शनिवार, 23 जून 2012

ये जमा पूँजी ... !!!

मन आज अकेला नहीं
रहना चाहता
वह खोज रहा है अपनी टोली
कुछ शैतानियां कुछ जिज्ञासाओं को
अपने काँधे पे बिठाकर
आ बैठा आंगन में 
यादों की गुल्‍लक को सीने से लगाये
जिसमें डाले थे कभी कुछ पल
हँसी के कुछ अपनेपन के
कुछ कीमती लम्‍हे थे
तुम्‍हारे साथ बिताये हुए
ये जमा पूँजी सम्‍बंधों की स्‍नेहवत
मैने तुम्‍हारे कहने पर ही
सिंचित की थी
...
आओ तुम भी शामिल हो जाओ
मेरी इस टोली में
तुम्‍हारी शैतानियां मेरी शै‍तानियों के
कान खींचती हैं तो
दर्द में भी एक मुस्‍कान होती है
फिर तुम्‍हे तंग करने का
मौका कैसे जाने दूँ
आज मैं टोली के साथ हूँ
बस एक कमी है
वो तुम्‍हारे आने से दूर हो जाएगी
...

गुरुवार, 21 जून 2012

मन का सच्‍चा होना !!!














कुछ शब्‍द बड़े - बड़े अर्थों के साथ
अपनी आकांक्षाओं की सीढिंयां चढ़ते हुए जब
मन के आंगन में एक पंक्ति की रचना करते
मन मंद - मंद मुस्‍कराता
अगली पंक्ति के शब्‍दों को सीढि़यां चढ़ते देखता
तभी जाने कोई एक ख्‍याल तुम्‍हारा
हिला देता सी‍ढ़ी को
सारे के सारे शब्‍द एक दूसरे के ऊपर
भरभराकर गिर पड़ते
पंक्ति अधूरी रह जाती इस अधूरे पन को
समझ पाना सबके लिए संभव नहीं
जब तक सृजन न किया हो उसने
रची न गई हो कोई रचना उसके द्वारा
भला उसका बिखरना कैसे समझ सकता है वो!
....
सृजन में नेह भी है और स्‍नेह भी
त्‍याग के संग समर्पण भी
आकार भी है इक विचार भी
पीड़ा भी है अभिलाषा भी
आस्‍था के धरातल पर
विश्‍वास का अम्‍बर भी
संस्‍कृति के परिधानों में
छिपी हुई मन की परतों को
उकेरता है बिंदु दर बिंदु
सत्‍य कहता कभी झकझोरता
परखता कसौटी पर शब्‍दों को
ह्रदय की कठोरता को आंकता
तोलता वक्‍़त की तुला पर जब !!
....
बड़ी बेबाक़ी से
भाषा समृद्ध होती सगर्व़
मुस्‍कराती स्‍नेह से
तुम ही तो कहते हो
भाषा कोई भी हो शब्‍दों का
अपना एक जा़दुई संसार होता है
जिसे समझने के लिए
मन का सच्‍चा होना बहुत जरूरी होता है !!!

सोमवार, 18 जून 2012

मैं बेनका़ब हो जाऊँ ... !!!

कभी भी टांग देना खुद को
उदासी की खूंटी पर
हँसी का पर्दा लगाकर
कसकती आत्‍मा
पर्दे के भीतर
टोह लेती रही
आते-जाते चेहरों का
सच पढ़ती
और मायूस हो
दुआ करती
बस एक बार
जोर की आंधी आ जाए
और मैं बेनका़ब हो जाऊँ
...

शुक्रवार, 15 जून 2012

कफ़न में लिपटी मुहब्‍बत

कतरा-कतरा मुहब्‍बत ने जब दम तोड़ा
नफ़रत की दहलीज़ पे
मत पूछ मेरे क़ातिल किस तरह
फिर मैं मुहब्‍बत के ज़नाज़े में
शामिल हुई
...

बेवफ़ाई शिक़ायत फ़रेब बेक़सी
चार कांधे उसको मिले
बेगानों से
परायेपन के कफ़न में लिपटी मुहब्‍बत
दुआओं के फ़ूलो को तरसती हुई
दफ़न हो गई
बददुआ की खाक़ पर

बुधवार, 13 जून 2012

रिश्‍ता कोई भी हो !!!


















मस्तिष्‍क कोई उपजाऊ भूमि नहीं
जहां एक शब्‍द के बदले में
तुम पा सकोगे अनेक शब्‍द
प्रत्‍येक शब्‍द की उपज के लिए
मस्तिष्‍क को दिल के रास्‍ते
रूह तक पहुंचना होता है
समेटना होता है
कितने ही अर्थों में हर शब्‍द के भाव को
विचार मन की सम्‍पत्ति है
जो पनपते हैं पोषित होते हैं
और पल्‍लवित होते हैं
हमारे संस्‍कारों से
....
विचार भी बीज की तरह हैं
जो शब्‍दो से पनपते हैं
समेटते हैं भावनाओं को
बनाते हैं एक रिश्‍ता
रूह से रूह का
मन को संयम का
पाठ पढ़ाते हुए  सिखाते हैं
उंगली पकड़कर चलना
....
रिश्‍ता कोई भी हो
वो यूँ ही किसी की परवाह नहीं करता
रिश्‍तों का पालन-पोषण
करने के लिए
दिल के दरवाजे पर
दस्‍तक़ देनी होती है 
क्‍यूँ कि तुम ही तो कहते हो
रिश्‍ते दिमाग का नहीं
दिल का मामला होते हैं !!!

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....