मंगलवार, 16 नवंबर 2010

एक नया दर्द .....








दर्द के रिश्‍ते में एक नया दर्द आ गया,

भूलकर हर दर्द जब भी मुस्‍कराना चाहा ।

आंखे ख्‍वाब सजा लेती एक नया फिर से,

जब भी मैने टूटा हुआ ख्‍वाब छुपाना चाहा ।

पलकों पे आंसू मोती बनके चमक उठते,

जब भी तुम्‍हें इस दिल ने भुलाना चाहा ।

लम्‍हे जुदाई के आते जब मुहब्‍बत में

जीने के बदले फक़त मर जाना चाहा ।

टूटे सपने, बहते आंसू, जुदाई के पल ले

यादों की गली से खामोश ही जाना चाहा ।

सोमवार, 1 नवंबर 2010

परख लूं ....





फासले आ गये,

मुहब्‍बत में कैसे,

जरूर

इक-दूसरे से

तुमने कुछ

छिपाया होगा …!!

भाग रही थी अपने आप से,

छुपा रही थी वह

खुद को

सवालों से

जिनका जवाब उसे पता था

पर वह बताकर

अपमान नहीं करना चाहती थी

अपने विश्‍वास का …!!

आंखे आंसुओं से सजल

हो उठती थीं जब

कोई कहता था

परख लूं तेरी प्रीत को …!!

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

स्‍वाद यादों का .....


(1)

स्‍वाद यादों का

चखी है तुमने

यादें

इनके स्‍वाद को

जाना है

कभी

मीठी याद

गुदगुदाती है मन को

फिर कभी कड़वी भी हो जाती है

कुछ खट्टी भी

लगती हैं

कभी बहुत बुरी हो जाती हैं

लगता हैं इन्‍हें

भूल जाओ

(2)

यादों का रंग

इनके रंग को जानना हो तो

इनके करीब जाना होता है

सफेद रंग

बिल्‍कुल शांत

सुर्ख लाल रंग

मुहब्‍बत से भरा हुआ

पीला रंग

दोस्‍ती लिये हुए

ऐसे ही होती है याद

जाने कितने रंगो में

सिमटी हुई ।

सोमवार, 20 सितंबर 2010

श्रृंगार हो जाती .....


बदल जाती हर सुबह
एक कली की जिंदगी,
वह खिलकर फूल बन जाती
कभी वह चढ़ा दी जाती
किसी देवता के चरणों में
कभी चढ़ा दी जाती
अर्थी पे
कहीं उसकी खुश्‍बू से
महक उठता
घर का कोना-कोना
कभी किसी के बालों का
श्रृंगार हो जाती
इक सुबह‍ आती ऐसी भी
उतार दी जाती
देवता के चरणों से
बिखर जाती किसी के जुल्‍फों में
सजी उसकी पंखड़ी
और अंत हो जाता उसका
सदा के लिए !!

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

दौर मुश्किल है .....







नहीं लगता कोई अपना आजकल,

सबका मन हुआ अपना आजकल ।

पराये हो जाते हैं मां-बाप भी अब,

घर में दुल्‍हन के आने से आजकल ।

जन्‍म दिया, पालन पोषण किया ये,

सब करते हैं कहते बच्‍चे आजकल ।

सब कुछ करो आप, मन की करने दो,

बस उम्‍मीद मत करो कहते आजकल ।

रूसवाई से डरे जमाने में कुछ न कहा,

हर घर के हालात एक से हैं आजकल ।

बुजुर्गों की नसीहतें बुरी लगती हैं जबसे,

कुछ भी कहने से डरते हैं यह आजकल ।

दौर मुश्किल है, हर रिश्‍तें में फासला है,

काम से वक्‍त नहीं मिलता बस आजकल ।

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....