मंगलवार, 7 सितंबर 2010

दौर मुश्किल है .....







नहीं लगता कोई अपना आजकल,

सबका मन हुआ अपना आजकल ।

पराये हो जाते हैं मां-बाप भी अब,

घर में दुल्‍हन के आने से आजकल ।

जन्‍म दिया, पालन पोषण किया ये,

सब करते हैं कहते बच्‍चे आजकल ।

सब कुछ करो आप, मन की करने दो,

बस उम्‍मीद मत करो कहते आजकल ।

रूसवाई से डरे जमाने में कुछ न कहा,

हर घर के हालात एक से हैं आजकल ।

बुजुर्गों की नसीहतें बुरी लगती हैं जबसे,

कुछ भी कहने से डरते हैं यह आजकल ।

दौर मुश्किल है, हर रिश्‍तें में फासला है,

काम से वक्‍त नहीं मिलता बस आजकल ।

20 टिप्‍पणियां:

  1. Kitna sahi kaha aapne! Rishton me meelon,sadiyon ke faasle hain!

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  2. सब कुछ करो बस उमीद मत करो यही सुखी जीवन का मन्त्र है बहुत अच्छी लगी कविता। बधाई।है।

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  3. बहुत खूब सदा जी , शुरू की चार पंक्तिया अति प्रभावी लगी !

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  4. हमारी बदली प्राथमिकताओं ने बुनियादी मूल्यों पर भी चोट किए हैं। हमसे ऐसा बहुत कुछ छिनता जा रहा है,जो शुद्ध रूप में भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है।

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  5. आज का सच अब सबके सामने है फिर हर कोई मजबूर है

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  6. आज का सच लिख दिया है ...घर बाहर बस डर कर रहो आज कल ..

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  7. कुछ बहुत ही यथार्थ से परिचित करा रही है आपकी रचना ... हर शेर सत्य बयान कर रहा है ... रोज़मर्रा में देखते हैं इस सत्य को ... बहुत अच्छा लिखा है ...

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  8. you have brought out a hard hitting fact of present society, where scope of family is getting fragmented every passing day.Congratulations for writing such a nice poem.

    PIYUSH TIWARI
    REWA

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  9. आजकल के परिवारों का सच उकेर कर रख दिया आपने अपने असरदार शब्दों से.

    हर पल होंठों पे बसते हो, “अनामिका” पर, ... देखिए

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  10. आपको एवं आपके परिवार को गणेश चतुर्थी की शुभकामनायें ! भगवान श्री गणेश आपको एवं आपके परिवार को सुख-स्मृद्धि प्रदान करें !
    बहुत खूब !

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  11. आज की जिंदगी का सच तो यही है ....
    जो धीरे धीरे और कड़वा होता जा रहा है .....
    हकीकत बयां करती रचना .....

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  12. ये भी एक कडवी सच्चाई है आज की पीढ़ी की ......
    पहले से ही उम्मीद न पाली जाये तो अच्छा है ......
    नज़्म के पीछे कोई गहरी उदासी छिपी है .....!!

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....