सोमवार, 4 मई 2009

आंखों में नमी . . .


वफ़ा की चाहत में हम भटके थे बहुत,

मिली जो बन के मुहब्बत तो रास न आई ।


दर्द लिए जुदाई का बहुत दूर चले जाना चाहा,

तमन्ना थी जो मौत की तो पास ना आई ।


रहे तन्हा जिन्दगी का सफर कटा अकेले ही,

जब तक जियेंगे रहेगी साथ मेरी तन्हाई ।


राहे शौक में गर कदम मेरे डगमगाते न,

सच कहें होते ना तेरे हम यूँ तमन्नाई ।


हाले दिल सोचा जब भी "सदा" तुमको बताना,

फकत लबों पे दर्द आँखों में नमी थी उभर आई ।


4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह....
    क्या खूब लिखा है आपने...

    "मिली जो बन के मुहब्बत तो रास न आई ।"

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  2. एक बात और कहूँगा ये शब्द पुष्टिकरण हटा दीजिये...

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  3. हाले दिल सोचा जब भी "सदा" तुमको बताना,
    फकत लबों पे दर्द आँखों में नमी थी उभर आई ।
    बहुत संजीदा कलाम है आपका...जिन्दाकी की खुशियों पर भी तो लिखिए...फिर भी बहुत खूब कहा है आपने...बधाई...
    नीरज

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....