जाने कब से बिखरी थी
मेरे चारों ओर तेरी यादें
जिन्हें समेटकर
मैं तुझे अपनी रूह में
बसाना चाहता था
जिनसे निकलकर
फिर तुम यूं जा ना सको
मुझे देकर तनहाई
मैं खुद के वजूद में,
उन यादों को
यूं गूंथना चाहता हूं
जैसे एक –एक फूल गूंथकर
बनती है पूरी माला
जिसकी खुश्बू बस जाती है
अन्तर्मन में
यादों के साये में
मैं गुनगुनाना चाहता हूं
तुझे गीत की तरह
अपनाना चाहता हूं
संगीत की तरह जीवन में
