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मंगलवार, 25 अगस्त 2009

एक – एक फूल गूंथकर ...

जाने कब से बिखरी थी

मेरे चारों ओर तेरी यादें

जिन्‍हें समेटकर

मैं तुझे अपनी रूह में

बसाना चाहता था


जिनसे निकलकर

फिर तुम यूं जा ना सको

मुझे देकर तनहाई

मैं खुद के वजूद में,

उन यादों को

यूं गूंथना चाहता हूं

जैसे एक एक फूल गूंथकर

बनती है पूरी माला


जिसकी खुश्‍बू बस जाती है

अन्‍तर्मन में

यादों के साये में

मैं गुनगुनाना चाहता हूं

तुझे गीत की तरह

अपनाना चाहता हूं

संगीत की तरह जीवन में

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....