शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

जब मन हो मतवाला ....

विधि का विधान विधना ने कब है टाला,

उसके लिखे से मिले हर मुंह को निवाला ।

कर्म किये जा फल की इच्‍छा मत कर कहे,

तो सब पर होवे क्‍या जब मन हो मतवाला ।

सुख के सेवरे में दुख की काली रात छुपी,

घबराये न होनी से जो वही हिम्‍मतवाला ।

माला के फेर में मनवा मत पड़ना कहते,

जीते वही जिसने इसे सच्‍ची राह है डाला ।

माटी की देह माटी में मिल जाएगी किस,

अभिमान में तूने यह भरम मन में पाला ।

चूर होते हैं सपने टूटती आशाएं तब भी तेरे,

मन ने क्‍यों यह रोग इतने जतन से संभाला ।

9 टिप्‍पणियां:

  1. आपने बेहद खूबसूरत रचना रच डाला है..
    बधाई!!!

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  2. माटी की देह माटी में मिल जाएगी किस,
    अभिमान में तूने यह भरम मन में पाला ।
    कटु सत्य तो यही है हमे भरम मन मे रह्ता है और सत्य को स्वीकार नही करते --- अहम जो बाधक बन जाता है.
    बहुत सुन्दर

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  3. माटी की देह माटी में मिल जाएगी किस,
    अभिमान में तूने यह भरम मन में पाला .....
    इस सत्य को अगर सब पहचान लें तो जीवन सुखी हो जाए .......... सुन्दर रचना है .....

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  4. पूरी गीतबद्ध गीता हो गयी..बहुत प्रेरक!

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  5. खुबसूरत, प्रेरक, सन्देश परक इस बढ़िया कविता पर आपको ढेरों बधाइयाँ.
    मन प्रसन्न हो गया नवरात्री के इस पर्व में आपकी यह कविता पढ़ कर...............

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

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  6. sadaji...... maine ek sawaal poocha tha ki hum historu kyun padhte hain? uska jawab maine blog pe de diya hai......... plzzzzzzzzzzzzzzzzzz dekhiyega.............

    aur apna view dijiyega..... plz...

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....