शुक्रवार, 12 जून 2009

खेल खेलती किस्‍मत भी रूपयों का . . .

एक श्रमिक अपने लिये ऐसा सोचता है कि सारी उम्र उसे श्रम ही करना है उसके लिये ना तो विश्राम है ना ही पल भर के लिये आराम, यहां तक कि जीवन के अन्तिम दिनों में भी जब वह बोझ उठाने के काबिल नहीं रह जाता तो पेट भरने के लिये वो पत्‍थर तोड़ने जैसे काम करता है परन्‍तु आराम वह कभी नहीं कर पाता, वह क्‍या कुछ ऐसा महसूस नहीं करता . . .

मेहनत और लगन से काम करो तो,

कहते हैं किस्‍मत भी साथ देती है ।

कितनी की मेहनत, कितना बहा पसीना,

क्‍यों नहीं किस्‍मत मजदूर का साथ देती है ।

खेल खेलती किस्‍मत भी रूपयों का तभी तो

अमीर को धनी गरीब को ऋणी कर देती है ।

छोटी-छोटी चाहत छोटेछोटे सपने सब हैं,

अधूरे ये बातें तो जीना मुश्किल कर देती हैं ।

श्रमिक के जीवन की किस्‍मत ही मेहनत है,

श्रम करते हुए ही जीवन का अंत कर देती है ।

फिर भी वह होठों पर सदा मुस्‍कान ही रखता,

यही बात उसके जीवन में बस रंग भर देती है ।

3 टिप्‍पणियां:

  1. जाहिर है कि किस्मत से कोई लेना देना नहीं है, वज़हें कुछ और ही हैं।

    सोचते रहिए।

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  2. श्रमिक के जीवन की किस्‍मत ही मेहनत है,
    श्रम करते हुए ही जीवन का अंत कर देती है

    श्रम करते हुवे अंत समय आये ये तो अच्छी बात है............. बिमारी फिर लम्बी बीमारी तो अपने आप में ही अंत है ........ इसलिए श्रम की आदत सबको होनी चाहिए.......... श्रमिक सबको होना चाहिए

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....