सोमवार, 13 जून 2011

दुआ ....











मैने
दुआ के वास्‍ते जब भी अपने हांथ उठाये हैं,
मेरी बंद पलकों में तेरे ही साये उतर आये हैं ।

मेरी फितरत में नहीं खुद की खुशी मांगना,
मैने गैरों के गम में अपने अश्‍क बहाये हैं ।

मेरे हंसने पे ऐतराज़ वो करते रहे जाने क्‍यूं,
जिनकी ख़ातिर मैने सदा हर ज़ख्‍म खाये हैं ।

रिश्‍तों की उम्र लम्‍बी होती है किसने कहा,
जाने कितने जीवनदान हर रिश्‍ते ने पाये हैं ।

दरो-दिवार में सिमटती रही जिन्‍दगी जिनकी,
उनसे पूछा शहर का हाल तो बस मुस्‍कराये हैं ।

मंगलवार, 7 जून 2011

प्‍यार तो ....








किसी से प्‍यार करना,

फिर उसपर खुद से ज्‍यादा

ऐतबार करना

कैसे किसी के लिये

यूं बेकरार हो जाना

भरी महफि़ल में तन्‍हां हो जाना

कभी तसव्‍वुर... कभी इंतजार

कभी बेरूखी प्‍यार की

सब बातों से परे

हसरत बस एक दीदार की

शिकायतें हजार हों प्‍यार में

फिर भी जाने क्‍यों ..

औरों के मुंह से शिकायत सुनना

नहीं भाता है कभी उसके लिये

आप जिये जा रहो

जिसके बिन ...

या जिसके साथ ...जिसके लिये

प्‍यार तो बस प्‍यार है

इसपर किसी का

ना हुआ अख्तियार है

बारिश की बूंदो सा

प्‍यार का अहसास

जैसे बहती हो नदिया

हिमशिखरों के पास

प्‍यार के अंक में

गहराई है

धरती पे देखो

अम्‍बर का साया

सारी सृष्टि इसमें समाई है ...।

गुरुवार, 2 जून 2011

शब्‍द हथियार मेरे हैं ...













मैं
चल दिया करता जब भी अमन की राह पे,
हर कदम पे अपने दुश्‍मन तैयार करता था ।

पूछा करता था उनसे ही फिर भी मैं हंसकर,
यारो बताओ तुम्‍हारा क्‍या लिया करता था ।

फासले दिलों के मिटा कर नजदीकियां लाया,
बस इक यही गुनाह मैं सरेआम करता था ।

मेरी कलम के शब्‍द हथियार मेरे हैं जिनसे मैं,
खामोश रह कर भी वार कर लिया करता था ।

सत्‍य की लड़ाई लड़ता हूं तो क्‍या गुनाह भला,
अपने सर बांध के कफ़न ही निकला करता था ।

गुरुवार, 19 मई 2011

परिक्रमा ....











कविता संग्रह परिक्रमा जिसके रचनाकार हैं बेहद सहज एवं सरल व्‍यक्तित्‍व के धनी आदरणीय सुमन सिन्हा जी ब्‍लॉग जगत में भी इनकी रचनाओं को काफी सराहा गया है इनका यह पहला काव्‍य संग्रह है जिसका विमोचन हाल ही में हिन्‍द युग्‍म के सौजन्‍य से सम्‍पन्‍न हुआ।

परिक्रमा पढ़ते हुए यदि कभी आपको यह लगे कि आप गीता का पाठ कर रहे हैं या महाभारत का अध्‍ययन तो यह रचनाकार की कलम का ओज है जो मुखर हो कभी राधा का सम्‍मान करेगा या कृष्‍ण की बांसुरी की तरह प्रत्‍येक शब्‍द पर माधुर्य बरसाएगा अपने पराये के भावों से मुक्‍त आत्‍ममंथन करते हुए....कृष्‍ण को बखूबी गुना है उन्‍होंने अपनी रचनाओं में,

इस पुस्‍तक का संपादन किया साहित्‍य एवं ब्‍लॉग जगत की चिर-परिचित लेखिका आदरणीय रश्मि प्रभा जी ने जिनके संयोजन का जादू आप परिक्रमा को पढ़ने के बाद ही जान पाएंगे ....

परिक्रमा की शुरूआत होती है लक्ष्‍य साधना से कितनी अद्भुत सोच है रचनाकार की हर रचना इनके शब्‍द पा जीवंत हो उठी है . मन के तार तार झंकृत हो उठते हैं जहां पर इन्होंने कहा है ...

न्‍याय के लिए मैं सारथी हो सकता हूं,

तो अर्जुन

तुम्‍हें बस यह गांडीव उठाना है

और लक्ष्‍य साधना है’’

और फिर आगे बढ़कर आपने गुलमर्ग बनाने के लिये परिवर्तन की बात कही है ....

पानी खाद के लिए

तो सहज हो गया है कैक्‍टस

या फिर नकली फूल

फिर भी मैं हर सुबह

एक बीज परिवर्तन के बोता हूं

क्रमश: आगे बढ़ते हुए कभी राजा और रंक हो जाना तो आत्‍मा-परमात्‍मा वार्तालाप के साथ ही पृष्‍ठ दर पृष्‍ठ अपनी उत्‍सुकता कायम रखने में सफल हुए हैं ...पानी का कैनवस हो या रहस्‍योद्धाटन करते हुए कहते हैं जब कृष्‍ण ने खुद से पहले राधा का नाम लिया हो .और व्याख्‍या कालजयी ग्रंथ की इस तरह से ...

मैने बंद दरवाजे खोल दिए हैं,

अब मैं एक सूक्ष्‍म विचार हूं

वह कलम

और लिखा जा रहा है एक कालजयी ग्रंथ

परिक्रमा में रचनाकार ने कई जगह प्रेरक संदेश भी दिये हैं कुछ इस तरह से जो उनकी रचनाओं को ऊंचाई के शिखर पर विराजित करती हैं ...

पाने से पहले देना सीखो,

किसी एक चेहरे की

मुस्‍कान बनकर देखो

तुम अपने आप में पूर्ण हो जाओगे ।

इस संदेश के बाद हम अनेक भावों को समेटे सशक्‍त रचनाओं से परिचित होते हैं तब परिक्रमा के पूरे होने की बात करते हुए रचनाकार कह उठता है जब जिन्‍दगी रूपी धुंए के रहस्‍य से पर्दा उठाता है और उससे मित्रता कर बैठता है तो वह अगर का धुंआ हो जाता है और वह उससे अलग नहीं होना चाहता बल्कि उस धुंए में समाहित हो विलीन हो जाना चाहता है हमेशा के लिए एक साधक की तरह ....

परिक्रमा की समीक्षा करना मेरे लिये इतना आसान तो नहीं है परन्‍तु इनके भावों ने और प्रस्‍तुतिकरण ने मुझे आपके सामने लाने के लिये प्रेरित किया ...परिक्रमा खुद में एक कालजयी ग्रन्थ है , जिसे पढ़ने के बाद आत्मा परमात्मा में एकाकार हो जाती है ।

आपका ब्‍लॉग ....Main hoo ....


बुधवार, 18 मई 2011

भुलाना चाहोगे ....











तुम मुझसे दूर जाकर जाने क्या सुकून पाओगे,
जितना भुलाना चाहोगे उतना ही करीब पाओगे

अश्कों का सौदा हो गया दिल से वरना ज़ख्,
दिखाता तुम्हें तो यूं छोड़ के जा भी ना पाओगे

हंसते-हंसते मैने तुम्हें रूख्सत किया है जब भी,
रोये हैं हम तेरी याद में ये तो कह ना पाओगे

सिमट गया हर लम्हा तेरी चाहत की कैद मे,
मुझको इल्जाम यूं सरेआम दे तो पाओगे

वक् की साजि़शों का शिकार जब भी होते तुम,
मुझे कुसूरवार अपना सदा कह तो ना पाओगे

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....