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गुरुवार, 18 जून 2009

कानों को छू लिया कर . . .

ना बातें मुकद्दर की किया कर,

जो भी है तू हंस के जिया कर ।

जीने के हैं चार दिन इसी बात

पर ही अमल कर लिया कर ।

तेरे-मेरे की रूसवाईयों को छोड़,

सच्‍चाई से रूबरू हो लिया कर ।

झुका के सजदे में सर रब के,

आगे कानों को छू लिया कर ।

करनी कर के पछतावे जो कोई

तू ऐसे जुर्म से बच लिया कर ।

ये बातें गजल तो ना हुईं सदा तू

सीधी सच्‍ची बात समझ लिया कर ।

मंगलवार, 26 मई 2009

मन को मार कोई ना पाया . . .

मन की बातों को ना कर के वह खुश हो जाता,

अपने आप में सोचता मैने मन को जीत लिया ।

घड़ी दो घड़ी का भ्रम उसके जीवन में कटुता भरा,

कहता कैसे मन पर अपने ही यूं आघात कर लिया ।

मन की चंचलता का क्‍या है वह हमारी खुशी में खुश,

हमारे गम में दुखी जाने तूने फिर क्‍या जीत लिया ।

 मन को मार कोई ना पाया अरे तू तो उसका साया है,

समझा कर तुझको ये बातें उसने है तुझको जीत लिया ।

मन में है हर बात छुपी, आस, विश्‍वास, नेकी, और बदी,

कैसे सदा उसको ना कर कहता तू तूने उसे जीत लिया ।

शनिवार, 16 मई 2009

जगजाहिर हो जाता झूठ . . .

जिद मत किया कर छोटी-छोटी बातों की,
बन जाता है अफसाना इन छोटी बातों से ।

रूसवाई को जनम देते हैं जाने-अनजाने ये,
छिन जाती है खुशियां ही इन छोटी बातों से ।

दब जाती है उजली सच्‍चाई मन की मन में,
जगजाहिर हो जाता झूठ इन छोटी बातों से ।

जख्‍म गहरे वो जाने कब नासूर हो जाते हैं,
ताउम्र नहीं भरते उपजे जो इन छोटी बातों से ।

मुश्किलों का काम है आना और जाना तुझे तो,
खुद को बचाना है सदा इन छोटी-छोटी बातों से

मंगलवार, 12 मई 2009

कुछ भरम में रख . . .

मुझसे इस कदर दुश्मनी न कर की ,
दोस्ती से उठ जाए यकीं लोगो का ।

कुछ भरम में रख मुझे औरों को भी रहने दे,
मर न जाए ऐसी बातों से ज़मीर लोगों का ।

मैं कैसे मन लूँ नेक इंसान उस शख्स को,
जो समझता है ख़ुद को खुदा लोगों का ।

ये ठीक है तेरा ओहदा ऊँचा है हम सबसे,
बनाने में तुझे बड़ा, हाँथ है इन्ही लोगों का ।

हालात से इस तरह "सदा" मत कर समझौता
वरना हक़ मांगेगा कौन कमज़ोर लोगों का ।

शुक्रवार, 1 मई 2009

बदल जाए जो हालातों से . . .

उड़ के छू लूँ मैं गगन - कहता तो है हर एक मन,
हाँथ बढ़ा के छू ले - नहीं आदमी में अभी ये फ़न ।

एक मकाम जो मुझको पाना है,
खुशियों तुम्हे मेरे घर आना है ।

राह में कभी आयेंगी जो मुश्किलें,
ऐसे में बिल्कुल नही घबराना है ।

हौसला हो मन में गर कुछ करने का,
ऐसे में पड़ता तूफान से भी टकराना है ।

बदल जाए जो हालातों से वो क्या शख्स,
बदल दे जो हालातों को हमने उसे माना है ।

झुका है ना सर तेरा कभी ना ही झुकेगा,
इसे तो बस "सदा" रब के आगे ही झुकाना है ।




गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

बुलंद हैं इरादे . . .

हर कदम यूँ उठे की एक कदम
मेरी मंजिल और मेरे पास हो ।

डगमगाए जो कहीं मुश्किलों से कदम,
बुलंद हैं इरादे मन में ये अहसास हो ।

हर काम पहले आसां नहीं हुआ करता,
जीत होती है उसकी जिसे उसकी आस हो ।

सूरज सा जिसमे तेज, चाँद सी शीतलता हो,
साहस की डोर हाँथ में मन मैं विश्वास हो ।

कहते हैं "सदा" कुछ ख़ास करना है,
फिर क्यों डरूं जब विश्वास मेरे पास हो ।



बुधवार, 29 अप्रैल 2009

बंद करके मैंने जुगनुओं को . . .

अपना ही साया जब नजर नही आता आदमी को,
सोचता है वो तन्हाई के साये में कैसे जिया जाए ।

अंधेरे इस कदर मुझे तड़पा गए कि मैंने भी,
एक दिन ये ठाना अपने लिए कुछ किया जाए ।

मुठ्ठी में बंद करके मैंने जुगनुओं को सोचा,
कुछ देर ही सही मेरी तकदीर रौशन हो जाए ।

मेरी मुस्कान पल भर की देख बोले जुगनू भी,
होने वाली है अब तो सहर बोल क्या किया जाए ।

दिल्लगी पल दो पल के लिए "सदा" अच्छी है,
ताउम्र लगा के दिल ना किसी से जिया जाए ।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

देते रहे दस्तक वारिसशाह . . .

तेरी रूह जाने किस तन में जा समाई होगी,
अब भी शायद मन में कविता ही छाई होगी ।

तेरी कलम से निकला हर शब्द अमिट हो गया,
हर शब्द की चाहत में सिर्फ़ तू ही समाई होगी ।

कितनी नज्में लिखी कवियों ने याद में तेरी,
जाने कितनो ने अपनी महफिलें सजाई होगी ।

कोरे कागज पे रंग भरते तेरे अल्फाज़ जिनमें,
डूब के तूने रंगत ये निखरी हुई सी पाई होगी ।

तेरे ख्वाबों में "सदा" देते रहे दस्तक वारिसशाह,
किसी के ख्वाबों में अमृता तू भी तो आई होगी ।


सोमवार, 27 अप्रैल 2009

दुआ बददुआ बन जाती है . . .

ये न सोचना की दुआयें बेअसर होती हैं,

असर होता है इनका तो हर शय बेअसर होती है ।

न आजमाना कभी किसी की दुआ को वरना,

दुआ बद्दुआ बन जाती है तो कहर होती है ।

महफिले सजती रही, रातें जगमगाती रही,

कौन जाने किस पल आज किसकी सहर होती है ।

टूटते सपने जाने कितने, तो भी बनती नई आशाएं,

जाने कौन वो आशाएं, पूरी किस पहर होती हैं ।

मिलना और जुदा होना, सदा खेल है तकदीर का,

जिन्दगी है जो इन सब बातो से बेखबर होती है ।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

ऊंचे दरख्‍तों के साये में . . . .

कुछ भलाई के काम कर, औरों के काम आ,
नाम चट्‌टानों पे लिख कोई मशहूर नहीं होता ।

आंखों में बसने के संग सांसों में पला हो जो,
फ़कत कह देने से वह दिल से दूर नहीं होता ।

खुद से खफ़ा है तू औरों से खुश क्‍या होगा,
मायूस दिल हो गर तो चेहरे पे नूर नहीं होता ।

ऊंचे दरख्‍तों के साये में छांव, चाहे न लगे,
लेकिन ठंडी हवाओं से वो दूर नहीं होता ।

ख्‍वाहिशों के समन्‍दर में लगाता है गोता हर कोई,
हकीकत का मोती ‘सदा' हर मुठ्‌ठी में नहीं होता ।

सोमवार, 20 अप्रैल 2009

कोई मरहम नही रखता यहां . . . .

मुझसे पूछ तो मैं सच बतलाऊं तुझको लोगो के पास,
अपने दुख और दूसरों की ख़ुशियों का हिसाब होता है।

घाव पे किसी के कोई मरहम नही रखता यहां पर,
सब के पास बस अपने जख्मों का हिसाब होता है ।

कहने दे जिसे जो कहता है बुरा मत माना कर तू,
ऊपर वाला अच्छे-बुरे सबका हिसाब कर लेता है।

कोई किसी का खुदा नहीं होता मत डरा कर किसी से,
सबका मालिक तो एक है जो खुद हिसाब कर लेता है।

इंसान की फितरत है अच्छे दिन भूल जाता है अक्‍सर वो,
गर्दिश में जो दिन गुजरे ‘सदा' उनका हिसाब रख लेता है।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

हौसले हों गर बुलन्‍द . . .

बातें करता सागर की तो उसका दायरा बड़ा है,
तू नदी की बात कर, उसकी गोद में पला है।

मजबूत इरादों को बना, और खुद फौलाद बन,
तेरे साथ - साथ औरों का भी इसमें भला है।

जज्‍बाती होना अच्‍छी बात है, पर जज्‍बातों के,
साये में तो किसी का, जीवन नहीं चला है।

घबरा जाना, फिर किस्‍मत पे छोड़ देना सब कुछ,
ठीक है, कभी-कभी, पर सदा नहीं, तेरा भला है।

हौसले हो गर बुलन्‍द ‘सीमा' मेरी बात पे यकीं कर,
फिर कौन सा काम, कल पर किसी का टला है।

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

चांदनी से मुलाकात का . . . . .

शाम ने ढलते - ढलते दिया,
संदेश चुपके से रात का !

सितारो ने राज बतलाया,
चांदनी से मुलाकात का !

सात घोड़ों पे सवार सूरज्,
आया दिन की शुरुआत का !

लम्हा-लम्हा "सीमा" पल बीता,
समझाया मतलब हर बात का !

सब यूँ ही आते जाते रहते है,
रहा नहीं वक्त यूँ जज़्बात का !

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

चाहत नाम है वफ़ा का

नजर से नज़र मिलने का कसूर इतना ही होता है,
दीवारें कितनी भी उठाये कोई एतराज नही होता है !

आ गया जो दिल किसी पे तो क्या करेगे आप्,
इश्क को देखिये हुस्न का मोहताज नही होता है !

जोश, और जुनून का आलम होता है दिल में हरदम,
कदम कितना भी आहिस्ता उठे बेआवाज़ नहीं होता है !

चाहत नाम है वफ़ा का ये जज्बा नेमत है खुदा की,
छुपाये कोई कितना भी, पर ये राज़ नहीं होता है !

राजा रंक ना जाने ये, जात-पात ना माने ये, चाहत मै,
मानो तो कोई किसी का "सीमा" सरताज नहीं होता है !

sada

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

वादा क्योंकर किसी का टूट जाता है ‌. . .

कोशिशे अक्सर कामयाब होती हैं,
वादा क्योंकर किसी का टूट जाता है ‌!

घर याद होता है ना मंज़िल का पता,
जब दिल किसी का टूट जाता है !

दे के आवाज बुलाये चाहे कोई चाहे कितना,
हांथ जब हांथ से किसी का छूट जाता है !

फना हो जाती है यू ही जिंदगी एक दिन्,
रिश्ता साँस का जब साँस के टूट जाता है !

जतन कर जोड़े कोई कितना ही, नहीं जुड़ता,
ये माटी का खिलौना "सीमा" जो टूट जाता है !

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

बेखबर था वो खुदा की खुदाई से . . .

मेरी खामोशी का मतलब ये लगाया उसने,
डर गया हूँ मैं कत्लेआम इसतरह देख के !

बेखबर था वो खुदा की खुदाई से वरना,
मुस्कराता ना वो लोगों को रोते देख के !

गुजर जायेगा बुरा वक्त पोछ्ते हूये अश्क,
हमनशी ने कहा मुझे यूँ गमज़दा देख के !

नापाक उन इरादो को वतन के रखवालो ने,
किया खत्म अपनो को यूँ बंदिश में देख के !

में शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने की कुर्बान जिंदगी,
कई बेगानो को "सीमा" मौत के मुँह में देख के !

बेखौफ ही निकले दम मेरा

बेखौफ जिया था अब तक में इसलिए,
ख्वाहिश थी बेखौफ ही निकले दम मेरा !

निशाने पे में ख़ुद रहूँ या कोई ओर सच है,
ये उनसे लड़ने को सदा करेगा मन मेरा !

भय नही, डर नही, जां अपनी देने का,
कायम रहे ये चमन, यही था यतन मेरा !

आतंक रहेगा ना नामों निशा, रहेगी ये दास्ता,
लड़ने की जिस दिन "सीमा" ठानेगा वतन मेरा !

जो लड़े उनसे वो भी, किसी माँ के लाल थे,
कह गए रखना संभाल के यही है वतन मेरा !

बात जब होगी शहादत की नाम उनका आयेगा,
हर जुबा पे, उन रणबांकुरो को है नमन मेरा !

मंगलवार, 31 मार्च 2009

तकदीर कैद नही है . . . . .

ख्वाहिशे दर किनार कर दो सारी,
ज़ो खुशियो की जन्नत चाहते हो !

बंदिशे हटा दो जमाने की सारी ख़ुद से,
पल दो पल जो खुल के हंसना चाहते हो !

तकदीर कैद नही है हांथ की लकीरो मे,
कुछ कर के गर तुम दिखाना चाहते हो !

रूसवाइयों को दूर कर दो तहे दिल से,
मुस्कराहटे किसी की जो देखना चाहते हो !

विश्वास की पूँजी "सदा" अपने पास रख्नना,
सफलता जो अपने नाम करना चाहते हो !

ना तोड़ना दिल किसी का ये नादान होता है,
हर दुआ का हो असर गर ऐसा चाहते हो !

सोमवार, 30 मार्च 2009

कोख में पली हूँ नौ माह मैं भी तो माँ,

रस्म के नाम पर, रिवाज के नाम पर जाने,
कब तक होती रहेगी यूँ ही कुर्बान जिंदगी !

पोछ्कर अश्क अपनी आँख से, पूछती जब,
बेटी माँ से क्यों दी मुझे तूने ऐसी जिंदगी !

मेरा कोई दोष जो मुझे मिला ये कन्या जन्म्,
क्या दर्द, और वेदना बनके रहेगी ये जिंदगी !

तेरी कोख में पली हूँ नौ माह मैं भी तो माँ,
आ के धरा में करती हूँ मैं तेरी भी बंदगी !

माना की मैं पराई हूँ "सदा" से लोग कहते आये,
पीर मेरी समझ ली बिन कहे, तुमने दी जिंदगी !

तिरस्कृत हुई सहा अपमान भी मैंने, नहीं छोड़ा ,
फिर भी मैंने ईश्वर इसे, जो मिली मुझे जिंदगी !

दूँगी संदेश जन-जन को मैं, करूंगी सार्थक जीवन को,
अभिशाप नही वरदान अब बेटी बचाओ इसकी जिंदगी !

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....