जाने कब से तरसती थी निगाहे,
तेरे एक दीदार को हमनशी मेरे ।
रूखसत हुआ जब से दिया नहीं,
कोई संदेश कभी ये हमनशी मेरे ।
तेरे जाने के बाद घर में सूनेपन,
के सिवा कुछ नहीं हमनशी मेरे ।
ढक लेती हूं चेहरा हमनशी मेरे ।
छाया सदा साथ रही हमनशी मेरे ।
जाने कब से तरसती थी निगाहे,
तेरे एक दीदार को हमनशी मेरे ।
रूखसत हुआ जब से दिया नहीं,
कोई संदेश कभी ये हमनशी मेरे ।
तेरे जाने के बाद घर में सूनेपन,
के सिवा कुछ नहीं हमनशी मेरे ।
ढक लेती हूं चेहरा हमनशी मेरे ।
छाया सदा साथ रही हमनशी मेरे ।