शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

पंक्ति पूरी होने को प्‍यासी है ...

आज शब्‍दों में कुछ उदासी है,

पंक्ति पूरी होने को प्‍यासी है

टूटे लफ्ज जोड़ने को आतुर,

हर लम्‍हा बात जरा खासी है ।

कोई कुछ कहता कोई कुछ,

यह कितना ज्‍यादा बासी है ।

मन ही मन इतनी उलझन,

हर शब्‍द इसका ही वासी है ।

लिख दे आज तू इनकी व्‍यथा,

पढ़े कोई इनकी जो उदासी है ।

12 टिप्‍पणियां:

  1. लिख दे आज तू इनकी व्‍यथा,
    पढ़े कोई इनकी जो उदासी है ।

    सुन्दर सृजन - अच्छी रचना
    आभार

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  2. shabd aur unase mil kar bana bhav jo aapki kavita ke madhaym se samane aata hai behtareen hai..
    sundar kavita..badhayi..

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  3. टूटे लफ्ज जोड़ने को आतुर,
    सुन तो लो बात ये जरा सी है।
    बहुत सुन्दर गज़ल।
    बधाई!

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  4. बेहद खुबसूरत रचना ......बधाई

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  5. आज शब्‍दों में कुछ उदासी है,shabad bhi udaas hote hai....behad khoobsurat bhav...

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  6. पंक्ति पूरी होने को प्यासी है ...क्या बात है ..
    जल्दी पंक्तिया पूरी होने की बहुत शुभकामनायें ..!!

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  7. आज शब्‍दों में कुछ उदासी है,
    शब्द उदास होता है तो रचना बनती है
    बहुत खूब

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  8. मौन भी बहुत कुछ कह जाता है, रेखा चित्र से भी बहुत कुछ समझ लिया जाता है, पंक्ति अगर पूरी नहीं, तो ही तो जिज्ञासा में कयास ही तो खूबसूरत होते हैं,

    इस खुबसूरत सी रचना पर मेरी हार्दिक शुभकामनाएं.

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

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  9. आज से इस ब्लॉग पर आने को ये भूत भी राजी है,किसी को इस बात
    पर एतराजी है....????

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....