कैसे बिखरे हैं आज शब्द
मन के आंगन में
मैं समेटती हूं
भावनाओं की अंजुरी में जब भी
ये दूर छिटक
मुझसे जाने कैसे - कैसे सवाल करते हैं
मैने कुछ नहीं छिपाया इनसे
सच कहा है सदा
सच को ही जिया है सदा
मेरा वज़ूद सच की
आंच से तप कर कुंदन हुआ
मन में कितना भी क्रंदन हुआ
पर नहीं तन कभी विचलित हुआ
है शिखर पर आज जो
होकर मुझसे ज़ुदा
कल वो मेरा ही साया थे
तुम ही कहो
साया भी कभी पराया होता है?
पर कैसे समझाऊं
किसको अपना मन दर्पण दिखलाऊं
इनके मन का भरम में
किस विधि मिटाऊं
.....
वक्त की साजि़शों का शिकार
जब भी कभी मन होता है
सच कहूं
बस अपनों से ही गिला होता है
एहसासों के मंदिर में
एक दिया विश्वास का जलता है
यही है वह दिया जो
हर तूफ़ान में
मेरी राहों का तम हरता है ...





