kavita लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
kavita लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

खामोशियां ...


खामोशियां

गहरी होती गई जितनी

वह तन्‍हाई में

सिमटती गई उतनी

ख्‍यालों को बुनती कभी

पर वह उलझ जाते

यूं एक दूसरे में

वह सुलझाये बिना

फिर नये सिरे से

बुनना चालू कर देती

कभी बुनती वह तुझसे मिलना

फिर तेरा बिछड़ना

कभी जिनमें होता तेरा प्‍यार,

या होती बिन बात की तकरार

वादे जन्‍मों जनम साथ निभाने के

या फिर

दर्द जुदाई का देकर

बिन बताये चले जाना

उसे हैरानी होती

आपने आप पर

उसका हर सिरा तुझसे शुरू होकर

तुझपे ही खत्‍म होता

आज भी ।

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

सवाल मेरा ...?


सवाल पर

सवाल मेरा,

तुम्‍हारा

खामोश रहना,

जानते हो

कितनी उलझने

खड़ी कर देता है

मेरे लिये,

उन खामोशी के

पलों में कितना

बिखर जाती हूं

तुम्‍हारे जवाब देने तक

टूट जाती हूं

इतना कि

फिर एकाकार नहीं हो पाती

निर्विकार होकर

अपने आप से ही

विमुख हो जाती हूं

मैं भी तुम्‍हारी तरह ।


शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

हंसी में द्वेश ...

मैं आज बांटना चाहता हूं

लोगो के गम

देना चाहता हूं

उनके होठों पे मुस्‍कान

पर उन्‍हें मेरी

इस बात पे यकीं नहीं होता

जरूर किसी ने उन्‍हें

धोखा दिया होगा,

तभी तो उन्‍हें आदत हो गई है

फरेब, मक्‍कारी की,

धोखे और बेईमानी की

वह सच में झूठ

हंसी में द्वेश

प्‍यार में नफरत को देखा करते हैं ।

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

भीगा चेहरा ...

मेरे आंसुओ से भीगा चेहरा

तुम्‍हें कभी अच्‍छा नहीं लगता कि

मैं रोऊं

पर कारण जरूर बन जाते हो

कभी देर से आने पर

कभी बिना कुछ कहे

चले जाने पर

कभी कभी हंस के मनाने पर ।


मंगलवार, 10 नवंबर 2009

कौन सा शब्‍द ...?

जाने कब

कौन सा शब्‍द

रच देता है इतिहास

जिससे अमर

हो जाती हैं रचनायें

जाने कौन सा पल

घटित हो जाता है

जीवन में

जाने कब

जब वह अविस्‍मरणीय

हो जाता है,

जाने वक्‍ता हो जाता है

जीवन में कब मौन

खो जाता है हर लफ्ज,

उसका जाने कब

घटित हो जाती हैं

जीवन में

ऐसी घटनाएं

जब वह अपनों के बीच

रहकर भी तन्‍हा हो जाता है !


शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

तेरे डर से वह ...

मैं आज तुझसे तेरी

शिकायत करना चाहता हूं

जिस बात का इल्‍म

तुझको है

पर य‍कीं नहीं

वह भी बताना चाहता हूं

कोई गर

तेरी बात मानता है

तो उसे तेरी

फिक्र होती है

तेरे डर से वह

हर बात मानता नहीं ।

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

पवित्रता की आंच पर ....

अभिमान का दाना,

तुम नहीं खाना,

तुम्‍हें भी

अभिमान आ जाएगा

सजाना रिश्‍तों को

अपनेपन से

परोसना

उनकी थाली में

स्‍नेह का भोजन

जिसे पकाया गया हो

पवित्रता की आंच पर

जिससे

उसमें महक होगी

विश्‍वास की,

एकता का रस होगा

जो तुम्‍हारी जिभ्‍या को

रसास्‍वादन कराएगा,

तुम्‍हारी सोच को

संकुचित नहीं होने देगा

एक मजबूत मस्तिष्‍क

जो लड़ सकेगा

हर चुनौती से,

बचाएगा

तुम्‍हारे विचारों को

इधर-उधर भटकने से

संजो सकोगे तुम

वो सपने जिन्‍हें

हकीकत बनने से

कोई रोक नहीं पाएगा ।

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009

रिश्‍तों की अग्नि में ...

मैं लकड़ी होता

और

कोई मुझे जलाता,

तो जलकर

मैं इक आग हो जाता,

डाल देता

कोई उन जलते हुये

अंगारों पर,

कुछ बूंदे पानी की

तो कोयला हो जाता,

कोयले को जलाता

फिर कोई

एक बार तो,

इस बार मैं जलकर

राख हो जाता ।

लेकिन

इंसान हूं

रिश्‍तों की अग्नि में

जाने कितनी बार

जला हूं मैं

बुझा हूं मैं

भीगा भी हूं मैं

लेकिन जलकर

अभी राख नहीं हुआ

कि मिल सकूं माटी

में बनके माटी ।

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009

रूह को सुकूं दे जाए ....

(1)

भरम आंखों का

रहने दो आंखो में

छिप जाये जहां

कोई आंसू की बूंद

तेरे सजल नयनों में

इतना दर्द हो

तेरे बैनों में

चीत्‍कार करता

तेरा हृदय

दर्द से तड़पती

रूह को सुकूं दे जाए ।

(2)

मन को मेरे

अहसास तो था

कि तू मेरा नहीं है,

भरोसे को अपने

मैने

मन से ऊपर कर दिया

और

कहा हो सकता है

यह मेरा भरम हो

पर बेवफा

तूने उस भरम को भी

मेरा रहने न दिया

तोड़ दिया

जज्‍बातों को ।

शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

रिश्‍तों की उलझन ....

हर रिस्‍ता

जाने कितनी बार

मरता है

जाने कितनी बार

जन्‍म लेता है

कहीं गुबार उठता

मन में तो

उसकी आंख से

बहते हैं

जाने कितने आंसू

जिन्‍हें वह पोंछ देती है

आंखो की लालिमा

देती है गवाही

कितना बरसी हैं वह

पलकों का भारीपन

बतलाता है पीड़ा मन की

होठों का सूखापन

खामोश तड़प को बयां करता

किसी से

कह न पाने की पीड़ा

शायद जीवित रह जाये

यह रिस्‍ता

टूटने ना पाये

टूट गया तो

इसकी गिरह को

वह खोल नहीं पाएगी

कहना चाहकर भी

बहुत कुछ

बोल नहीं पाएगी ।

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009

एक दिये को दूजे दिये से ...


मनभावन हो देहरी तब

लीपा हो आंगन जब

चंचल चरण उनके

जाने ठहर जायें कब ।

मां लक्ष्‍मी के

आने की बेला पर

सजाना रंगोली द्वार पर

आई हैं वे तुम्‍हारे ही मनुहार पर ।

करना स्‍वागत उनका

संग परिवार के

तज के मन के

सारे अहंकार को ।

एक दिये को

दूजे दिये से

रौशन करना

चारों ओर

अंधकार का नाश हो

हर ओर प्रकाश ही प्रकाश हो ।


!! दीपावली की शुभकामनायें !!

बुधवार, 14 अक्टूबर 2009

दीपोत्‍सव मनाना है ....


फैलाने को उजाला

जला आज फिर

नन्‍हा दिया भी

उसकी लौ ने

खुशी से कहा

मैं साथ दूंगी

अपनी अन्तिम

सांस तक तुम्‍हारा

बस तुम विचलित

मत होना

हवा के झौके से

फैलाते रहना

अपना उजाला

बच्‍चे कभी

फुलझड़ी भी जलाएंगे

कभी वह बम की

लड़ी भी सुलगाएंगे

तुम डरना मत

जलते रहना

हमें भी रौशन होकर

आज दीपोत्‍सव मनाना है

जलकर भी पड़ता मुस्‍कराना है ।

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

किसी के कदमों तले .....

(1)

टूटा जब

पत्‍ता डाली से,

लिपट के रोया

माली से,

सांस अन्तिम

उसने ली

फिर न लौट पाया

डाली पे ।

सूखा पड़ा रहा

धरा में

कभी रौंदा गया

किसी के कदमों तले

कसक उठता मन

कुछ बचा था अंश

उसे उठा ले गई

एक दिन पवन

(2)

टूटकर गिरी

बिजलियां उस पर,

जो अंधेरे में

छुपकर बैठा था

उन्‍हें कुछ भी

न हुआ

जो तकते थे

गगन !

बुधवार, 23 सितंबर 2009

मां के सपने .....

सपने बुनते-बुनते,

आंखे थक सी गईं थीं

मां की कभी

वह कहती मेरा लाल

जल्‍दी से बड़ा हो जाए

फिर कहती

खूब पढ़-लिख जाए

लाल बड़ा भी हुआ

पढ़ लिख भी गया

मां की आंखो ने

फिर एक सपना बुना

अब यह कमाने लगे तो

मैं एक चांद सी

दुल्‍हन ले आऊं

इसके लिए

मैं डरने लगा था

सपनो से

कहीं

मैं

एक दिन

अलग न हो जाऊं

मां से

इन सपनों की वजह से

मां की दुल्‍हन भी

सपने लेकर आएगी

अपने साजन के

मैं किसकी

आंख में बसूंगा

किसके

सपने पूरे करूंगा ।

सोमवार, 31 अगस्त 2009

चन्‍द लकीरों से ....

आड़ी तिरछी

टूटी फूटी रेखाओं में

हथेली की जब

भाग्‍य रेखा

कहीं बीच में ही

कटी होती है

यह घोषित करती है

उसका दुर्भाग्‍य

तब वह बदलना चाहता है

उन लकीरों का अर्थ

अपने कर्म से

कहीं

जीवन रेखा

नजर आती जब

दो टुकड़ों में विभाजित

तब वह जीना चाहता

हर पल को

आत्‍मविश्‍वास से

इसी तरह एक

दिन बदल लेता वह

अपनी पूरी तकदीर

चन्‍द लकीरों से

वह लड़कर

विजयी होता विश्‍वास

के साथ

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

एक – एक फूल गूंथकर ...

जाने कब से बिखरी थी

मेरे चारों ओर तेरी यादें

जिन्‍हें समेटकर

मैं तुझे अपनी रूह में

बसाना चाहता था


जिनसे निकलकर

फिर तुम यूं जा ना सको

मुझे देकर तनहाई

मैं खुद के वजूद में,

उन यादों को

यूं गूंथना चाहता हूं

जैसे एक एक फूल गूंथकर

बनती है पूरी माला


जिसकी खुश्‍बू बस जाती है

अन्‍तर्मन में

यादों के साये में

मैं गुनगुनाना चाहता हूं

तुझे गीत की तरह

अपनाना चाहता हूं

संगीत की तरह जीवन में

बुधवार, 19 अगस्त 2009

टूटे हुए टुकड़े के करीब ...

उलझ गया आज,

मैं फिर तेरी यादों में

सोचा था

काट लूंगा बाकी जिन्‍दगी

तेरे वादों में

तनहां ये सफर

मुश्किल होगा अब


आज जाने कैसे,

कुछ किरचें

फिर मिल गईं

आपस में

हुईं टूटे हुए टुकड़े के करीब

जैसे कह रहीं हों

अब हम न एक होंगे

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

कितनी राखियों में से ...



यादें बचपन की

सताती हैं अब भी,

जाने कितनी राखियों में से,

खोज लाती थी राखी,

जो मन भायेगी

मेरे भाई को,

दिखलाती थी बड़े चाव से ।

अब भी ढूंढ कर लाती हूं राखी,

डालनी जो होती है लिफाफे में,

भेजनी होती है स्‍नेह के साथ,

कहीं रास्‍तें में,

उसकी सुन्‍दरता बिगड़ ना जाये,

उसके साथ बन्‍द करती हूं,

स्‍नेह, विश्‍वास, परम्‍परा,

रोकती हूं,

आंसुओं की बूंदो को,

लिफाफे पर लिखे,

पते पे गिरने से,

पहुंच जाये,

राखी के दिन तक भाई के पास ।

सोमवार, 3 अगस्त 2009

बच्‍चे ही तो मन के सच्‍चे हैं ...

बच्‍चे ही तो मन के सच्‍चे हैं

इनसे तो जो भी मिले

वो इनके लिये अच्‍छे हैं !


हर बात को शिरोधार्य करते,

सच्‍ची सीधी सादी बातों से,

सब का मन यह पुलकित करते

बुरा लगता जो किसी बात का

आंख में आंसू ले आते,

रोते-रोते उसको कहते जाते

तुम गंदे हो

मन में नहीं द्वेष ये रखते

बच्‍चे ही तो मन के सच्‍चे हैं !


ना लड़की से बुराई

ना लड़के से भलाई

बच्‍चों संग इ‍ठलाते इतराते,

पल में झगड़ा करते

पल में झगड़े फिर मिट जाते

बच्‍चे ही तो मन के सच्‍चे हैं !


लुका छिपी खेल,

बहुत है मन को भाता,

मिकी माउस मन को बड़ा लुभाता

बिटिया को गुडि़या है भाती,

बेटे को बैट बॉल है प्‍यारा,

मुझको तो इनका बपचन है भाता

बच्‍चे ही तो मन के सच्‍चे हैं

शनिवार, 1 अगस्त 2009

सितारों से नजदीकियां . . .

धरती को मां,

चांद को मामा

इन रिश्‍तों से

जिन्‍दा रखी

मुस्‍कराहट मैने ।


बदलियों में छुप जाता,

चांद जब भी

सितारों से नजदीकियां,

रखी मैने ।


रातें खामोशी की,

चादर ओढ़ लेती जब,

उजालों के लिए,

खिड़कियां खु‍ली

रखी मैने ।

ब्लॉग आर्काइव

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....