मंगलवार, 9 जून 2009

अपनों से अपनों का पता . . .

रिश्‍ते क्‍यों आज कल तनहाई मांगने लगे हैं,

लोग अपनों से अपनों का पता पूछने लगे हैं ।

लगाकर गले से बेगानों को अपनों की पीठ में,

हांथ मतलब का बस जब देखो फेरने लगे हैं

बनाने में अपना किसी को जब अपना कोई छूटे,

क्‍यों ऐसे ही रिश्‍ते आंगन में अपने जुटाने लगे हैं ।

लहू के रिश्‍ते बेनामी बन गये इसकदर क्‍या कहें

अपनों से मिलकर अब तो नजरें चुराने लगे हैं ।

फासले दिलों में हो गये इतनी दूरियां बढ़ गईं

म‍हफिल में सदा बचकर निकल जाने लगे हैं ।

5 टिप्‍पणियां:

  1. लहू के रिश्‍ते बेनामी बन गये इसकदर क्‍या कहें
    अपनों से मिलकर अब तो नजरें चुराने लगे हैं

    जिन रिश्तों में प्यार की खुशबू नहीं होती वो अक्सर इसे ही होते हैं.................
    लाजवाब लिखा है आपने

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  2. rishtey ajkal hote hi kahan hain sirf wakti jaroorat hoti hain jopoori hone par sabko bhula diya jata hai.

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  3. वंदना जी, आपने बिलकुल सही कहा है कि आजकल रिस्‍ते जरूरत के मुताबिक ही रह गये हैं . . .

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  4. बहुत सुन्दर भाव हैं।बधाई स्वीकारें।

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  5. aaj aapki saari kavitayen padhi .. aap bahut accha likhti hai .saari kavitao me bhaavo ki abhivyakti bahut hi shaandar tareeke se ho rahi hai ...shabdo ka asar dil me gahre utar jaata hai..is kavita me aapne pyaar ke different shades ko kitne asardaar tareeke se darshaya hai ...

    aapko badhai ...

    meri nayi poem " tera chale jaana " par apni bahumulay rai dijiyenga ..
    http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html


    aabhar

    vijay

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....