शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

एक जिन्‍दगी ....










वो जाने क्‍यों

होने लगी कमजोर

मुहब्‍बत का उस पर

असर होने लगा,

सामने होने पर

जिसको न देखा

नजर उठा के,

निगाहें

उसके आने का

रस्‍ता तकने लगी

बातें करती सांसे आपस में

जब तेज-तेज

वह खुद की

हालत से डरने लगी

कैसे बता पाएगी

इन पलों की सरगोशियां

ख्‍यालों के तसव्‍वुर

पे उस अजनबी चेहरे का छा जाना

हौले-हौले होठों का कंपकपाना

छिपा के हथेलियों में चेहरा

फिर मुस्‍कराना,

जैसे एक जिन्‍दगी

का जीकर हर पल खुशी-खुशी

गुजर जाना ।

सोमवार, 11 जनवरी 2010

दर्द ...


दर्द आज

बयां करना चाहता था

अपनी पीड़ा को

जो उसे असहाय कर चली थी

जब से वह

उसके भीतर पली थी

चिंता के साथ

घुल रही थी उसकी हड्डियां भीं

उसके रोम छिद्र

सिहर उठते उसकी चुभन से

आंसुओ के वेग में

निशब्‍द मौन खड़ा वह

होठों को भींचकर

देखता उसकी जड़ता को

हठीली मुस्‍कान पपड़ाये हुये होठों पर

सफेद धारियों में

रक्‍त की लालिमा लाकर

उसे मन ही मन कुंठित करती

आज पूरे वेग से

वह झटकना चाहता था

गुजरना चाहता था हद के परे

हताशा और निराशा के

पकड़ना चाहता था

आस की एक नन्‍हीं किरण

जो इस दर्द का अंत कर सकती थी

शनिवार, 2 जनवरी 2010

पहला दिन .....






सूरज को सोने दो,

उसको गढ़ना है एक दिन नया,

हौले से कहकर चांद ने

सितारों को जगाया

चांदनी निखर निखर उठी

बदलियों में छिपा

चांद जब निकलकर आया

कल नये साल का

पहला दिन निकलना था

नववर्ष की बधाई देने वालों का

शुक्रिया अदा भी तो करना था ......

‘‘ नववर्ष की शुभकामनायें ’’



मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

आगमन नये साल का ....


पल-पल वक्‍त के साथ कदम मिला के चल,

ठहरता नहीं यहां किसी के लिये कोई भी पल ।

बीते वक्‍त की बातों से सीख लेना सदा ही,

जाने वाला लम्‍हा लौटेगा नहीं, वो होगा कल ।

नया पल, नया दिन लेकर आ रहा है ये साल,

नया, मुस्‍करा के जरा इसका स्‍वागत करें चल ।

भूल के गिला-शिकवा दोस्‍तों से मिल के बांटो,

खुशी, मुबारक हो साल नया दो दुआ इस पल ।

आएंगी बहारें खुद चमन में मुस्‍कराते हुये मिलोगे,

महकेगा आंगन फूलों की खुश्‍बू से तेरा हर पल ।

वादा करें तो तोड़े नहीं, अपनों को साथ लें हम,

उम्‍मीद का दामन कभी छूटे न किसी भी पल ।

आगमन नये साल का, विदा करना हर साल एक,

नये साल को, फिर सजाना आने वाला नया कल !

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

शब्‍द और पंक्तियां जो ....




कागज उजला है फिर भी निखरा नहीं है वह,

कलम उदास पड़ी है कागज के एक कोने में,

उसमें निखार आएगा जब सार्थक अक्षर उसपे,

कलम उतारेगी अपनी नोक से हर एक कोने में ।

किसी का प्रेम, किसी की खुशी, किसी का गम,

बांटती कलम, कभी साझा करती दर्द एक कोने में ।

इसे बहुत ही भाते अक्षर, शब्‍द और पंक्तियां जो,

लिखकर रच देते इतिहास ये रहता सबको संजोने में ।

आड़ी-तिरछी लकीरें जब बच्‍चे खींचकर खुश होते,

इस पर तो यह भी मुस्‍काता संग उनके खुश होने में

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....