऐसे,

किसी ने मुहब्‍बत की कीमत अदा कर दी जैसे ।

वफा का सिला बेवफाई प्‍यार के बदले नफरत ये,

लगता किसी गुनाह की सजा मैने पाई हो जैसे ।

बेडि़यां पड़ गई पैरों में पाजेब की तरह मैं चली,

एक कदम भी हौले से तो खनक जाएगी जैसे ।

खुशियों के मेले में गम तन्‍हा मेरे पास अकेला,

रास नहीं आई हो उसे हंसी की महफिल जैसे ।

रूठती गई किस्‍मत जितना मनाया उसको मैने,

छोड़कर फैसला रब पर मैने भी सुकूं पाया जैसे ।

मंगलवार, 25 मई 2010

फिसल गया वक्‍त ....


मैं किसी की आंख का ख्‍वाब हूं,

किसी की आंख का नूर हूं ।

भूल गया सब कुछ मैं तो खुद,

अपने आप से भी दूर हूं ।

हस्‍ती बनने में लगा वक्‍त मुझको,

पर अब मैं किसी का गुरूर हूं ।

फिसल गया वक्‍त रेत की तरह,

पर मैं ठहरा हुआ जरूर हूं ।

हक किसी का मुझपे मुझसे ज्‍यादा है,

मैं अपने वादे के लिये मशहूर हूं ।

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

क्‍यों ...?


उड़ जाती नींद आंखों से क्‍यों,

जब ख्‍वाब कोई टूट जाता है ।

गुस्‍ताखियां याद आती हैं क्‍यों,

कोई जब माफी मांग के जाता है ।

बदलता वक्‍त है हम दोष देते क्‍यों,

उसे जब कोई छोड़ के चला जाता है ।

पतझड़ में पीले पत्‍तों की जुदाई क्‍यों,

जो ये शाख से अपनी ही टूट जाता है ।

खामोशी का हर लम्‍हा सूना क्‍यों,

हर पल इतना गुमसुम कर जाता है ।

गुरुवार, 11 मार्च 2010

तन्‍हा होने का ...






उसने

हर एक आंसू से धोये

मुहब्‍बत के जख्‍म

तब सारी टीसें

दर्द की चीखने लगीं

इतना समर्पण

तेरा उस प्‍यार के लिये

जो तेरा न हुआ

तू उसकी हो गई

यूं दिलो जां से

उसके दिये हर जख्‍म को

पाक कर दिया

वो मुस्‍कराई

मैने अब दर्द को ही

अपनी दवा कर लिया

इसके होने से

मुझे तन्‍हा होने का

पता भी नहीं लगता

यह हर पल

मेरे साथ रहता है ...।

बुधवार, 3 मार्च 2010

तोड़ने से पहले ...










तुम मेरा ही अंश हो,

आओ तुमको बतलाऊं,

तुम्‍हें तुम्‍हारे बारे में

मेरी धड़कनों से तुम्‍हें

हवा मिलने लगी है

तुम्‍हारा वजूद

अस्तित्‍व में आ रहा है,

तुम्‍हें मेरे द्वारा

लिये गये आहार के सहारे

खुद को जीवित रखना है,

धीरे:धीरे तुम्‍हारी आकृति

स्‍पष्‍ट हो जाएगी,

इसके बाद तुम

हिलने-डुलने लगोगे,

यदि मैं कभी भूखी रहूंगी

तो तुम भी बेचैन होगे,

तुम्‍हारा ध्‍यान मैं

पल-प्रतिपल रखूंगी

बिना यह सोचे

तुम पुत्र हो या पुत्री,

रंग तुम्‍हारा

श्‍वेत होगा या श्‍याम,

बस इतना चाहती हूं,

तुम जन्‍म लो स्‍वस्‍थ्‍य

तुम्‍हारे बढ़ते आकार के साथ

मैं तुम्‍हें दिन-प्रतिदिन

दे सकूं सही दिशा

तुम जोड़ सको सबके दिलों को

मिटा सको दूरियों को

तोड़ने से पहले तुम जोड़ना सीख लो

ताकि तुमसे जब कुछ टूटे

तो तुम्‍हें अहसास हो उसकी टूटन का

फिर चाहे वह ....

रिस्‍ता हो / उम्‍मीद हो /ख्‍वाहिश हो ....


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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....