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शनिवार, 4 जुलाई 2009

यादों को समेट के आंचल में . . .

जाने कब से तरसती थी निगाहे,

तेरे एक दीदार को हमनशी मेरे ।

रूखसत हुआ जब से दिया नहीं,

कोई संदेश कभी ये हमनशी मेरे ।

तेरे जाने के बाद घर में सूनेपन,

के सिवा कुछ नहीं हमनशी मेरे ।

तेरी यादों को समेट के आंचल में,

ढक लेती हूं चेहरा हमनशी मेरे ।

लब खामोश, आंखों में विरह की,

छाया सदा साथ रही हमनशी मेरे ।

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....