सोमवार, 11 जून 2012

जिसका कवच तुम हो ... !!!












विचारों की भीड़ में गुम
ढूंढती हूँ एक ऐसा विचार
जो तुम्‍हारी तरह
मजबूत हो
जिसका नाम लेते ही
हर कमजोर हौसला जी उठे
एक नई ताकत लेकर
.....
मजबूती ही नहीं है तुम्‍हारे पास
अदम्‍य साहस की भी धनी हो तुम
मैने देखा है जाने कितने ही
कमजोर पलों को
जीवनदान देते हुए तुम्‍हें !!
...
जिन्‍दगी जब भी कभी खुद से हैरान हो
सवाल करती है ढेरो
तब तुम देती हो दिशा एक नई उसे
विचलित होता है मन जब भी
समझाती हो उसे
परिस्थितियां जब भी अनुकूल नहीं होती हैं
तुम दिखलाती हो
नदी के ठहरे हुए पानी को
ठहराव में ही एकत्र होते हैं
झांड़-झंकाड़ और गंदगी
ठहरना क्‍यूँ ??
सतत् बहते रहने में ही जीवन का सार है
आओ आगे बढ़ो मेरे साथ
उंगली पकड़ चल पड़ती हो
मार्गदर्शक की तरह ...
....
तुम रोज सुबह
हम सबके चेहरे पर
एक मुस्‍कान देती हो विश्‍वास की
स्‍नेह की रेखा को  खींचती हो
अपनी मजबूत उंगलियों से
इस छोर से लेकर उस छोर तक
तभी तो हम सब
बंधे हुए हैं इस एक ही सूत्र में
जिसका कवच तुम हो
कहो तो कौन हमें
विलग कर सकता है ... !!!

शुक्रवार, 8 जून 2012

एक विस्‍तृत आकाश है ... !!!














मेरे पास तुम्‍हारी सोच का
एक विस्‍तृत आकाश है
जो मुझे कहीं भी
डगमगाने नहीं देता
मुझे उड़ने का हौसला देकर
मेरे पंखों को सहलाता है जब भी
मुझे ऊंचाईयों से भय नहीं लगता
तुम साथ - साथ उड़ती हो
बन के हवा जब मेरे नन्‍हें पंख
शिथिल होने को होते
तुम मेरे कानों में
आकर चुपके से कहती
देखो तो मंजिल कितनी पास है
क्‍यूँ घबराना
हम पहुँच गए हैं अब तो विजय द्वार पर
...
हारने का तो प्रश्‍न ही नहीं
तुम्‍हें आज मैं एक सच बतलाती हूँ
हार को लोग नहीं देखते
लोग सिर्फ विजय का स्‍वागत करते हैं
पराजय का सामना तो सिर्फ
मन करता है और मस्तिष्‍क लड़ता है
वक्‍़त कभी भी बुरा नहीं होता
वो तो सबके लिए एक समान होता है
बुरे तो हालात होते हैं
....
तुमने देखा है न कच्‍ची मिट्टी को
पानी पड़ते ही कैसे घुल जाती है
पानी के साथ बह जाती है
लेकिन उसी मिट्टी के घड़े में
पानी कितने दिनों तक  सुरक्षित रहता है
क्‍यूँ कि वह आग पर पकाया हुआ होता है
जो जितना तपता है उतना ही कुंदन होता है
हर कसौटी पर  खरा उतरता है
चाहे तुम उसे फिर कितना भी परख़ लो ...  !!!
...

बुधवार, 6 जून 2012

'' तुम मेरी जिन्‍दगी हो ''














तर्जनी और मध्‍यमा के साथ
अंगूठे के पोर में
सिमटी कलम कागज के साथ
खेलना चाहती है
कहना चाहती है कोई नया शब्‍द
जो तुम तक पहुंच कर
हिला दे तुम्‍हारे अन्‍तर्मन को
...
कभी हँसी का प्रतीक बना
तुम्‍हारे चेहरे की कल्‍पना करती
और मुस्‍करा देती मन ही मन
कभी लिखती ... नहीं समझे !
और फिर खुद ही
हँस देती ... जब कहूँगी
तब तो कुछ समझोगे ...
....
विस्मित सा कागज !! सोचता रहा
बड़ी देर तक
क्‍या कहना है
क्‍या समझना है
भला मैं क्‍या जानूँ कुछ लिखो तो
कोई शब्‍द जिसके अर्थ गहरे हों
भले उस पर लाख पहरे हों
तभी उसने देखा
कितनी आत्‍मीयता से उसने
लिखा था ये
'' तुम मेरी जिन्‍दगी हो ''
और मुझे त़ह कर रख दिया
डायरी के बीचो बीच
कलम का ठहरना  कागज का सिमटना
ये त़य कर चुका था
अब शेष नहीं कुछ कहने को .... !!!

सोमवार, 4 जून 2012

ताकि शंखनाद कर सकूँ !!!


















मैने आज कोई फूल
किसी देवता के
श्रीचरणों पर नहीं चढ़ाया
ना ही किया है मंत्रोच्‍चार
ना ही किया किसी देव प्रतिमा के आगे
अगर का धुंआ
बांधे नहीं वंदनवार श्रद्धा के
तेरा तुझको अर्पण की भावना  ने
मन की हर आराधना को जाने क्‍यूँ
विरक्‍त कर दिया है
...
हाँ ये और बात है  कि
तुम्‍हारे चेहरे पर अब भी
मंद मुस्‍कान कायम है
तुम अपना प्रतिबिम्‍ब मेरी
आंखों में बहते अश्‍कों के बीच
अब भी देख पा रहे हो
मेरी जिजीविषा ने
हर कमज़ोर पल में
तुम्‍हारे समक्ष खड़े होकर
विजय यात्रा का आ‍ह्वान किया है
जब भी ..
तुम्‍हारी बंसी की
मधुर ध्‍वनि गूंजी है मेरे कानों में
बस उसी क्षण मैने जाना
केवल तुम ही मेरा संबल हो
लेकिन उससे पहले
तुम चाहते थे यही
मैं अभिषेक कर लूं भावनाओं के
अश्रुजल से तुम्‍हारा
आत्‍मबल का भी ले लूँ सहारा
ताकि शंखनाद कर सकूँ
मन के जीते जीत है मन के हारे हार
विश्‍वास का दीपक प्रज्‍जवलित करने से
पहले तुम्‍हारी मुस्‍कान को
मैं अपना आशीष मान लूँ ... !!!

शुक्रवार, 1 जून 2012

तुम मानो या नहीं ...!!!














तुम मानो या नहीं
पर कोई तो है सर्वशक्तिमान
जो सबल बनाता है निर्बल को
तुम्‍हारी हर आवाज़ को सुनता है
पलटकर जवाब भी देता है
तुम समझ पाओ या नहीं
देख पाओ या नहीं
पर कोई तो है ... 
कभी देखा है तुमने
काई पर चलकर जिसपर चलते हुए
यह जानते हो कि फिसलन है यहां
पर कितनी मजबूती से तुम्‍हारे
कदम पड़ते हैं काई पर
कोई तो है ...
जो देता है मजबूती ...
पराजय को विजय के द्वार पर ले जाने की शक्ति
सर्वशक्तिमान के सिवाय किसी के पास नहीं ये
...
जीवन और मृत्‍यु से परे
अनश्‍वर आत्‍मा ''एकोsहम् द्वितीयोनास्ति''
जगत और जीवात्‍मा के कथन को सिद्ध
करती ... प्रत्‍येक कदम पर
जीवन दर्शन दिखलाती
कभी मन का संताप बनती
कभी ह्रदय का उल्‍लास बनती
कर्तव्‍य का बोध कराती
कभी बांधती मर्यादाओं में
कभी बनती तुम्‍हारी हथेली में
तक़दीर की कोई रेखा
बताओ किसने देखा है तन की
इस सूक्ष्‍मता को
जो हर प्राणी के शरीर में
सर्वशक्तिमान होकर विराज़मान है
अदृश्‍य होकर भी वह
कण-कण में समाहित है
तुम मानो या नहीं पर कोई तो है ...

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....