बुधवार, 3 मार्च 2010

तोड़ने से पहले ...










तुम मेरा ही अंश हो,

आओ तुमको बतलाऊं,

तुम्‍हें तुम्‍हारे बारे में

मेरी धड़कनों से तुम्‍हें

हवा मिलने लगी है

तुम्‍हारा वजूद

अस्तित्‍व में आ रहा है,

तुम्‍हें मेरे द्वारा

लिये गये आहार के सहारे

खुद को जीवित रखना है,

धीरे:धीरे तुम्‍हारी आकृति

स्‍पष्‍ट हो जाएगी,

इसके बाद तुम

हिलने-डुलने लगोगे,

यदि मैं कभी भूखी रहूंगी

तो तुम भी बेचैन होगे,

तुम्‍हारा ध्‍यान मैं

पल-प्रतिपल रखूंगी

बिना यह सोचे

तुम पुत्र हो या पुत्री,

रंग तुम्‍हारा

श्‍वेत होगा या श्‍याम,

बस इतना चाहती हूं,

तुम जन्‍म लो स्‍वस्‍थ्‍य

तुम्‍हारे बढ़ते आकार के साथ

मैं तुम्‍हें दिन-प्रतिदिन

दे सकूं सही दिशा

तुम जोड़ सको सबके दिलों को

मिटा सको दूरियों को

तोड़ने से पहले तुम जोड़ना सीख लो

ताकि तुमसे जब कुछ टूटे

तो तुम्‍हें अहसास हो उसकी टूटन का

फिर चाहे वह ....

रिस्‍ता हो / उम्‍मीद हो /ख्‍वाहिश हो ....


शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

ऐसा क्‍यों होता है .....?














(1)

घनी पलकों की छाव में

सुन्‍दरता बढ़ जाती

नयनों की

इन पलकों की छांव का

एक बाल टूटकर

जब डूब जाता

नयनों के प्‍याले में

कितनी चुभन होती

जब तक निकल न जाता

आंख से ....!

(2)

ऐसे ही कुछ रिश्‍ते

भी हो जाते हैं

जिनसे कभी

जीवन महक जाता है

कभी कुछ रिश्‍ते

हो जाते हैं ऐसे

जो चुभने लगते हैं

उनकी चुभन

से जीवन की सारी

खुशियां छिन जाती हैं

ऐसा क्‍यों होता है ....

जिन के बिना

हम कभी

एक पल

रह नहीं पाते

फिर किसी मोड़ पर

उसी से

बच के निकल जाते हैं ....!!

आज मेरी यह 100वीं पोस्‍ट आप सबके सामने है,

इधर कुछ दिनों से आप सब के बीच नहीं पहुंच सकी

इसी खेद के साथ सदा ....


शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

यादें सिमटती गईं ....









सूनी अंधेरी रात में

यादों की गठरी

गिर गई

सारी यादें

धरती पर थीं पड़ी,

मैने उन्‍हें समेट कर

वापस गठरी में

रखना चाहा

पर वे आपस में

मिलकर परिहास करने लगीं

कोई खुद को अच्‍छी कहती

तो कोई खुद को,

सब मेरी हाथों से

दूर होती जा रही थीं

मैं किसी भी एक याद को

छोड़ना नहीं चाहती थी

थक गई जब मैं तो

इन्‍हे समेटने के लिए

मैने आंसुओं का सहारा लिया

हर याद पर एक-एक बूंद

गिरती गई और यादें सिमटती गईं ।

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

एक जिन्‍दगी ....










वो जाने क्‍यों

होने लगी कमजोर

मुहब्‍बत का उस पर

असर होने लगा,

सामने होने पर

जिसको न देखा

नजर उठा के,

निगाहें

उसके आने का

रस्‍ता तकने लगी

बातें करती सांसे आपस में

जब तेज-तेज

वह खुद की

हालत से डरने लगी

कैसे बता पाएगी

इन पलों की सरगोशियां

ख्‍यालों के तसव्‍वुर

पे उस अजनबी चेहरे का छा जाना

हौले-हौले होठों का कंपकपाना

छिपा के हथेलियों में चेहरा

फिर मुस्‍कराना,

जैसे एक जिन्‍दगी

का जीकर हर पल खुशी-खुशी

गुजर जाना ।

सोमवार, 11 जनवरी 2010

दर्द ...


दर्द आज

बयां करना चाहता था

अपनी पीड़ा को

जो उसे असहाय कर चली थी

जब से वह

उसके भीतर पली थी

चिंता के साथ

घुल रही थी उसकी हड्डियां भीं

उसके रोम छिद्र

सिहर उठते उसकी चुभन से

आंसुओ के वेग में

निशब्‍द मौन खड़ा वह

होठों को भींचकर

देखता उसकी जड़ता को

हठीली मुस्‍कान पपड़ाये हुये होठों पर

सफेद धारियों में

रक्‍त की लालिमा लाकर

उसे मन ही मन कुंठित करती

आज पूरे वेग से

वह झटकना चाहता था

गुजरना चाहता था हद के परे

हताशा और निराशा के

पकड़ना चाहता था

आस की एक नन्‍हीं किरण

जो इस दर्द का अंत कर सकती थी

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....