
खामोशियां
गहरी होती गई जितनी
वह तन्हाई में
सिमटती गई उतनी
ख्यालों को बुनती कभी
पर वह उलझ जाते
यूं एक दूसरे में
वह सुलझाये बिना
फिर नये सिरे से
बुनना चालू कर देती
कभी बुनती वह तुझसे मिलना
फिर तेरा बिछड़ना
कभी जिनमें होता तेरा प्यार,
या होती बिन बात की तकरार
वादे जन्मों जनम साथ निभाने के
या फिर
दर्द जुदाई का देकर
बिन बताये चले जाना
उसे हैरानी होती
आपने आप पर
उसका हर सिरा तुझसे शुरू होकर
तुझपे ही खत्म होता
आज भी ।




